बुधवार, 13 जुलाई 2011

आक्रोश युवा पीढ़ी का

          युवा कौन है...युवा किसे कहें...युवा कहलाने की कसौटी और पहचान क्या है ? सिर्फ उम्र, नवीनतम फैशन, होश रहित जोश, अपनी ध्वंशात्मक शाक्ति का तूफानी उबाल या वर्तमान की विद्रूपताओं को चुनौती देकर नया भविष्य गढ़ने का संकल्प...? आदर्शो के लिए मृत्यु तक का वरण करने की तैयारी, हमारे नवयुवक २१ वीं सदी के भारत को स्वर्ग बनाना चाहते हैं.. या यह कहना कि हमारी युवा पीढ़ी नालायक है, कुछ नहीं कर सकती, दोनों में सच क्या है ? युवा पीढ़ी कोई स्वप्न नहीं, वास्तविकता है। उसके सामने खड़ी समस्या भी कोई स्वप्न नहीं बल्कि एक कचोटती हुई चुनौती है।
          आप रोज नवजवानों को कालेज जाते, काम ढूंढते, काम पर जाते, भीख मांगते, चोरी करते, मारामारी और दादागिरि करते देखते हैं...क्या आप सचमुच उसे ऐसा करते देखते हैं ? आपने उन्हे मुट्ठी भर अनाज के लिए दिन भर खेतों में मजदूरी करते देखा है ? हां कहना आशान है, मगर सच्चाई कुछ और है..?          
          जनगणना के समय १८ वर्ष का हो जाने पर मतदान का हक प्राप्त करने पर उन्हें युवा कहेंगे या जीन्स और टी शर्ट पहनकर विचरण करने वाले, कैम्पस में न शीली दवाओं का प्रदूषण फैलाने वाले युवा कहलाने के हकदार हैं ? हजारों की संख्या में रचनात्मक कार्य का किसी प्रेरणादायी व्याख्यान को सुनने के लिए उमड़ते हुए लोगों की हम बात कर रहे हैं...अथवा उन युवकों की बात कर रहे हैं जो आंखों में स्वप्न और ओठों पर संकल्प करते हैं..? एक अमेरिकी हिप्पी चरस का कश लेते हुए बताता है-''...जब मैं छोटा था तब झार में मेरे पापा मुझसे कहते थे कि अगर किसी का फोन आये तो कह देना कि मैं घर में नहीं हूं.. दिन भर झूठ बुलवाते थे और रात में कहते थे कि अच्छे बच्चे हमेशा सच बोला करते हैं, तुम भी कभी झूठ मत बोलना'' अब बताइये मैं क्या करता ? इस अमेरीकी युवक की बातों ने मुझे सोंचने पर मजबूर कर दिया। आखिर हम अपनी युवा पीढ़ी के समक्ष क्या आदर्श प्रस्तुत करते हैं ? उन्हें हम जो कहते हैं और जो करते हैं, उसमें कहीं फर्क तो नहीं है..?         
          एक बार रूस के प्रसिद्ध दार्शनिक गुर्जिफ अपने कुछ शिष्यों के साथ टिकलिस नामक शहर में गये। उनके शिष्यों को वहां यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पूरा शहर नींद में डुबा हुआ है। व्यापारी नींद में व्यापार कर रहे हैं, ग्राहक नींद में खरीददारी कर रहे हैं। एक शिष्य ने अपने गुरू से पूछा-'कमाल है, ये सब नींद में है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि जब मैं तीन माह पूर्व यहां आया था तब ऐसा कुछ नहीं था।' गुर्जिफ ने कहा-'उस वक्त तुम नींद में थे, आज तुम जागे हुए हो। जब तुम सो रहे थे तब ये सभी सो रहे थे जो तुम्हे जागते प्रतीत हुए। इसीप्रकार आज तुम जागे हुए हो तो तुम्हें ये सब सोते प्रतीत हो रहे हैं।' हमारा हाल ही कुछ ऐसा है कि हम नौजवानों को देखते हैं मगर उनकी संवेदनाओं को समझ नहीं पाते। हम रोजमर्रा की नींद में हैं- सुबह से शाम तक सभी काम आदत से करते हैं। रास्ते पर निकलकर अच्छे रास्ते पर चलना, अच्छे दफ्तर में ऊंचे पद पर कार्य करना, आना जाना सभी काम नींद में करते हैं। 
गुजरात और असम आंदोलन :-

         गुजरात में युवाओं ने भ्रष्टाचार आंदोलन के द्वारा तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री चिमन भाई पटेल की सरकार का तख्ता पलट दिया था। युवा शक्ति का अंदाजा सन् १९७७, १९८० और १९८९ के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था। मार्च १९७७ के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत उनके किसी धुरंधर नेता के करिश्मों से नहीं हुई थी बल्कि श्री जयप्रकाश नारायण के नाम पर न्योछावर हो जाने वाले नवजवानों के कारण हुई थी। सन् १९८० में ये नवजवान उनकी गतिविधियों से भलिभांति परिचित हो गये थे अत: जनता पार्टी के वही नेता चुनाव में बुरी तरह पराजित हो गये। ठीक इसी प्रकार सन् १९८९ में भी हुआ था। असम में कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों ने मिलकर असम गण परिषद बनाया और ऐसा करिश्मा कर दिखाया कि अगले चुनाव में उनकी सरकार बन गयी। इससे सिद्ध हो गया कि युवा चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं। जो राजनीति में होता है वही साहित्य और कला के क्षेत्र में भी होता है। एक विद्रोही नवयुवक जिन मापदंडों के लिए विद्रोह करता है उसे प्राप्त कर लेने पर उसका विद्रोह समाप्त हो जाता है। अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक 'सरबाइविंब द फ्यूचर' में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है कि 'मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।' अधिकांश नवयुवक पहले विद्रोह करते हैं और उम्र के साथ साथ उसका विद्रोह समाप्त होते जाता है। फिर वे स्वयं वही करने लगते हैं जिनके कभी वे खिलाफ थे। यदि आप जीवन भर अपने जोश को कायम नहीं रख सकते तो आप यह मौका खो रहे हैं। कला में, संगीत में अथवा पारिवारिक जीवन में यही सब होता है। स्वयं अपनी जिंदगी में जिन विडंबनाओं को सहते हैं, वह दूसरों को सहनी न पड़े, इस बात का सभी ध्यान नहीं रखते। हर बहू सास बनने पर बहू की तरह सोचना छोड़ देती है। इस एक मात्र खतरे का अगर युवा पीढ़ी निवारण कर सके तो भविष्य उनके हांथों संवर सकता है। युवा पीढ़ी अपने दंभ से थक गई है। यदि वह पारदर्शक बनने का संकल्प करें तो वह कुछ भी कर सकता है। युवा वर्ग से हमने कभी ऐसे चमत्कार होते देखा है जिसकी हमने कल्पना तक नहीं की थी। सुकरात नवयुवकों से बातें करते थे। उनके लिए गोष्ठी आयोजित करते थे। नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का बीज बो दें तो वही ऊग आता है। ऐथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोने की क्षमता रखता था। आज इसका सर्वथा अभाव है। इस पीढ़ी में सोचने वालों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वाले दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं जो नई प्रतिभाओं को उभारने का ईमानदारी से प्रयास करते हैं ?
          हेनरी मिलर ने एक बार कहा था-'मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवकों में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है। हर क्षेत्र में चाहे वह कला, संगीत और साहित्य का हो, राजनीति और विज्ञान का हो, उसमें नई प्रतिभाएं उभरती रहती हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें उभरने का पूरा मौका देते हैं ?' उनकी बातों में मुझे सत्यता लगती है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसीप्रकार नवयुवकों में अन्याय का सामना करने के लिए जोश और जिगर होना चाहिए। महादेवी वर्मा के शब्दों में 'बलवान राश्ट्र वही होता है जिसकी तरूणाई सबल होती है। जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरूणाई है।' महादेवी वर्मा जब ऐसा कहती हैं तो इसका अर्थ होता है- मृत्यु को मार डालना। तरूणाई अनजानी भूमि पर जन्म लेकर विकसित होती है। उसके सामने चुनौतियां अधिक होती है मगर इन चुनौतियों का मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा उनमें होनी चाहिए। युवा शक्ति यदि ठान ले तो देश में बहुत बड़ा उलट फेर कर सकती है, आजादी का सदुपयोग कर सकती है, बशर्ते हम उन्हें मौका दे, उनके उपर विश्वास करें..? हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जो इस पीढ़ी को उनके उद्देश्यों से विमुख कर देती है, उन्हें असंयमित और अनुशासनहीन बना देती है।
कुंठा, निराशा और हिंसा :-
          आज हमारी शिक्षा रोजगारोन्मुखी न होकर बेरोजगारोन्मुखी होकर रह गयी है। माता-पिता अपने बच्चों को सही शिक्षा और दिशा देने में असफल रहे हैं। एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि चालीस प्रतिशत माता-पिता ही अपने बच्चे को शिक्षा के लिए सही मार्गदर्शन दे पाते हैं भोश भगवान भरोसे चलता है। इनके बच्चे बाइचान्स अच्छी शिक्षा लेकर अच्छे पदों पर रोजगार प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं बाकी बेलाइन हो जाते हैं। ये अपनी जिंदगी से निराश होकर चोरी, डकैती, गुंडागर्दी आदि के रास्ते निकल पड़ते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी तरह की निराशा हिंसा को जन्म देती है। यही निराशा अवसर पाकर विस्फोटक रूप धारण कर लेती है। यह एक खतरनाक संकेत है जिसका निराकरण समय रहते करना आवश्यक है।
          सर्वेक्षण से पता चलता है कि इसका सबसे बड़ा कारण है- आर्थिक विषमता। बेरोजगारी से त्रस्त नवयुवकों के लिए मौका मिलते ही किसी लूट में शामिल हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल सांइन्सेस के अपराध विज्ञान के विभागाध्यक्ष के अनुसार नवयुवकों का किसी लूटपाट में शामिल होने का कारण नि:संदेह आर्थिक विषमता है। लेकिन पुलिस सूत्रों के अनुसार ब्रिटिश शासन काल के मंदी के दौर में ऐसी कोई घटनाएं नहीं घटती थी। तब समाज में आदर्शो के प्रति गहरा मूल्यबोध था। आज हमारे समाज में कोई मूल्य, कोई आदर्श नहीं रह गया है। मूल्यों का अंकुश समाप्त हो जाने के कारण हिंसा और लूटपाट की घटनाओं का विस्फोट स्वाभाविक है। इसके लिए आज की युवा पीढ़ी को दोष देना उचित नहीं होगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऊपरी तबके का एक ही लक्ष्य पैसा कमाना रहा है, चाहे इसके लिए उन्हें अपना ईमान बेचना क्यों न पड़े और यही आदर्श हमने अपनी युवा पीढ़ी के सामने रखा है। वस्तुत: आज की मूल्यहीन पीढ़ी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी का उत्पाद है। अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई का नग्न रूप आंखों को चूभता है। रही सही कसर को पूरा किया है टी. वी. ने। हिन्दी फिल्मों में प्रदिर्शित सेक्स और हिंसा का ग्लैमराइजेशन युवक युवतियों के मन में वैसे ही जीवन जीने की लालसा पैदा कर देती है। इनमें बढ़ रही हिंसा और लूटपाट को उपर्युक्त सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखा जा सकता है। अमीरी गरीबी के बीच बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, कानून व्यवस्था के प्रति घटता सम्मान और टूटते सामाजिक राजनैतिक मूल्यों ने इन युवकों के भीतर निराशा पैदा कर दिया है जिसका एकमात्र निकासी उन्हें हिंसा और लूटपाट में मिलता है।
कर्म ही श्रेष्ठ है :-
          जिस व्यक्ति ने अपना भविष्य निर्धारित कर लिया है तो उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि लक्ष्य के मार्ग में जो विपत्तियां आयेंगी उसका हम मुकाबला करेंगे। वह लक्ष्य ही क्या जिसकी पूर्ति में संघर्श नहीं किया। हंसते हुए कष्टों को झेलना, विपत्तियों का स्वागत करना तथा अपने कर्म पर अडिग रहना कर्त्तव्य के प्रति अटूट श्रद्धा उत्पन्न करती है। अपने निर्धारित लक्ष्य की सफलता के लिए कर्म ही श्रेष्ठ है। भाग्यवादी लोग आलसी होते हैं और भगवान भरोसे जीवन व्यतीत करते हैं। कर्म शील व्यक्ति भाग्य के बजाय अपने कर्म में विश्वास रखता है।
रोजगारोन्मुखी शिक्षा :-
          शिक्षा के द्वारा हम न केवल अतीत के पृष्ठों को ही नहीं उलटते बल्कि उनकी अच्छाईयों करके स्वस्थ्य, सुंदर और सुखद भविष्य के निर्माण करते हैं। राश्ट्रीय विकास के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा के माध्यम से योजनाबद्ध सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। आज हमारी शिक्षा का माध्यम यह होना चाहिए कि हम आत्मनिर्भर बन सके। सरकार और अभिभावकों को अब समझ में आ गया कि शिक्षा को रोजगार परक होना चाहिए। इसके लिए वे अपने बच्चों को इसके लिए प्रेरित भी करने लगे हैं। शिक्षा को वास्तविक जीवन और उत्पादकता के साथ जोड़ना नितांत आवश्यक है। इसके लिए कार्य अनुभव को शिक्षा का आवश्यक अंग बनाना जरूरी है। शिक्षा को व्यवसायिक रूप देने का अर्थ है युवा पीढ़ी में ज्ञान, कौशल और अभिरूचि का पूर्ण विकास होना चाहिए जिससे आगे चलकर ये जो भी व्यवस्था अपनायें उसमें उनकी शिक्षा का समुचित उपयोग हो सके। कुछ लोगों का मत है कि सामान्य शिक्षा प्राप्त व्यक्ति की तुलना में व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति केवल व्यवसायिक होकर रह जाते हैं।
उचित मार्गदर्शन :-
          उचित मार्गदर्शन के अभाव में आज की युवा पीढ़ी अपने मार्ग से भटक जाती है और कुंठाग्रस्त होकर जहां घातक आत्मवंचना एवं स्वयं के प्रति उदासीनता लिए दिग्भ्रमित हो रहा है, वहीं आज का शिक्षक और अभिभावक सामान्यतया उस आत्म केंद्रित, आत्मचिंतक तथा स्वकल्याण मग्न मनु जैसा हो गया है जो अपने ही प्रज्ञा से प्रसूत संतति के प्रति उदासीन है। अपने ही मानस पुत्रों के प्रति उसके इसके दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य का परिणाम है-संपूर्ण दिग्भ्रमित, अनुत्तरदायी और अनुशासनहीन पीढ़ी। इस पर ध्यान दिया जाना अति आवश्य  है।
विश्वास को जगायें :-

          मनुष्य के मन में दो भाक्तियां निवास करती हैं-भय और विश्वास। ये दोनों भाक्तियां मनुष्य की विचारधारा पर नियंत्रण पाने के लिए निरंतर एक दूसरे से संघर्ष करती है। आप जो भी निर्णय लेंगे उसे पूरा करने की क्षमता आप में निहित है। किंतु इसके लिए दृढ़ विश्वास और सतत् प्रयास करते रहना आवश्यक है। ऐसा कतई नहीं है कि ज्ञान का भंडार वि व का महान कहलाने वाले व्यक्तियों के पास ही है, आप में भी ज्ञान के स्रोत हैं बशर्ते आप उसका दोहन करना जानते हों ? विश्वास में महान भाक्ति निहित होती है। विश्वास शरीर की उर्जा को मुक्त कर देती है जिससे निर्णय लेने की भाक्ति मिलती है। विद्वानों ने कहा भी है कि आत्महीनता विचारों का तराना है। उसके माधुर्य को आप अस्वीकार कर दीजिए। दर्पण के सामने खड़े होकर अपने स्वाभिमान को जगाइये, स्वयं को चुनौती दीजिए। सफलता या असफलता एक मानसिक स्थिति है इसे स्वीकार करना या न करना पूरी तरह आपके वश में है। आपका व्यक्तित्व एक दर्पण है। उसमें आप जितना झांकेंगे उतना ही वह आकर्षक बनेगा और दर्पण को आप जितना साफ करेंगे उतना ही वह चमकेगा, उसमें आपकी छवि उतनी ही स्पष्ट दिखाई देगी। 
बदलता जीवन शैली और युवा :-
          युवाओं की स्थिति आज कटी पतंग जैसी अथवा पुराण के त्रि शंकु जैसी अनिश्चित हो गयी है। जीवन के मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। बल्कि यूं कहिए कि प्राचीन मूल्य नष्ट हो रहे हैं और नवीन मूल्यों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। परिवर्तन की इस आपाधापी में हमारी युवा पीढ़ी प्राय: भ्रमित होती दिखाई देती है। हमारे उदीयमान नागरिक उचित अनुचित को पहचानने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। मूल्यों की इस अव्यवस्था में समाज और संस्कृति का विघटन होने लगा है। समाज में पलायन और बेगानेपन के स्वर गूंजने लगे हैं और मानव सभ्यता के सामने एक प्र न चिन्ह लग गया है।आज युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है। हिंसक प्रवित्तियां बलवती होती जा रही हैं। प्रत्येक क्षेत्र में असंतोश, अ शांति, विध्वंस और विघटन की प्रवृत्तियां हावी हैं। ऐसे में हमें अपनी युवा पीढ़ी के प्रति उदारता दिखाते हुए उन्हें सहयोग करना चाहिए तभी एक नया सबेरा हो पायेगा।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर ...

लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर ...

यात्रा संस्मरण
          खरौद, महानदी के किनारे बिलासपुर से 64 कि. मी., जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से 55 कि. मी., कोरबा से 105 कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार होकर 120 कि. मी. और रायगढ़ से सारंगढ़ होकर 108 कि. मी. और शिवरीनारायण से मात्र 02 कि. मी. की दूरी पर बसा एक नगर है। शैव परम्परा यहां स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव और शैव मठ से स्पष्ट परिलक्षित होता है। जबकि शिवरीनारायण वैष्णव मठ, नारायण मंदिर और चतुर्भुजी मूर्तियों के कारण वैष्णव परम्परा का द्योतक है। संभवत: इसी कारण खरौद और शिवरीनारायण को क्रमश: शिवाकांक्षी और विष्णुकांक्षी कहा जाता है और इसकी तुलना भुवनेश्वर के लिंगराज और पुरी के जगन्नाथ मंदिर से की जाती है। प्राचीन काल में ज्रगन्नाथ पुरी जाने का रास्ता खरौद और शिवरीनारायण से होकर जाता था। भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार यहां सतयुग और त्रेतायुग में मतंग ऋषि के गुरूकुल आश्रम होने की जानकारी मिलती है। शबरी यहां रहकर निर्वासित जीवन व्यतीत की और उनके जूठे बेर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहीं खाये थे ... उनका उद्धार करके उनकी मंशानुरूप शबरीनारायण नगर बसाकर उनकी स्मृति को चिरस्थायी बना गए थे।
          ऐसे पतित पावन नगर में पिकनिक जाने का पिछले दिनों प्रोग्राम बना। कॉलेज के छात्र-छात्राओं का विशेष आग्रह था कि मैं उनके साथ अवश्य चलूं। वे सब मेरे लेखकीय दृष्टि का लाभ उठाना चाहते थे। मैं भी खुश था, पिकनिक का पिकनिक और तीर्थयात्रा, यानी एक पंथ दो काज ..। खरौद, चांपा से 65 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। हमने वहां बस से जाने का निर्णय किया। सबका मन बड़ा प्रसन्न था। निर्धारित तिथि में हम खरौद के लिए रवाना हुए। रास्ता बहुत खराब होने के कारण हमारी बस हिचकोले खाती हुई धीरे धीरे चल रही थी .. दूर से सेंचुरी सीमेंट और रेमंड सीमेंट (अब लाफार्ज सीमेंट) फैक्टरी से धुआं उगलती चिमनियां दिखाई दे रही थी। मैंने विद्यार्थियों को बताया कि राजगांगपुर (उड़ीसा) से राजनांदगांव तक चूने की खान हैं और सीमेंट उद्योग के लिए उपयुक्त हैं। अब तक कई सीमेंट फैक्टरियां लग चुकी हैं और आगे भी लगने की संभावनाएं हैं। फिर भी सीेमेंट यहां मंहगी मिलती है। चिमनियों के धुओं से वायुमंडल प्रदूषित होता है और धुंआ जब नीचे आकर पेड़ों की पित्तयों और खेतों में गिरकर परत जमा लेती हैं तो पेड़-पौधे मर जाते हैं और खेत बंजर हो जाती है। इसकी किसे चिंता है ? औद्यौगिक क्रांति आयेगी तो अपने साथ कुछ बुराईयां तो लायेंगी ही। खैर, थोड़ी देरी में हम पामगढ़ पहुंचे। सड़क से ही लगा गढ़ के अवशेष दिखाई देता है-तीन तरफ खाई और उसमें पानी भरा था। विद्यार्थियों की उत्सुकता गढ़ देखकर ही शांत हुई। रास्ते में मेंहदी के सिद्ध बीर बजरंगबली के दर्शन किये। रास्ते में ही राहौद और धरदेई के तालाबनुमा प्राचीन खाईयों को देखते हुए खरौद के मुहाने पर पहुंचे। दूर से महानदी का चौड़ा पाट देखकर विद्यार्थी खुशी से चिल्ला उठे- सर, देखिये नदी। मैंने उन्हें बताया कि हम खरौद की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। देखो, इस नदी में शिवनाथ और जोंक नदी आकर मिलती हैं और त्रिधारा संगम बनाती है। विद्यार्थी बड़े प्रसन्न थे तभी हमारी बस सड़क किनारे स्थित जल संसाधन विभाग के निरीक्षण गृह में झटके के साथ रूकी। सभी वहां हाथ-मुंह धोकर नास्ता किये और मंदिर दर्शन करने निकल पड़े। एक-डेढ़ किण् मीण् की दूरी पर अत्यंत प्राचीन शबरी मंदिर है। ईंट से बना पूर्वाभिमुख इस मंदिर को ``सौराइन दाई`` का मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम और लक्ष्मण धनुष बाण लिये विराजमान हैं। पुजारी ने बताया कि श्रीराम और लक्ष्मण जी शबरी के जूठे बेर यही खाये थे। द्वार पर एक अर्द्धनारीश्वर की टूटी मूर्ति रखी है। मूर्ति के चेहरे पर सिंदूर मल दिया गया है जिससे अर्द्धनारीश्वर का स्वरूप स्पष्ट दिखाई नहीं देता। लोग श्रद्धावश किसी भी मूर्ति में जल चढ़ाने लगते हैं जिससे उसका क्षरण होने लगता है। इस मूर्ति की भी यही स्थिति है। मंदिर से लगा मिट्टी से बना एक गढ़ है जिसमें दशहरा के दिन प्रदर्शन होता है, जिसे गढ़ भेदन कहा जाता है। पुरातत्व विभाग द्वारा पूरा मंदिर परिसर को घेर दिया गया है। पास में ही हरिशंकर तालाब और उसमें बैरागियों की समाधि है।
          स्कंद पुराण के उत्कल खंड में वर्णन मिलता है कि पुरी में वहां के राजा ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया तब उसमें मूर्ति स्थापना की समस्या आयी। देव संयोग से आकाशवाणी हुई कि दक्षिण पश्चिम दिशा में चित्रोत्पला-गंगा के तट पर सिंदूरगिरि में रोहिणी कुंड के निकट स्थित मूर्ति को लाकर यहां स्थापना करो। उस काल में खरौद क्षेत्र में शबरों का अधिपत्य था। जरा नाम के शबर का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। शबरी इसी कुल की थी जिसके जूठे बेर श्रीराम और लक्ष्मण ने खाये थे। द्वापर युग के उत्तरार्द्ध में श्रीकृष्ण की मृत्यु जरा नाम के शबर के तीर से हो जाती है। तब उनके अधजले मृत शरीर को इसी क्षेत्र में लाकर रोहिणी कुंड के किनारे रखकर नित्य उसकी पूजा अर्चना करने लगा। आगे चलकर उन्हें अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हुई। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का पता चलता है और ऐसा प्रतीत होता है कि जरा भी तंत्र मंत्र की सिद्धि इस मूर्ति के सामने बैठकर करता था। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी के राजपुरोहित विद्यापति ने छल से इस मूर्ति को पुरी ले जाकर उस मंदिर में स्थापित करा दिया था। लेकिन डॉ. जे. पी. सिंहदेव ने ``कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` में लिखा है कि `सिंदूरगिरि से मूर्ति को पुरी ले जानेवाले विद्यापति नहीं थे बल्कि उसे ले जाने वाले प्रसिद्ध तांत्रिक इंद्रभूति थे। उन्होंने इस मूर्ति को ले जाकर संबलपुर की पहाड़ी में स्थित संभल गुफा में रखकर तंत्र मंत्र की सिद्धि करता था। यहां उन्होंने अनेक तांत्रिक पुस्तकों का लेखन किया। उन्होंने तिब्बत में लामा सम्प्रदाय की स्थापना भी की। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंद्रभूति की तीन पीढ़ियों ने यहां तंत्र मंत्र की सिद्धि की और चौथी पीढ़ी के वंशजों ने उसे पुरी ले जाकर उस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित कर दिया। जगन्नाथ पुरी और खरौद-शिवरीनारायण क्षेत्र में तांत्रिकों के प्रभाव का उल्लेख मिलता है। शिवरीनारायण में तांत्रिकों के गुरू नगफड़ा और कनफड़ा की मूर्ति तथा नगर के बाहर कनफड़ा गुफा की उपस्थिति इस तथ्य की पुष्टि करता है। खरौद के दक्षिण द्वार पर स्थित `शबरी मंदिर` और सौंरापारा इसके प्रमाण माने जा सकते हैं। सौंरा जाति अपने को शबरों का वंशज मानती है। प्राचीन साहित्य में ``रोहिणी कुंड`` को एक धाम बताया गया है :-
          रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर
          बंदरी से नारी भई, कंचन होत शरीर।
          जो कोई नर जाइके, दरशन करे वही धाम
          बटु सिंह दरशन करी, पाये पद निर्वाण।।
          इस मंदिर को देखकर हमें बहुत अच्छा लगा। अब हम नगर के पश्चिम दिशा में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव के मंदिर की ओर बढ़े। मंदिर भव्य और आकर्षक है। मंदिर के द्वार पर पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड लगा है जिसमें मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में इंद्रबल के पुत्र ईशानदेव के द्वारा कराये जाने का उल्लेख है। यहां स्थित शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का जीर्णोद्धार रत्नपुर के कलचुरि राजा खड्गदेव ने कराया था। इस मंदिर में भगवान महावीर की मूर्ति देखने को मिली। मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पाश्र्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तंभ है। इनमें से एक स्तंभ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य अंकित है। इसी प्रकार दूसरे स्तंभ में श्रीराम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे बाली वध, श्रीराम सुग्रीव मित्रता के अलावा शिव तांडव और सामान्य जन जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और एक दंडधारी पुरूष की मूर्ति है। उसके पाश्र्व में नारी प्रतिमा है। गर्भगृह में लक्ष्मण के द्वारा स्थापित ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` का पार्थिव लिंग है। इस अद्भूत लिंग के बारे में पता चलता है कि लंका विजय के उपरांत लक्ष्मण के उपर ब्रह्महत्या का पाप लगाया गया और इसकी मुक्ति के लिए उन्हें चारोंधाम की यात्रा करने और वहां के अभिमंत्रित जल से शिवलिंग की स्थापना करने की सलाह दी गयी। लक्ष्मण ने चारोंधाम की यात्रा की। जगन्नाथ पुरी से लौटकर उन्होंने गुप्तधाम शिवरीनारायण की यात्रा की। यहां चित्रोत्पला गंगा में स्नान कर आगे बढ़ते ही उन्हें क्षय रोग हो गया। आकाशवाणी हुई कि शिव आराधना से उन्हें क्षय रोग से मुक्ति मिल सकती है। उनकी आराधना से शिवजी प्रसन्न हुये और उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग स्थापित करने को कहा। तब उन्होंने यहां इस अद्भूत शिवलिंग की स्थापना की और क्षयरोग से मुक्ति पायी। इस शिवलिंग को ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` कहा गया। आज भी क्षयरोग निवारणाय लक्ष्मणेश्वर दर्शनम् प्रसिद्ध है। उनके दर्शन करके हमें लगा कि हमारा जीवन कृतार्थ हो गया। पुजारी ने हमें बताया कि यहां लखेसर (एक लाख साबूत चांवल) चढ़ाने का रिवाज है। इससे मनौतियां पूरी होती हैं।
          पवित्र मन लिए जब हम मंदिर से बाहर आये तब हमें प्राचीन गढ़ के अवशेष देखने को मिला जिसका अंतिम छोर माझापारा तक जाता है। यहां पर ईंट से बना अति प्राचीन पश्चिमाभिमुख इंदलदेव का मंदिर है। उत्कृष्ट मूर्तिकला से सुसज्जित इस मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर की दीवारों में पेड़ पौधे उग आये हैं। यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व संस्थान के संरक्षण में है लेकिन उचित देखरेख के अभाव में मंदिर जीर्ण शीर्ण हो गया है। दोपहर होने को आयी और हमारे पेट में चूहे दौड़ने लगे। सभी विद्यार्थी पुन: निरीक्षण गृह में आकर खाना खाये। लक्ष्मणेश्वर मंदिर से लौटते समय संस्कृति प्रचार केंद्र में विक्रम संवत् 2042, ज्येष्ठ शुक्ल 10 गंगा दशहरा के पावन पर्व के दिन शिव के आठ तत्वों के समिष्ट रूप ``अष्टमुख शिव`` और पांच मुख वाले अनुमान की प्रतिमा के दर्शन हुए। भारत में मंदसौर के बाद खरौद में स्थापित अष्टमुख शिव की यह प्रतिमा अद्वितीय, अनुपम और दर्शनीय है। संस्कृति प्रचार केंद्र के संचालक डॉ. नन्हेप्रसाद द्विवेदी हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार में यह संस्था लगी है। डॉ. द्विवेदी के द्वारा लिखित ``खरौद परिचय`` में खरौद नामकरण के बारे में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के शिलालेख के 30 वें लाइन में लिखा है। इसके अनुसार महाराजा खड्गदेव ने भूतभर्ता शिव के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जो केवल मंडप मात्र था। यह घटना इस ग्राम के लिए ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। खड्गदेव शब्द में खड्ग का अपभ्रंश खरग तथा देव का अपभ्रंश ओद बना प्रतीत होता है। ``ग`` वर्ग के लोप हो जाने तथा `खर` और `ओद` के मिलने से ``खरौद`` शब्द की सिद्धि होती है। इस प्रकार खड्गदेव का बिगड़ा रूप खरौद हुआ ऐसा प्रतीत होता है।
          खरौद, छत्तीसगढ़ का एक गढ़ भी रहा है। इसे ``खरौदराज`` भी कहा जाता था। यहां के गढ़ाधीश के रूप में पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का उल्लेख मिलता है जो कोटगढ़ के भी गढ़ाधीश थे। हमें बताया गया कि सन् 1835 में सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह ने उनके परिवार को समूल नष्ट करने का प्रयास किया था। मगर उस कुल के बीज को अपने गर्भ में लिए एक महिला किसी तरह बचकर कोटगढ़ आ गयी और मिसिर परिवार का वंश नष्ट होने से बच गया। आगे चलकर उनका परिवार कसडोल में निवास करने लगा।
          खरौद, कलचुरी कालीन गढ़ था। कलचुरी वंश के पतन के बाद मराठा वंश के शासक इसे ``परगना`` बना दिया। उस समय इस परगना में अकलतरा, खोखरा, नवागढ़, जांजगीर और किकिरदा के 459 गांव सिम्मलित था। ब्रिट्रिश काल में तहसील मुख्यालय सन् 1861 से 1891 तक शिवरीनारायण में था और फिर जांजगीर ले जाया गया। इसके बाद खरौद उपेक्षित होता चला गया। हमें लोगों ने बताया कि यहां के श्री परसराम भारद्वाज ने सारंगढ़ लोकसभा क्षेत्र का पांच बार प्रतिनिधित्व किया है। लेकिन हमारी उनसे भेंट नहीं हो सकी।
          संध्या होने को आयी और मेरा लेखक मन जैसे सबको समेट लेना चाहता था। मैंने सबको समझाया कि दो-ढाई कि. मी. पर सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक नगर शिवरीनारायण है, वहां वोटिंग का भी मजा लिया जाये उसके बाद वहां भगवान नारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, मां अन्नपूर्णा और चंद्रचूढ़ तथा महेश्वर महादेव के दर्शन भी कर लिया जाये। मेरी बात मानकर सभी शिवरीनारायण रवाना हो गये। वहां महानदी का मुहाना और बोटिंग का मजा लेकर सभी प्रसन्न मन से भगवानों के दर्शन किये और वापसी के लिए तैयार हो गये। मेरा लेखक मन भूतभर्ता भगवान लक्ष्मणेश्वर का आभारी रहेगा जिनके बुलावे पर खरौद जाने का संयोग बना और यहां के बारे में लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया। मुझे पंडित मालिकराम भोगहा कृत ``श्री शबरीनारायण माहात्म्य`` पढ़ने को मिला जिसके पांचवें अध्याय के 95-96 श्लोक में लक्ष्मण जी श्रीरामचंद्रजी से कहते हैं :- हे नाथ ! मेरी एक इच्छा है उसे आप पूरी करें तो बड़ी कृपा होगी कि इहां रावध के वध हेतु ``लक्ष्मणेश्वर महादेव`` थापना आप अपने हाथ कर देते तो उत्तम होता :-
          रावण के वध हेतु करि चहे चलन रघुनाथ
          वीर लखन बोले भई मैं चलिहौं तुव साथ।।
          वह रावण के मारन कारन किये प्रयोग यथाविधि हम।
          सो अब इहां थापि लखनेश्वर करें जाइ वध दुष्ट अधम।।
   यह सुन श्रीरामचंद्रजी ने बड़े 2 मुनियों को बुलवाकर शबरीनारायण के ईशान कोण में वेद विहित संस्कार कर लक्ष्मणेश्वर महादेव की थापना की :-
          यह सुनि रामचंद्रजी बड़े 2 मुनि लिये बुलाय।
          लखनेश्वर ईशान कोण में वेद विहित थापे तहां जाय।। 97 ।।
          ...और अनंतर अपर लिंग रघुनाथ। थापना किये अपने हाथ।
          पाइके मुनिगण के आदेश। चले लक्ष्मण ले दूसर देश।।
          अर्थात एक दूसरा लिंग श्रीरामचंद्रजी अपने नाम से अपने ही हाथ स्थापित किये, जो अब तक गर्भगृह के बाहर पूजित हैं। आंचलिक कवि श्री तुलाराम गोपाल अपनी पुस्तक ``शिवरीनारायण और सात देवालय`` में इस मंदिर की महिमा का बखान किया है:-
          सदा आज की तिथि में आकर यहां जो मुझे गाये।
          लाख बेल के पत्र, लाख चांवल जो मुझे चढ़ाये।।
          एवमस्तु! तेरे कृतित्वके क्रम को रखे जारी।
          दूर करूंगा उनके दुख, भय, क्लेश, शोक संसारी।।
          अन्यान्य दुर्लभ मूर्तियों से युक्त मंदिरों, तालाबों और प्राचीन गढ़ी के अलावा धार्मिकता और ऐतिहासिक महत्ता के बावजूद यह नगर उपेक्षित है। महाशिवरात्री और सावन में यहां दर्शनार्थियों की भीड़ होती है मगर प्र्रदेश के पर्यटन नक्शे में यह नगर अभी तक नहीं आ सका है। इतनी जानकारी के बाद हमारा मन प्रफुिल्लत था। हमारी बस वापसी के चल पड़ी और मेरा मन बटुकसिंह चौहान के गीत को गुनगुनाने लगा :-
          जो जाये स्नान करि, महानदी गंग के तीर।
          लखनेश्वर दर्शन करि, कंचन होत शरीर।
          सिंदूरगिरि के बीच में, लखनेश्वर भगवान
          दर्शन तिनको जो करे, पावे परम पद धाम।।

छत्तीसगढ़ में राम को समर्पित रमरमिहा


छत्तीसगढ़ में राम को समर्पित रमरमिहा

                    महानदी, छत्‍तीसगढ़ की एक पवित्र और पुण्यदायिनी नदी है। इसे चित्रोत्पला गंगा भी कहा जाता है और इसका उल्लेख रामायण और महाभारत कालीन ग्रंथों में मिलता है। गंगा के समान पवित्र इस नदी के तट पर अनेक नगर और मंदिर स्थित हैं। महानदी की पवित्रता के कारण ये नगर सांस्कृतिक तीर्थ कहलाने लगे। इन नगरों में ऋषि-मुनियों प्राचीन काल में अपना आश्रम बनाकर तप किया करते थे। कदाचित् इसी कारण इन्हें सांस्कृतिक तीर्थ कहा जाने लगा। सिहावा, राजिम, सिरपुर, खरौद, शिवरीनारायण, तुरतुरिया, चंद्रपुर और संबलपुर आदि नगर महानदी के तट पर बसे हैं। इस नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में रामायण और महाभारत कालीन अवशेष आज भी मिलते हैं। रायपुर जिले के बलौदाबाजार के निकट जंगलों के बीच तुरतुरिया ग्राम स्थित है। रामायण काल में यहां बाल्मिकी आश्रम था, जहां माता सीता ने वनदेवी के रूप में रहकर लव और कुश को जन्म दिया था। मल्हार के पास ग्राम कोसला को माता कौशल्या का मायका और श्रीराम का ननिहाल माना जाता है। सक्ती और सरगुजा की पहाड़ियों में रामायण कालीन अवशेष मिलते हैं। शिवरीनारायण का वास्तविक रूप शबरीनारायण है जो शबरी के जूठे बेर खाने और उसके उद्धार करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने दंडकारण्य जाते इस भेंट को चिरस्थायी करने के लिये बनाये थे। श्रीराम का नारायणी रूप यहां प्राचीन काल से गुप्त रूप से विराजमान है। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्तधाम'' कहा गया है। रामनाम को समर्पित, अपने पूरे शरीर में रामनाम अंकित कराकर केवल राम को भजने वाले रामनामी महानदी के तटवर्ती ग्रामों में बसते हैं। इन्हें रमरमिहा, रामनमिहा और रामनामी कहा जाता है। खरौद को रामायण कालीन खर और दूषण की नगरी माना जाता है। खरौद के दक्षिण द्वार पर शबरी का अति प्राचीन मंदिर है। इसे सौराइन दाई का मंदिर भी कहा जाता है।
                    महानदी का यह तटवर्ती क्षेत्र धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिहावा, सिरपुर, राजिम, मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण, चंद्रपुर और संबलपुर जहां धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, वहां प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिलने से प्राचीनता की जानकारी मिलती है। राजनीतिक दृष्टि से तब इसे ''ट्रांस महानदी क्षेत्र'' कहा जाता था। महानदी की सहायक नदी जोंक के तट पर गुरू घासीदास का धाम गिरौदपुरी स्थित है। यहीं सतनाम पंथ का जन्म हुआ । इसी प्रकार सरसींवा के पास महानदी का तटवर्ती ग्राम ``उड़काकन'' रामनामी पंथ का एक पवित्र तीर्थधाम है। रामनामी और सतनामी के लिये शिवरीनारायण का वही महत्व है जो दूसरों के लिये प्रयाग और काशी का है। माघी पूर्णिमा से लगने वाले मेला के समय इस पंथ के लोग भी शिवरीनारायण में अपना तंबू लगाकर भजन आदि करते हैं। पूरे शरीर में रामनाम का अंकन लोगों के लिये आकर्षण होता है। मैं भी इन्हें बचपन से देखते आ रहा हंू। मेरे लिये यह उत्सुकता का विषय था। सांवले शरीर में रामनाम को गोदना, सिर पर मोर मुकुट लगाये हाथ में मंजिरा लिये रात दिन रामनाम का भजन करते हैं। उनके शरीर का ऐसा कोई भाग नहीं बचा होता है जहां रामनाम अंकित न हो...यहां तक कि वे जो कपड़े पहनते हैं और जिस तम्बू के नीचे रहते हैं, उसमें भी रामनाम अंकित होता है। छत्‍तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में आज भी प्रात: राम राम कहने का रिवाज है। इससे उनकी दिनचर्या शुभ होती है।
                    महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रमरमिहा लोग निवास करते है। छत्तीसगढ़ के पांच सीमावर्ती जिलों रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, महासमुंद और रायगढ़ के सारंगढ़, घरघोड़ा, जांजगीर, चांपा, मालखरौदा, चंद्रपुर, पामगढ़, कसडोल, बलौदाबाजार और बिलाईगढ़ क्षेत्र के लगभग ३०० गांवों में पांच लाख रमरमिहा निवास करते हैं। रामनामी पंथ अनुसूचित जाति की एक शाखा है जो संत कवि रैदास को अपने पंथ का मूल पुरूष मानते हैं। इन्हें रमरमिहा अथवा रामनमिहा कहा जाता है। रामनाम में सदा तन्मय रहने वाले ये लोग अहिंसक और शाकाहारी होते हैं। मदिरा से वे बहुत दूर होते हैं।
                    छत्‍तीसगढ़ में रामनामी पंथ की उत्पत्ति के सम्बंध में कहा जाता है कि ये लोग हरियाणा के नारनौल से यहां आये थे। उस काल में तत्कालीन शासकों के दमनात्मक रवैये से त्रस्त होकर ये लोग छत्‍तीसगढ़ के शांत माहौल में आ बसे थे। आज उनकी २० वीं पीढ़ी के वंशज अपनी परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहरों के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। पारस्परिक सद्भाव और अद्भूत संगठन क्षमता वाले इस कौम को तोड़ने के लिये तत्कालीन शासकों ने एक चाल चली जिसमें वे सफल हो गये। पूर्व में रामनामी पंथ के लोग भी सतनाम के उपासक थे। उनमें आपसी सद्भाव और भाईचारा था। इससे उनमें अच्छा संगठन था। उनकी इस संगठन शक्ति को क्षीण करने और आपस में फूट डालने के लिये एक नवजात शिशु के माथे पर ''रामनाम'' गुदवा दिया और प्रचारित कर दिया कि यह शिशु राम की इच्छा से इस भूलोक में आया है। अत: राम की इच्छा के अनुरूप रामनाम का अनुसरण करें। इस प्रकार एक शक्तिशाली संगठन दो हिस्सों में बंट गया। आगे चलकर इन दोनों समुदाय के दो भाग और हुये। अलग रहने के बावजूद इनमें सांस्कृतिक साम्यता पायी जाती है।
सांस्कृतिक परंपरा के द्योतक राम नाम :-
                    श्रीराम को अनेक रूपों में पजा जाता है। शायद ही कोई ऐसा होगा जो श्रीराम के सगुण रूप को नकारता हो? लेकिन महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में बसे रमरमिहा लोग श्रीराम के सगुण रूप को नकार कर उसके निर्गुण रूप के उपासक हैं। हिन्दुस्तान में शायद ही कोई दूसरा पंथ होगा जो रामनाम में इतना रमा जाये कि पूरे शरीर में रामनाम गुदवा ले। लेकिन रमरमिहा लोग पूरे शरीर में राम नाम गुदवाते हैं, यहां तक पहनने-ओढ़ने के कपड़े और तम्बू के कपड़ों में भी राम नाम लिखा होता है। श्रीराम चरित मानस में भी कहा गया है:- ``जय राम रूप अनूप निर्गुण प्रेरक सही `` अर्थात् हे राम! आपकी जय हो। आपके रूप अनुपम है। आप निर्गुण हैं और सत्य ही गुणों के प्रेरक हैं। आगे कहा गया है:-
                                यद्यपि प्रभु के नाम अनेका, श्रुति कह अधिक एक से एका।
                                राम सकल नामन्ह ते अधिका, होउ नाथ अघ खग गल बघिका।।
                    यद्यपि प्रभु के अनेक नाम है और वेद कहते हैं कि वे नाम एक से एक बढ़कर है। तो भी हे नाथ ! रामनाम सबसे बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के लिये वह बधित के समान हो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि निराकार राम की उपासना करने का अधिकार उन्हें न्यायालय से मिला है।
                    जांजगीर-चांपा जिले के मालखरौदा विकासखंड के अंतर्गत ग्राम चारपारा के श्री परसराम भारद्वाज को रामनामी पंथ का प्रवर्तक माना जाता है। सन् १९०४ में उन्होंने निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम को मानकर एक जन आंदोलन की शुरूवात की थी। उन्होंने सबसे पहले अपने माथे पर रामनाम अंकित कराया था। इसके पूर्व निचली जाति के माने जाने के कारण वे रामायण का पाठ और रामनाम का उच्चारण नहीं करते थे। उनका मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध था। अक्सर उनको जातिगत आधार पर अपमान सहना पड़ता था। इसी बीच विदेशी ताकतों ने इस क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और उन्हें ईसाई धर्म मानने के लिये विवश किया। इसके लिये उन्हें हर प्रकार की मद्द दी जाने लगी। इसी समय श्री परसराम भारद्वाज ने रामनामी पंथ के अंतर्गत निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम की पूजा अर्चना करने की बात कही, जिसे सबने सहर्ष स्वीकार किया और तब से सब निराकार श्रीराम को अपने घर में पूजने लगे। भविष्य में उच्च जातियों द्वारा पुन: बाधा न डाल सके इसके लिये उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार के जिला सत्र न्यायालय से कानूनी अधिकार प्राप्त कर लिया। सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में लिखा है:-''ये लोग जिस राम के नाम को भजते हैं वे राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम नहीं हैं बल्कि निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम हैं।'' ब्राह्मणों के प्रति इनके मन में जबरदस्त विरोध की भावना है। संभव है उनकी यह भावना उनके द्वारा जातिगत आधार पर दी गयी प्रतारणा का प्रतिफल हो ? यही कारण है कि रामनामी पंथ की सामाजिक संरचना में जन्म से लेकर मृत्यु तक और विवाह से लेकर संतानोपत्ति तक के सारे संस्कार ऐसे बनाये गये हैं जिसमें ब्राह्मणों की आवश्यकता ही न पड़े।       बिलासपुर जिला गजेटियर के अनुसार उनके धार्मिक कार्यो को पंथ के संत सम्पन्न कराते हैं। अगर अति आवश्यक हुआ तो वे ब्राह्मणों को भी आमंत्रित करते हैं।
रेड इंडियन :-
                    रामरमिहा के गुरू और गोसाई लोग रंगीन मोर पंखों वाले बांस के मुकुट धारण करने वाले होते हैं। इस पर भी रामनाम की काली पट्टी लगी रहती है। पत्रकार श्री सतीश जायसवाल इनकी तुलना रेड इंडियन से करते हैं। अपने एक लेख में वे लिखते हैं :- ''इन मुकुटों के कारण ये लोग रंग बिरंगे पंखों की शीश सज्जा करने वाले रेड इंडियनों की तरह नजर आते हैं। वैसे तो भारत में अंडमान द्वीप समूह तथा कुछ आफ्रीकी देशों के जन जातीय कबीलों में वृक्षों की छाल और मिट्टी के नैसर्गिक रंगों से अपने शरीर को चित्रित करने और रंगने की परंपरा है। लेकिन वहां यह सब सजावटी सा होता है। धार्मिक विधि विधान के तौर पर अपने पूरे शरीर में ईश्वर का नाम अंकित करने वाला संभवत: यह दुनिया का एक मात्र समुदाय है। यह समुदाय कोई छोटा मोटा जन जातीय कबीला नहीं बल्कि पांच लाख से भी उपर विशाल जनसंख्या वाले धर्मावलंबियों का एक संगठित पंथ है। जिससे जनतांत्रिक व्यवस्था का सबसे सशक्त अस्त्र अर्थात् मतदान का अधिकार मिला हुआ है।''
आदिवासी परंपरा गोदना :-
                    सौंदर्य वृद्धि के लिये आदिवासी संस्कृति में अंग लेखन और चित्रांकन की परंपरा गोदना अनेक आस्थाओं से जुड़ा है। गोदना आदिवासी महिलाओं का श्रृंगार ही नहीं बल्कि ऐसा परिधान है जो आजीवन तन से जुड़ा रहता है। मान्यता तो यह भी है कि मृत्योपरान्त तो तन के सारे गहने और कपड़े उतारे जा सकते हैं, लेकिन संग तो गोदना ही जाता है। गोदना को लोग ''चिन्हारी'' के रूप में गुदवाते हैं। ऐसे मंे गोदना अगर रामनाम का हो तो सोने में सुहागा ही होगा। अगर किसी रामरमिहा को ध्यान से देखें तो आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है क्योंकि हाथ, पैर यहां तक कि आंखों की पलकों में रामनाम खुदा रहता है। बचपन में रामनाम माथे पर गोदा जाता है। गोदना गोदते समय भजन कीर्तन होता है जिससे मन रामनाम में लीन हो जाये और पीड़ा का आभास तक न हो ? उम्र के हिसाब से शरीर के दूसरे भाग में गोदने का काम किया जाता है। पहले स्याही से रामनाम लिखा जाता है फिर सुई चुभोई जाती है। गोदना गोदने में दो सुई काम में लाई जाती है और काले रंग को अधिक गहरा तथा पक्का बनाने के लिये उस पर उपर से मिट्टी के तेल से निकला धुंआ लगा लेते हैं। गोदना गोदते समय गीत भी गाये जाते हैं :- धूम कुसंगति कालिख होई। लिखिय पुराण मंजु मति होई।।
गोदना गोदने के बाद उसके उपर हल्दी का लेप लगाया जाता हैं गोदना पकने की बात बहुत कम ही सुनने को मिलती है। छत्तीसगढ़ में गोदना गोदने का काम देवारिन महिलाएं करती हैं। गोदना गोदते समय वे अक्सर गाती हैं:
                    ऐ मोर भूरी दीदी-
                    घुरूर घुरूर जाता बाजे माली भर पिसा
                    एक चिरूवा भर दउड़त है किसान।
                    एक चानी भांटा सोर घइला पानी
                    तोर धांगरा दारू पी के पड़ गै उतानी।
पंचायत : एक सर्वमान्य संस्था :-
                    सामाजिक व्यवस्था में जहां चार घर हुये नहीं कि उनमें किसी न किसी बात को लेकर टकराहट अवश्य होती है। रमरमिहा लोग झगड़ों का निपटारा कोर्ट-कचहरी के बजाय अपनी पंचायत में करना ज्यादा पसंद करते हैं। इस पंथ की अपनी पंचायत होती है, जो सर्वमान्य संस्था होती है। रमरमिहा लोगों की सामाजिक पंचायत का गठन पंथ के निर्माण के समय से ही हुआ है। सन् १९६० के पहले तक गुरू प्रथा से पंचों का नामांकन होता था। लेकिन समयानुसार सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन अवश्यसंभावी है। अत: नामांकन प्रथा के बजाय चुनाव प्रक्रिया अपनाया जाने लगा। इस प्रकार सन् १९६० में पहली निर्वाचित पंचायत बनी और उसके बाद से हर वर्ष पंचायत का चुनाव होता है। इस पंचायत में १०० पंच होते हैं। आठ गांव के पीछे एक प्रतिनिधि होता है। ये सब महासभा के प्रतिनिधि कहलाते हैं। इसी महासभा में पदाधिकारियों का निर्वाचन होता है। पंचायत का कार्यक्षेत्र सामाजिक, पारिवारिक झगड़ों का निपटारा करना, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन को मजबूत बनाना और सामूहिक विवाह को सम्पन्न कराना है। लंबे समय तक श्री बोधराम रामनामी पंथ के महामंत्री हैं।
सामूहिक आयोजन : पंथ मेला :-
                    रामनामी पंथ के दो प्रमुख आयोजन होते हैं- एक, रामनवमीं में संत समागम और दूसरा, पौष एकादशी से त्रयोदशी तक चलने वाला तीन दिवसीय मेला। मेला में सामाजिक वाद विवादों, पारिवारिक झगड़ों आदि का फैसला होता है। इसके अलावा महासभा का आयोजन और सामूहिक विवाह भी होते हें। अगला मेला किस स्थान में लगेगा, इसका निर्णय भी यहीं पर हो जाता है। रामनामी मेला महानदी के तटवर्ती ग्रामों में एक बार महानदी के उत्तर में तो दूसरी बार महानदी के दक्षिण में लगता है।
                    रामनामी मेला का आयोजन महानदी के तटवर्ती ग्रामों में लगने के बारे में एक लोककथा प्रचलित है। उसके अनुसार आज से ८५-८५ वर्ष पहले सवारियों से भरी एक नाव महानदी को पार करते समय मझधार में फंस गयी। नाविकों न नाव को किनारे लगाने की बहुत कोशिश की मगर सफलता नहीं मिलीं उस समय ईश्वर ही कोई चमत्कार कर सकता था। नाव में सवार सभी यात्रियों ने मिन्नतें मानने लगे लेकिन इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। संयोग से उस नाव में रामनामी पंथ के प्रवर्तक श्री परसराम भारद्वाज और उनके अनुयायी भी सवार थे। सबने उनसे भी मिन्नतें मानने का अनुरोध किया। तब उन्होंने भी मिन्नतें मानी :- ''यदि मझधार में फंसी नाव सकुशल किनारे लग जायेगी तो रामनामी समाज द्वारा महानदी के दोनों किनारों पर रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन करेगी।'' आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उनके इस प्रकार मिन्नत मानते ही नाव सकुशल किनारे लग गयी। तब से प्रतिवर्ष महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रामनाम का भजन-कीर्तन का आयोजन होने लगा जो आगे चलकर रामनामी सम्मेलन और मेला का रूप ले लिया।
                    तीन दिवसीय मेला के पहले दिन मेला स्थल में निर्मित जय स्तम्भ के उपर कलश चढ़ाया जाता है। दूसरे दिन रामायण पाठ, रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। मेला के अंतिम दिन सामूहिक विवाह और सामूहिक भोजन-भंडारा का आयोजन होता है। मेला स्थल के आस पास जुआ, मांस-मदिरा और वेश्या गमन जैसी कुप्रथा पूर्णत: प्रतिबंधित होता है। रामलीला मेला का प्रमुख आकर्षण होता है। मेला स्थल के मध्य में १३ फीट ऊंचे जय स्तम्भ का निर्माण किया जाता है और चबुतरे में भी रामनाम अंकित होता है। इस चबुतरे पर रामचरित मानस की प्रति रख दी जाती है। फिर रामनाम कीर्तन होता है जिसमें वाद्य यंत्रों के बजाय घुंघरू मंडित लकड़ी के चौके से ध्वनि और ताल निकाला जाता है तथा मयूर पंख से सुसज्जित तंबूरे से वातावरण राममय हो जाता है। विवाह के समय वर-वधू की जय स्तम्भ और रामायण को साक्षी मानकर सात फेरा लेवाया जाता है। फेरा के पूर्व महासभा के समक्ष वर और वधू पक्ष को विधिवत घोषणा पत्र भरना पड़ता है और संस्था का निर्धारित शुल्क ११-११ रूपये देना पड़ता है। दहेज मांगना और तलाक लेना पूर्णत: वर्जित है। हालांकि विधवा महिला के माथे पर रामनाम देखकर कोई व्यक्ति उनसे पुनर्विवाह कर सकता है।

रविवार, 3 जुलाई 2011

छत्तीसगढ़ के साहित्यिक परिदृश्य का साक्षी श्यामा

    भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी और मित्र, विजयराघवगढ़ के राजकुमार तथा सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह के लिए छत्तीसगढ़ की धरती, पहाड़, जंगल और नदी-नाले वरदान साबित हुआ। ब्रिटिश शासकों ने बनारस के वार्ड्स इंस्टीट्यूट से शिक्षा प्राप्त ठाकुर जगमोहनसिंह को सन् 1880 में नायब तहसीलदार बनाकर छत्तीसगढ़ के धमतरी भेजा तब उनकी मंशा रही होगी कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में वह मर खप जायेगा और अपने राज्य की ओर ध्यान नहीं दे सकेगा ? मगर छत्तीसगढ़ प्रवास उनके लिए वरदान साबित हुआ। ठाकुर साहब सन् 1880 से 1882 तक धमतरी में और उसके बाद 1887 तक शिवरीनारायण तहसील के तहसीलदार रहे। उन्हें यहां की सोंधी मिट्टी, नदी, नाले, जंगल और पहाड़ की प्राकृतिक सौंदर्य बहुत अच्छा लगा, उनकी रचनाएं इसका साक्षी है। शिवरीनारायण में भगवान शबरीनारायण का आशीर्वाद, चित्रोत्पलागंगा का संस्कार और सत्पुरूषों का सानिघ्य मिला। यहां उनका कवि मन न केवल जागा बल्कि उसे समेटने के लिए उन्हें कोरे कागजों को रंगना पड़ा। लगभग एक दर्जन पुस्तकों का न केवल लेखन बल्कि उसका प्रकाशन करके वे अमर हो गये। हिन्दी साहित्य के इतिहास में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों को भले ही स्थान न मिला हो मगर ठाकुर साहब की साहित्यिक प्रतिभा को अवश्य स्थान दिया गया है। उन्होंने शिवरीनारायण में बनारस के ‘भारतेन्दु मंडल‘ की तर्ज में ‘जगन्मोहन मंडल‘ बनाया और यहां के बिखरे साहित्यकारों को एकसूत्र में पिरोकर उन्हें लेखन की एक दी । उस काल के साहित्यकारों में पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविंद साव, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, शिवरीनारायण, पंडित अनंतराम पांडेय रायगढ़, पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय परसापाली-रायगढ़, वेदनाथ शर्मा बलौदा, पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय बालपुर, जगन्नाथ प्रसाद भानु, पृथ्वीपाल तिवारी बिलाईगढ़, के नाम उल्लेखनीय तो है ही उसके पूर्व और बाद के साहित्यकारों की भी लंबी श्रृंखला है। इससे छत्तीसगढ़ के साहित्यकाश को हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों द्वारा उपेक्षा करने की बातों की पुष्टि होती है। ठाकुर जगमोहनसिंह हिन्दी के प्रसिद्ध प्रेमी कवियों रसखान, आलम, घनानंद, बोधा ठाकुर और भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परंपरा के अंतिम कवि थे जिन्होंने प्रेममय जीवन जीया और जिनके साहित्य में प्रेम की उत्कृष्ट और स्वभाविक अभिव्यंजना हुई है। प्रेम को उन्होंने जीवन दर्शन के रूप में स्वीकार किया था।
    उपर्युक्त तथ्यों को ठाकुर जगमोहनसिंह की रचनाओं के संग्रह ‘‘श्यामा‘‘ में संग्रहित और संपादित करने वाले प्रो. अश्विनी केशरवानी भी महानदी से संस्कारित पौध हैं। उन्होंने इस पुस्तक में ठाकुर साहब की शिवरीनारायण से संबंधित रचनाओं जैसे सज्जनाष्टक, प्रलय, श्यामा सरोजनी के साथ नवोढ़ादर्श और पं. रामलोचन त्रिपाठी का जीवन वृत्तांत को संग्रहित किया है। उनकी मंशा शिवरीनारायण के साथ पूरे छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पृष्टभूमि को रेखांकित करना है। द्विवेदी कालीन अनेक साहित्यकारों ने भी उल्लेखनीय साहित्य की रचना की और राष्टीय परिदृश्य में स्थान बनाया। 
    ठाकुर जगमोहनसिंह ने शिवरीनारायण के आठ सज्जन व्यक्तियों के व्यक्तित्व का रेखांकन ‘सज्जनाष्टक‘ में किया है जो सन् 1884 में भारत जीवन प्रेस बनारस से प्रकाशित हुआ। देखिये उसकी एक बानगी-
        रहत ग्राम एहि बिधि सबै सज्जन सब गुन खान।
        महानदी सेवहिं सकल जननी सब पय पान।।
प्रलय में 1885 में महानदी के बाढ़ और उससे होने वाली तबाही का सुंदर छंद में वर्णन है ः-
        शिव के जटा विहारिनी बही सिहावा आय।
        गिरि कंदर मंदर सबै टोरि फोरि जल जाय।।
        राजिम, श्रीपुर से सुभग चम्पव उद्यान।
        तीरथ शिबरी विश्णु को तारत वही सुजान।।
        सम्बलपुर चलि कटक लौ अटकी सरिता नाहि।
        सरित अनेकन लय कटकपुरी पहुंच जल जाहि।।
    हालांकि इस पुस्तक में ठाकुर साहब की बहुचर्चित उपन्यास श्यामा को सम्मिलित नहीं किया गया है मगर उसके बारे में अवश्य लिखा गया है। उनकी कृतियां आज उपलब्ध नहीं है, मगर जो उपलब्ध है उसका संग्रह और प्रकाशन करना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है।
                               
                                            समीक्षक
                                          प्रांजल कुमार,
                                    वेन, न्यू जर्सी, यू.एस.ए.  

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

शिवरीनारायण की रथयात्रा

शिवरीनारायण की रथयात्रा      

  महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी`` के नाम से विख्यात शिवरीनारायण बिलासपुर से ६४ कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार से होकर १२० कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से ६० कि. मी., कोरबा जिला मुख्यालय से ११० कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होकर ११० कि. मी. की दूरी पर अवस्थित है। अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात यह नगर मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम और शबरी की साधना स्थली भी रहा है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित किये थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए
'शबरी-नारायण` नगर बसा है। भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहां गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्त तीर्थधाम`` कहा गया है। याज्ञवलक्य संहिता और रामावतार चरित्र में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदंती के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है।
 स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ''श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र`` कहा गया है। प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर ''नीलमाधव`` कहा गया। इसी नीलमाधव को १४ वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है। डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने ''कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` और ''कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला`` में लिखते हैं-''भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाला पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति ने संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने ''वज्रयान बुद्धिज्म`` की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।
इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ''रोहिणी कुंड`` विद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है-''रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर`` जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है :-
                                    रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।
                                    योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।
तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमश: आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूंकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहां के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्री गण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घूमते हुए रत्नपुर पहुंचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रत्नपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुंचे तब वहां के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहां रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहां के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में १४ महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, अध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मदद भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक ''गांधी चौरा`` का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गांधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत उपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक ''नाथ गुफा'' के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।
शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् १९२७ में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् १९२७ में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ''जोगीडीपा`` कहते हैं। रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ''जनकपुर`` भी कहा जाता है। पहले रथयात्रा में पंडित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आज केवल मठ की मूर्तियां ही रथ में निकाले जाते हैं।
रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूआत की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा। उन्होंने ही यहां रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह-जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है। इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नये दुकानों की शुरूआत और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहां श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। शिवरीनारायण को ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी`` कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है। इसी लिए प्राचीन कवि श्री बटुसिंह शिवरीनारायण माहात्म्य में गाते हैं-
                                    मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
                                    दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।
जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी को ''स्वर्गद्वार'' कहा जाता है और कोढ़ियों का उद्धार होता है। उसी प्रकार शिवरीनारायण की भी महत्ता है। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण-सिंदूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं :-
                                    क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।
                                    कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।
शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड में एक पुराना कोढ़ी खाना है और यहां एक लेप्रोसी विशेषज्ञ के रूप में डॉ. एम. एम. गौर की नियुक्ति भी हुई थी। बाद में उन्हीं के सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना की गयी थी। शिवरीनारायण से पांच कि.मी. की दूरी पर स्थित दुरपा गांव को अंग्रेज सरकार द्वारा ''लेप्रोसी गांव'' घोषित किया गया था। इस गांव में आना-जाना पूर्णत: प्रतिबंधित था। शिवरीनारायण से ७० कि.मी. पर चांपा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार बिलासपुर रायपुर रोड में बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है, जहां कोढ़ियों का इलाज होता है और अनेक प्रकार के उद्योग उनके द्वारा चलाये जाते हैं। उनके बच्चों के रहने और पढ़ने आदि का पूरा इंतजाम किया जाता है। सरकार इस संस्था को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करती है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है :-
                                    शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।
                                    याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।
ऐसे पवित्र और तीर्थ नगर शिवरीनारायण को नारायण धाम के रूप में जाना जाता है। यहां भगवान विश्णु के चतृर्भुजी मूर्तियों की अधिकता है। यहां एक प्राचीन वैष्णव मठ भी है। कदाचित इसी कारण इसे विष्णुकांक्षी तीर्थ नगर कहा जाता है। चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर अवस्थित शिवरीनारायण में प्राचीनता के अवशेष मिलते हैं। सभी युग में इस नगर का अस्तित्व था और इसे अनेक नामों से जाना जाता था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शिवरीनारायण माहात्म्य में लिखते हैं :-
                                    नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक
                                    प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूं नेक
                                    चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम
                                    बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम
                                    भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास
                                    कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।