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मंगलवार, 13 मार्च 2012

छत्तीसगढ़ के इनसाइक्लोपीडिया प्यारेलाल गुप्त

१७ अगस्त को जयंती के अवसर पर 
छत्तीसगढ़ के इनसाइक्लोपीडिया प्यारेलाल गुप्त 
प्रो अश्विनी केशरवानी    
 प्यारेलाल गुप्त जी का जन्म 17 अगस्त 1891 में कबीरधाम जिलान्तर्गत कवर्धा से 15 कि.मी. पर स्थित ग्राम पिपरिया में हुआ। उनके पिता श्री कुशलप्रसाद गुप्त एक शिक्षक थे। नौकरी की तलाश में उनका परिवार पिपरिया से रतनपुर आ गया था। उनकी प्राथमिक शिक्षा रतनपुर में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें बिलासपुर आना पड़ा। यहां उन्होंने मेट्रिक पास की लेकिन पारिवारिक समस्या के कारण वे आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सके। परिस्थितियां उन्हें पढ़ाई को अधूरा छोड़कर जीविका के साधन तलाशने पर मजबूर कर दिया। वे 20 वर्ष की अल्पायु में ही सरकारी नौकरी में आ गये थे। उन्होंने अपने पिता के सादगीपूर्ण जीवन को अपनाया। उनमें लेखन का संस्कार पिता से विरासत में मिला। उल्लेखनीय है कि उनके पिता ने ‘राधाकृष्ण विहार‘ नामक काव्य की रचना ब्रजभाषा में की थी, जो प्रकाशित नहीं हो सकी थी। बाल्यावस्था से ही प्यारेलाल जी लिखने लगे थे। उनकी पहली कहानी ‘लाल बैरागिन‘ काशी से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘इन्दु‘ में प्रकाशित हुई। इस कहानी से उन्हें लोगों की सराहना मिली और उनकी लेखनी चलने लगी। गुप्त जी ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘प्राचीन छत्तीसगढ़‘ है। रविशकर वि”वविद्यालय रायपुर से सन् 1973 में प्रकाशित इस ग्रंथ में प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक युग के पूर्व तक का श्रृंखलाबद्ध इतिहास है। इस ग्रंथ में न केवल प्राचीन छत्तीसगढ़ का इतिहास बल्कि सांस्कृतिक परम्पराओं, लोक कथाओं, पुरातत्व और साहित्य का उल्लेख है। इस ग्रंथ को ‘छत्तीसगढ़ का इनसाइक्लोपीडिया‘ माना जा सकता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की पदयात्रा करके इस ग्रंथ के लिए सामग्री जुटायी थी। इसके अलावा फ्रांस की राज्यक्रांति का इतिहास, ग्रीस का इतिहास, बिलासपुर वैभव, श्रीविष्णुस्मारकयज्ञ, सुखी कुटुम्ब (उपन्यास), सरस्वती (मराठी से अनुदित उपन्यास), लवंगलता (सामाजिक उपन्यास), पुष्पहार (कहानी संग्रह), एक दिन (नाटक), सहकारी सभा हिसाब किताब दर्पण, स्व. लोचनप्रसाद पांडेय की जीवनी प्रकाशित कृतियां हैं। फ्रांस की राजक्रांति का इतिहास और ग्रीस का इतिहास हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की परीक्षाओं में लगभग 25 वर्षो तक पाठ्य पुस्तक के रूप में अनुशासित थी। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और आकाशवाणी से उनकी रचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण होता था। पंडित शुकलाल पांडेय ‘छत्तीसगढ़ गौरव‘ में श्री प्यारेलाल गुप्त के बारे में लिखते हैं-
        बुधवर रामदयालु, स्वभाषा गौरव केतन।
        ठाकुर छेदीलाल विपुल विद्यादि निकेतन।
        द्विजवर सुन्दरलाल मातृभाषा तम भूषण।
        बाबू प्यारेलाल देश छत्तीसगढ़ भूषण।
        लक्ष्मण गोविन्द रघुनाथ युग महाराष्ट्र नर-कुल-तिलक।
        नृप चतुर चक्रधर लख जिन्हें हिन्दी उठती है किलक।।163।।
    उल्लेखनीय है कि प्यारेलाल गुप्त को ‘छत्तीसगढ़ भूषण‘ कहा जाता है। कदाचित् किसी साहित्यिक संस्था के द्वारा उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया था। इसके अलावा उन्हें हिन्दी ग्रंथमाला कार्यालय वाराणसी से सर्वश्रेष्ठ कहानी लिखने का रजत पदक मिला। सन् 1966 में भारतेन्दु साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा अभिनन्दन पत्र प्रदानकर अभिनन्दन ग्रंथ लोकार्पित किया गया। 14 सितंबर 1971 को हिन्दी दिवस के अवसर पर उन्हें हिन्दी साहित्य मंडल देशबंधु संघ रायपुर द्वारा सम्मान पत्र प्रदान किया गया। बेमेतरा के महाविद्यालयीन हिन्दी साहित्य परिषद द्वारा अभिनन्दन पत्र प्रदान किया गया। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के राजनांदगांव सम्मेलन में उन्हें अभिनन्दन पत्र प्रदान किया गया। इसके अलावा वे कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित हुए।
       ‘धरती के सिंगार‘ की एक बानगी पेश है ः-
        सावन भादों निखर रहे हैं, धरती के सिंगार में
        नूतन पी के पनप रहे हैं, हर पौधे के प्यार में।
‘रत्नपुर महिमा‘ लिखकर वहां की महत्ता को रेखांकित करने का सद्प्रयास किया है-
        मुकुट है जिसका राम पहाड़ी
        विक्रम (भिखमा) दुलहरा जिसके कुंडल
        गले में बसते श्री वृद्ध शंभू
       पश्चिम दिशा में है श्री भवानी
        श्री भैरव जिसके द्वार हैं रक्षक
        हृदय पर बसते बिट्ठल प्रभू हैं
        जो था कहाता लहुरी काशी
        विद्वज्जनों की शुभ राजधानी।
    श्री प्यारेलाल गुप्त ने रतनपुर, बिलासपुर, कोरबा और रायपुर में रहकर साहित्यिक साधना किया।      डाॅ. रामकुमार बेहार कहते हैं कि ‘बाबु प्यारेलाल गुप्त रत्नपुर के रत्न, रायपुर के प्यारे और छत्तीसगढ़ के लाल थे। छत्तीसगढ़ को अपने इस लाल पर गर्व है। छत्तीसगढ़ का समाज, धर्म, दर्शन, इतिहास, वन, खनिज सबके बारे में पर्याप्त जानकारी रखने वाले गुप्त जी को सांस्कृतिक चेतना के संवाहकों में गिना जाना ही उनका सही मूल्यांकन होगा।‘ वे पंडित लोचनप्रसाद पांडेय के बहुत अच्छे मित्र थे। श्री जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ के सानिघ्य में भी आये। बिलासपुर के भारतेन्दु साहित्य समिति के संस्थापकों में से एक हैं और जीवनपर्यन्त प्रधान सचिव रहे। श्री द्वारिकाप्रसाद तिवारी ‘विप्र‘ के निकट सहयोगी थे। विप्र जी उन्हें अपने साहित्यिक सचेतक मानते थे। डाॅ. रमेन्द्रनाथ मिश्र इतिहास के विद्यार्थी होने के नाते गुप्त जी के बहुत निकट रहे। वे छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन बिलासपुर और संभागीय सम्मेलन के अध्यक्ष रहे। वे महाकोसल इतिहास परिषद के सहायक सचिव और बाद में अध्यक्ष थे। वे 22 वर्षो तक बिलासपुर सहकारी बैंक के व्यवस्थापक रहे।
    ‘प्राचीन छततीसगढ़‘ के प्राक्कथन में रविशंकर विशवविद्यालय रायपुर के तत्कालीन कुलपति    श्री जगदीशचन्द्र दीक्षित ने लिखा है ः-‘प्राचीन काल से लेकर मराठा युग एवं ब्रिटिश काल के आरंभ युग तक के इतिहास को संकलित करके एक कृति में प्रस्तुत करने का प्रथम प्रयास श्री प्यारेलाल गुप्त ने अपने ग्रंथ ‘प्राचीन छत्तीसगढ़‘ में किया है। इस ग्रंथ के प्रणयन में लेखक को निरंतर सात वर्ष तक परिश्रम करना पड़ा, गुप्त जी का यह प्रयास निःसंदेह शलाघनीय है।‘ सुप्रसिद्ध इतिहासकार श्री ओ. पी. भटनागर ने श्री प्यारेलाल गुप्त की प्रशंसा में लिख है-‘ गुप्त जी का प्राचीन छत्तीसगढ़ अपने ढंग का अनूठा ग्रंथ है। छत्तीसगढ़ पर अनेक ग्रंथ और लेख लिखे गये हैं मगर गुप्त जी जैसा मेहनत किसी ने नहीं किया है।
    सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री मुकुटधर पांडेय जी गुप्त जी के बारे में लिखते हैं -‘स्व. प्यारेलाल गुप्त जी उन बहुत थोड़े लोगों में से थे जिन्होंने यश या धन के लोभ से नहीं, केवल कर्तव्य बुद्धि से हिन्दी की सेवा की थी। जीविका का साधन मानकर हिन्दी की सेवा करने वालों की संख्या आज कम नहीं है, पर गुप्त जी ने जिस समय हिन्दी की सेवा आरंभ की उस समय समाज की कुछ और ही स्थिति थी। उस समय त्याग और सेवा की भावना को लेकर ही लोग साहित्य के क्षेत्र में कार्य करते थे, आर्थिक लाभ का कोई प्र”न ही नहीं था।‘ वे आगे लिखते हैं -‘वे मेरे स्व. पूज्याग्रज पंडित लोचनप्रसाद पांडेय के मित्रों में से थे। मैं उनसे सन् 1915 में परिचित हुआ। सन् 1917-18 के लगभग वे श्री दीनानाथ दाऊ के साथ प्रथम बार हमारे गांव बालपुर पधारे थे। 6-7 घंटे लगातार बैलगाड़ी में बैठकर रायगढ़ से लगभग 20 मील दूर बालपुर पहुंचे थे, तब कोई बस सर्विस नहीं थी। आजकल तो लोग इतने आत्म केंद्रित हो रहे हैं कि सबसे पहिले अपना आराम देखते हैं। इतना क’ट उठाकर गांव ंपहुंचना उनके विशुद्ध साहित्य प्रेम का परिचायक था। दूसरी बार वे सन् 1929 में हमारे पूज्य पितृदेव द्वारा स्थापित ग्राम पाठशाला की स्वर्ण जयंती उत्सव पर बालपुर आये थे। उन्होंने आत्मप्रचार व स्वविज्ञापन से दूर अंतिम समय तक हिन्दी की सेवा की और 14 मार्च 1976 को कभी न भरने वाली रिक्तता बनाकर स्वार्गारोहण किये। स्व. गुप्ता जी का आज तक सही मूल्यांकन नहीं हो सका है। आज जब छत्तीसगढ़ पृथक अस्तित्व के साथ एक पूर्ण प्रदेश है तब उनकी दुर्लभ और अप्राप्य ‘प्राचीन छत्तीसगढ़‘ का पुर्नप्रकाशन किया जाना समीचीन ही नहीं बल्कि अपरिहार्य है। उनके हिन्दी और छत्तीसगढ़ी काव्य और अन्य कृतियों को संग्रहीत कर ‘प्यारेलाल गुप्त ग्रंथावली‘ प्रकाशित किया जाना चाहिये। साथ ही उनके नाम पर हर साल शासन द्वारा पुरस्कार दिया जाना चाहिये। यही उनके प्रति सही श्रद्धांजलि होगी और उनका ग्रंथ हर पाठक के हाथ में होगा, तभी उनका सही मूल्यांकन हो सकेगा।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

संस्कृतनिष्ठ कवि चिरंजीवदास

       सभ्यता के विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। गिरि-कंदराओं से निकलकर धरती के गर्भ को पवित्र करती ये नदियां क्षेत्रों और प्रदेशों को सिंचित ही नहीं करती बल्कि दो या दो से अधिक प्रदेशों की सभ्यता और वहां की सांस्कृतिक परम्पराओं को जोड़ने का कार्य करती है। रायगढ़, छत्तीसगढ़ प्रांत का एक प्रमुख सीमावर्ती जिला मुख्यालय है। इस जिले की सीमाएं बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश से जुड़ती है। अत: स्वाभाविक रूप से यहां उन प्रदेशों को प्रभाव परिलक्षित होता है। यहां की सभ्यता, रहन सहन, और सांस्कृतिक परम्पराओं का सामीप्य उड़ीसा से अधिक है। पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का पूर्वी भाग उिड़या भाषी सम्बलपुर से जुड़ा था। यहां मिश्रित परम्पराएं देखने को मिलती हैं।
केलो नदी के तट पर बसा रायगढ़ पूर्व में छत्तीसगढ़ का एक ``फ्यूडेटरी स्टे्टस`` था। यहां के राजा कला पारखी, संगीत प्रेमी और साहिित्यक प्रतिभा के धनी थे। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यहां का गणेश मेला एक उत्सव हुआ करता थाण्ण्ण्और इस उत्सव में हर प्रकार के कलाकार, नर्तक, नाटक मंडली और साहित्यकार आपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके यथोचित पुरस्कार और सम्मान पाता था। इस प्रकार रायगढ़ सांस्कृतिक और साहिित्यक तीर्थ के रूप में ख्याति प्राप्त किया। संगीत और नृत्य के साथ साथ साहित्य के क्षेत्र में यहां अनेक मूर्धन्य साहित्यकार पुरस्कृत हुए। यहां के राजा चक्रधरसिंह स्वयं एक उच्च कोटि के साहित्यकार और कला पारखी थे। उनकी सभा में साहित्यकारों की भी उतनी ही कद्र होती थी जितनी अन्य कलाकारों की होती थी। उनके राज्य के अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी साहिित्यक अभिरूचि के थे। ऐसे साहित्यकारों की लंबी श्रृंखला है। उन्हीं में से एक कड़ी के रूप में श्री चिरंजीवदास भी थे। श्री चिरंजीवदास रायगढ़ के सीमावर्ती ग्राम कांदागढ़ में श्री बासुदेव दास के पुत्ररत्न के रूप में पौष शुक्ल त्रयोदशी संवत् 1977, तद्नुसार 21 जनवरी 1920 ईण् को हुआ। उनका बचपन गांव की वादियों में गुजरा। उनकी शिक्षा दीक्षा रायगढ़ में ही हुई। वे सन् 1938 में नटवर हाई स्कूल से मेट्रीकुलेशन की परीक्षा पास करके 06 अप्रेल 1942 को तत्कालीन रायगढ़ रियासत में लिपिक पद पर नियुक्त हुये। इस पद पर कार्य करते हुए स्वाध्यायी होकर अध्ययन किये। उिड़या उनकी मातृभाषा थी। अत: स्वाभाविक रूप से उिड़या साहित्य में उनकी रूचि थी। इसके अलावा अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा में भी उनकी अच्छी पकड़ थी। यहां की प्राकृतिक सुषमा, केलो नदी का झर झर करता प्रवाह, पहािड़यों और वनों की हरियाली उनके कवि मन को जागृत किया और वे काव्य रचना करने लगे। उन्होंने हिन्दी और उिड़या दोनों भाषा में काव्य रचना की है।
      10 मार्च सन् 1994 को भारतेन्दु साहित्य समिति बिलासपुर के खरौद ग्रामीण शिविर में मेरा उनका साहिित्यक परिचय हुआ। इस शिविर में मैंने अपना आलेख ``खरौद और शिवरीनारायण का पुराताित्वक महत्व`` पढ़ा था। मेरे इस आलेख से अनेक साहित्यकार प्रभावित होकर प्रसन्नता व्यक्त किये थे। तब मैं श्री चिरंजीवदास की सादगीपूर्ण व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुआ था। श्री स्वराज्य करूण ने उनके व्यक्तित्व को बहुत अच्छे ढंग से रेखांकित किया है-``आडंबर और आत्म प्रचार के अंधे युग में पहुंच के जरिये अपनी पहचान बनाने वालों की भीड़ समाज के लगभग सभी क्षेत्र में हावी है। लेकिन श्री चिरंजीवदास का व्यक्तित्व और कृतित्व इस तरह की भीड़ से एकदम अलग है। अनेक वर्षो से सरस्वती की मौन साधना में लगे श्री चिरंजीवदास अपनी पहचान के संकट से बिल्कुल निश्चिंत नजर आते हैं। दरअसल उनकी तमाम चिंताएं तो विश्व की उस प्राचीनतम भाषा के साथ जुड़ गई है जो सभी भारतीय भाषाओं की जननी होकर भी अपने ही देश में अल्प मत में है।`` डॉण् प्रभात त्रिपाठी लिखते हैं-``संस्कृत साहित्य के रस मर्मज्ञ चिरंजीवदास का सृजनशील व्यक्तित्व अनेकायामी है। हिन्दी के अधिकांश पाठक उन्हें अनुवादक के रूप में जानते हैं। श्री दास के द्वारा किये गये अनुवाद वस्तुत: उनके सृजनात्मक कल्पना के ही प्रतीक हैं। इन अनुवादों के कारण उन्हें सृजन का एक ऐसा संस्कार प्राप्त हुआ है जिसके कारण उन्होंने साहित्य के सौंदर्य और मनुष्य के अस्तित्व के प्रश्नों को कभी अखबारी जल्दबाजी में नहीं देखा। अगर प्रसिद्ध कवि और आलोचक श्री अशोक बाजपेयी का शब्द उधार लेकर कहें तो श्री चिरंजीवदास समकालीनता से मुक्त हैं। उनकी कविता मुख्य रूप से संस्कारधमीZ ललित कल्पना से ही निर्मित है। छायावादोत्तर युग की काव्य भाषा में पौराणिक कल्पनाओं के सजग प्रयोग के साथ उन्होंने इस यंग की असीम सभ्यता को भी गहराई से मूर्त करने की कोशिश की है। उनकी अपनी कविता प्रेम और प्रगति के सबल आधारों पर टिकी है। उसमें परंपरागत प्रबंधात्मकता और प्रासंगिक आधुनिकता के अतिरिक्त निजी अनुभूति का खरापन भी सक्रिय है।``
        पूर्वी मध्यप्रदेश में रायगढ़ शहर के वाशिदें चिरंजीवदास उसी संस्कृत भाषा के एकांत साधक और हिन्दी अनुवादक हैं, जो सभी भाषाओं की जननी है। उनके द्वारा किये गये अनुवाद का यदि सम्पूर्ण प्रकाशन हो तो प्राचीनतम संस्कृत भाषा और हिन्दी जगत के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क सेतु बन सकता है। सन 1960 में महाकवि कालिदास के मेघदूत ने उन्हें अनुवाद करने की प्रेरणा दी। हिन्दी और उिड़या भाषा में कविताएं तो वे सन् 1936 से लिखते आ रहे हैं। लेकिन पिछले 34 वर्षो में उन्होंने मेघदूत के अलावा कालिदास के ऋतुसंहार, कुमारसंभव और रघुवंश जैसे सुप्रसिद्ध महाकाव्यों के साथ साथ जयदेव, भतृZहरि, अमरूक और बिल्हण जैसे महाकवियों की संस्कृत रचनाओं का सुन्दर, सरल और सरस पद्यानुवाद भी किया है। उमर खैय्याम की रूबाईयों के फिट्जलैंड द्वारा किये गये अंग्रेजी रूपांतरण का दास जी ने सन् 1981 में उिड़या पद्यानुवाद किया है। प्रकाशन की जल्दबाजी उन्हें कभी नहीं रही। शायद इसीकारण उनके द्वारा 1964 में किया गया ऋतुसंहार का हिन्दी पद्यानुवाद अभी प्रकाशित हुआ है। सिर्फ ऋतुसंहार ही क्यों, सन् 1962 में जयदेव कृत गीतगोविंद, सन् 1972 में महाकवि अमरूक उचित शतक और सन् 1978 में महाकवि बिल्हण कृत वीर पंचाशिका के हिन्दी पद्यानुवाद अभी अभी प्रकाशित हुआ है। इसे दुभाZग्य ही कहा जाना चाहिए कि ऐसे उत्कृष्ट रचनाओं को प्रकाशित करने वाले प्रकाशक हमारे यहां नहीं हैं। इन पुस्तकों को श्री दास ने स्वयं प्रकाशित कराया है। इसी प्रकार सन् 1979 में उन्होंने महाकवि हाल की प्राकृत रचना गाथा सप्तशती का हिन्दी पद्यानुवाद किया है। इसके पूर्व कालिदास के मेघदूत का सन् 1960 में, कुमारसंभव का 1970 में और रघुवंश का 1974 में पद्यानुवाद वे कर चुके थे। उनकी अधिकांश पुस्तकें अभी तक अप्रकाशित हैं। आधी शताब्दी से भी अधिक से सतत जारी अपनी इस साहिित्यक यात्रा में श्री चिरंजीवदास एक सफल आध्याित्मक साहित्यकार और अनुवादक के रूप में रेखांकित होते हैं। अपनी साहिित्यक यात्रा के प्रारंभिक दिनों का स्मरण करते हुये वे बताते हैं-`` जब मैं 15-16 वर्ष का था, तभी से मेरे मन में काव्य के प्रति मेरी अभिरूचि जागृत हो चुकी थी। मैं हिन्दी में कविताएं लिखता था। सन् 1960 में महाकवि कालिदास का मेघदूत को पढ़कर लगा कि संस्कृत के इतने सुंदर काव्य का यदि हिन्दी में सरस पद्यानुवाद होता तो कितना अच्छा होता ? और तभी मैंने उसका पद्यानुवाद करने का निश्चय कर लिया।`` श्री दास ने मुझे बताया कि अनुवाद कर्म में मुझे हिन्दी और उिड़या भाषा ने हमेशा प्रेरित किया। क्योंकि ये दोनों भाषा संस्कृत के बहुत नजदीक हैं। संस्कृत के कवियों में महाकवि कालिदास की रचनाओं ने चिरंजीवदास को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। वे कहते हैं कि कालिदास के काव्य का आयाम बहुत विस्तुत है, विशेषकर रघुवंश में उनकी सम्पूर्ण विचारधारा भारतीय संस्कृति के प्रति उनका अदम्य प्रेम, आर्य परंपरा के प्रति अत्यंत आदर और लगाव स्पष्ट है।
         उनकी आरंभिक रचनाओं में छायावादी काव्य संस्कारों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी कविताओं में शिल्प के पुरानेपन के बावजूद कुछ ऐसे अछूते विषय भी हैं जिन पर कविता लिखने की कोशिश ही उनके अंतिर्नहित नैतिक साहस को प्रदर्शित करता है। ऋग्वेद के यम और यमी पर लिखित उनकी सुदीघZ कविता इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त कथात्मक आधार पर लिखी गयी ``रति का शाप`` और उड़ीसा की लोकगाथा पर आधारित ``केदार गौरी`` जैसे प्रबंध कविताओं में भी हम स्त्री-पुरूष के अनुराग की ओर उनके गहन संपर्क की रंगारंग अभिव्यक्ति देखते हैं। मुक्त छेद में लिखी गई उनकी अनेक कविताएं इसके प्रमाण हैं। आज से 50 वर्ष पूर्व उनकी कविताओं में प्रगतिशील दृष्टि मौजूद थी। आदिवासी लड़की पर लिखी ``मुंडा बाला`` कविता उनके सौंदर्य बोध और उनकी करूणा को मूर्त करने वाली कविता है। मैं डॉण् प्रभात त्रिपाठी के इस विचार से पूरी तरह सहमत हूं कि ``आधुनिक हिन्दी कविता के संदर्भ में उनकी कविता को पढ़ना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है कि उनकी कविताओं में विस्तृत कर दी गयी शब्दावली के पुनर्वास का सार्थक प्रयास है। संस्कृत के वर्णवृथी के अतिरिक्त उिड़या एवं बंगला के लयात्मक संस्कारों को धारण करने वाली उनकी कविता हमारी जातीय स्मृतियों की जीवंतता को उजागर करती है। केवल शािब्दक चमत्कार के स्तर से गहरे उतरकर वे इस शब्दावली में अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा एक नई अर्थवत्ता रचते हैं। अपने व्यक्त रूप में उनकी कविता का आकार पुरातनपंथी सा लग सकता है किंतु यह अनेक आवाजों से बनी कविता है। एक गंभीर हृदय के लिए यह कविता आ अजस्र अवकाश है। काल और कालातीत इतिहास और पुराण लोक और लोाकोत्तर को एक दूसरे से मिलाने की कोशिश करती श्री चिरंजीवदास की कविताएं इन्ही काव्य परंपरा की सार्थक और गंभीर रचना है।``
      देशी रियासतों के मध्यप्रदेश में विलीनीकरण हो जाने पर श्री चिरंजीवदास की सेवाएं मण्प्रण्शासन द्वारा गृहित कर ली गई। शासकीय सेवा में कार्य करते हुए उन्होंने अपनी साहिित्यक यात्रा जारी रखी। इस बीच वे संस्कृत साहित्य की ओर उन्मुख हुए। इसी का परिणाम है कि वे सेस्कृत भाषा में लिखित पुस्तकों का हिन्दी पद्यों में अनुवाद किये। इसीलिए उनके काव्यों में संस्कृत शब्दों का पुट मिलता है। 31 जनवरी सन् 1979 को लेखाधिकारी (राजस्व) के पद से सेवानिवृत्त होकर केलो नदी के तट पर स्थित अपने निवास में साहिित्यक साधना में रत रहे। ऐसा कोई साहिित्यक व्यक्ति रायगढ़ में नहीं हैं जो उनसे किसी न किसी रूप में जुड़े हों ? जब भी आप उनके निवास में जाते तो उन्हें अध्ययनरत ही पातेण्ण्ण्समय का सदुपयोग करना कोई उनसे सीखे। उनकी मौन साधना का ही परिणाम है कि अब तक वे दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें लिखी और अनुवाद किया है। उनकी प्रकाशित कृतियों में रघुवंश, ऋतुसंहार, गीतगोविंद, अमरूक शतक, चौर पंचाशिका और संचारिणी प्रमुख है। उनकी अप्रकाशित कृतियों में कुमारसंभव, मेघदूत, रास पंचाध्यायी, श्रीकृष्ण कर्णमृत, किशोर चंदानंदचंपू, भतृZहरि, शतकत्रय रसमंजरी और आर्य सप्रशनी प्रमुख है। उन्होंने फिट्जलैंड की अंग्रेजी रचना का उिड़या में ``उमर खैय्याम`` शीर्षक से पद्यानुवाद किया है।
       उनकी रचनाओं में उत्कृष्ट रचनाकार कालिदास की रचनाओं का अनुवाद प्रमुख है। उन्होंने कालिदास को परिभाषित करते हुए लिखा है:- ``कीर्तिरक्षारसंबद्धा स्थिराभवति भूतले`` अथाZत् कालिदास निश्चय ही अक्षरकीर्ति है।
     धार्मिक ग्रंथों को छोड़ दे और केवल कला साहित्य की बात करें तो भास आदि नाटककार अवश्य ही कालिदास के पूर्व हुए किंतु काव्य के क्षेत्र में कालिदास अवश्य ही अग्रगण्य हैं और न केवल अग्रगण्य बल्कि आज तक हुए कवियों में सर्वश्रेष्ठ भी। ऐसा विश्वास किया जा सकता है कि जब तक पृथ्वी में साहित्य के प्रति आदर रहेगा तब तक कालिदास को स्मरण किया जाता रहेगा। वे वाग्देवी के अमर पुत्र हैं-शब्द ब्रह्य के सर्वाधिक लाड़लेण्ण्। वे शब्दों से खेले किंतु मानो शब्द ही उनके हाथों पड़ने के लिए तरसते थे। कालिदास ऐसे समय में हुए जब भारत की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन में ह्रास और अवमूल्यन के लक्षण स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे थे। क्रांतिदशीZ कालिदास ने देश की इस दुराव्यवस्था को देखा और उस पर मनन किया। उनके पास राजनीतिक शक्ति नहीं थी, वे धार्मिक नेता भी नहीं थे और न ही सामाजिक ह्रास को रोकने में सक्षम। वे एक कवि थे और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए वे केवल अपने काव्य पर अवलंबित थे। अत: वे माध्यम से भारतीय जनता को जागृत करने करने का बीड़ा उठाया और इसमें वे पूरी तरह सफल भी हुए। श्री चिरंजीवदास का ऐसा मानना है कि कालिदास ने काव्य नहीं लिखा बल्कि उसका दर्शन किया है- ``पश्य देवस्य काव्यं न ऋषेति न विभेति`` प्रसिद्ध टीकाकार मिल्लनाथ लिखते हैं कि उनकी वाणी के सार को स्वयं कालिदास, मां सरस्वती और सृष्टिकत्ताZ ब्रह्या जी ही समझ सके हैं। तब मैं उनकी रचना को समझकर उसका अनुवाद करने वाला कौन होता हूं ? मैंने यह अनुवाद अपनी विद्वता दिखाने के लिए नहीं बल्कि उनकी कृतियों को जन साधारण तक पहुंचाने के लिए किया है। उनका ऐसा करना कितना सार्थक है, इसका निर्णय पाठक करेंगे, ऐसा उन्हें विश्वास है। तब मुझे उनकी ``मुरली बजरी`` कविता की ये पंक्तियां याद आ रही है :-
          इन प्राणों की प्यास जता दे,
          इन सांसों का अर्थ बता दे,
          स्वर में मेरे स्पंदन सुलगा,
          आहों का प्रज्वलित पता दे।

शनिवार, 14 जनवरी 2012

तिलगुजिया का पर्व संक्रांति



सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ‘संक्रांति‘ कहलाता है। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण और कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन कहलाता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होने लगता है तब दिन बड़े और रात छोटी होने लगती है। इस समय शीत पर धूप की विजय प्राप्त करने की यात्रा शुरू हो जाती है। उत्तरायण से दक्षिणायन के समय में ठीक इसके विपरीत होता है। वैदिक काल में उत्तरायण को ‘देवयान‘ तथा दक्षिणायन को ‘पितृयान‘ कहा जाता था। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिये गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवतागण पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वार्गादि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसीलिए यह आलोक का पर्व माना गया है।

धर्मशास्त्र के अनुसार इस दिन स्नान, दान, जप, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना अधिक मिलता है। इसीलिए लोग गंगादि नदियों में तिल लगाकर सामूहिक रूप से स्नान करके तिल, गुड़, मूंगफली, चांवल आदि का दान करते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को शाल और कंबल दान करने का विशेष महत्व होता है। विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति, अपने स्वास्थ्यवर्द्धन और सर्व कल्याण के लिए तिल के छः प्रकार के प्रयोग पुण्यदायक व फलदायक होते हैं-तिल जल स्नान, तिल दान, तिल भोजन, तिल जल अर्पण, तिल आहुति और तिल उबटन मर्दन। कदाचित् यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में इस दिन तिल उबटन के रूप में लगाकर नदियों में स्नान करते हैं, तिल का दान करते हैं, तिलगुजिया, तिल से बने गजक, रेवड़ी और खिचड़ी खाने-खिलाने का रिवाज है।

इस पर्व में शीत के प्रकोप से छुटकारा पाने के लिए तिल को शरीर में मलकर नदी में स्नान करने का विशष महत्व बताया गया है। तिल उबटन, तिल हवन, तिल का व्यंजन और तिल का दान, सभी पाप नाशक है। इसलिए इस दिन तिल, गुड़ और चीनी मिले लड्डु खाने और दान करने का विशष महत्व होता है। यह पुनीत पर्व परस्पर स्नेह और मधुरता को बढ़ाता है। धर्मशास्त्र के अनुसार इस दिन स्नान, दान, जप, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना अधिक मिलता है। इसीलिए लोग गंगादि नदियों में तिल लगाकर सामूहिक रूप से स्नान करके तिल, गुड़, मूंगफली, चांवल आदि का दान करते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को शाल और कंबल दान करने का विशेष महत्व होता है।

विभिन्न राज्यों में संक्रांति:-

इलाहाबाद में माघ मास में गंगा-यमुना के रेत में पंडाल बनाकर कल्पवास करते हैं और नित्य गंगा स्नान करके दान आदि करके किला में स्थित अक्षयवट की पूजा करते हैं। प्रलय काल में भी नष्ट न होने वाले अक्षयवट की अत्यंत महिमा होती है। इस अवसर पर उसकी पूजा-अर्चना से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा सागर में भी बड़ा मेला लगता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत की थी। इस दिन गंगा सागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीढ़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन-मकर संक्रांति को यहां लोगों की अपार भीढ़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-‘सारे तीरथ बार बार लेकिन गंगा सागर एक बार।‘

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जलाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्नि पूजा करते हुए तिल, गुड़, चांवल और भूने हुए मक्का की आहूति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक, रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मनाते हैं। नई बहू और नवजात बच्चांे के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारंपरिक मक्के की रोटी और सरसों की साग का भी लुत्फ उठाया जाता है। महाराष्ट्र प्रांत में इस दिन ताल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं:- ‘लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला‘ अर्थात् तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं। बंगाल में भी इस दिन स्नान करके तिल दान करने की विशेष प्रथा है। असम में बिहु और आंध्र प्रदेश में भोगी नाम से मकर संक्रांति मनाया जाता है। तामिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। पोंगल सामान्यतः तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

पतंग उढ़ाने की विशिष्ट परंपरा:-

मकर संक्रांति को पतंग उड़ाने की विशेष परंपरा है। देशभर में पतंग उड़ाकर मनोरंजन करने का रिवाज है। पतंग उड़ाने की परंपरा का उल्लेख श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी किया है। बाल कांड में उल्लेख है- ‘राम इक दिन चंग उड़ाई, इंद्रलोक में पहुंची गई।‘ त्रेतायुग में ऐसे कई प्रसंग हैं जब श्रीराम ने अपने भाईयों और हनुमान के साथ पतंग उड़ाई थी। एक बार तो श्रीराम की पतंग इंद्रलोक में पहुंच गई जिसे देखकर देवराज इंद्र की बहू और जयंत की पत्नी उस पतंग को पकड़ ली। वह सोचने लगी-‘जासु चंग अस सुन्दरताई। सो पुरूष जग में अधिकाई।।‘ पतंग उड़ाने वाला इसे लेने अवश्य आयेगा। बहुत प्रतीक्षा के बाद भी पतंग वापस नहीं आया तब श्रीराम ने हनुमान को पतंग लाने भेजा। जयंत की पत्नी ने पतंग उड़ाने वाले के दर्शन करने के बाद ही पतंग देने की बात कही और श्रीराम के चित्रकूट में दर्शन देने के आश्वासन के बाद ही पतंग लौटायी। ‘तिन तब सुनत तुरंत ही, दीन्ही छोड़ पतंग। खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।।‘ इससे पतंग उड़ाने की प्राचीनता का पता चलता है। भारत में तो पतंग उड़ाया ही जाता है, मलेशिया, जापान, चीन, वियतनाम और थाईलैंड आदि देशों में पतंग उड़ाकर भगवान भास्कर का स्वागत किया जाता है।

मांगलिक कार्यो की शुरूवात:-

पौष मास में देवगण सो जाते हैं और इस मास में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। लेकिन माघ मास में मकर संक्रांति के दिन से देवगण जाग जाते हैं और ऐसा माना जाता है कि इस दिन से मांगलिक कार्य-उपनयन संस्कार, नामकरण, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश और विवाह आदि सम्पन्न होने लगते हैं।

संक्रांति श्राद्ध-तर्पण:-

राजा भगीरथ ने अपने पितरों का गंगाजल, अक्षत और तिल से श्राद्ध-तर्पण किया था जिससे उनके पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति मिली थी। तब से मकर संक्रांति स्नान, मकर संक्रांति श्राद्ध-तर्पण और दान आदि की परंपरा प्रचलित है।

मकर संक्रांति का महत्व:-

शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, स्नान, दान, श्राद्ध और तर्पण आदि धार्मिक क्रिया का विशेष महत्व होता है। इस दिन ऐसा करने से सौ गुना पुण्य मिलता है। इस दिन शुद्ध घी और कंबल दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा भी गया हैः-

माघे मासि महादेव यो दान घृत कंबलम्।
सभुक्तवा सकलान मो गान अंते मोक्ष च विदंति।।

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान और दान को अत्यंत शुभकारी और पुण्यदायी माना गया है। इस दिन प्रयागराज और गंगा सागर में स्नान करने को महास्नान कहा गया है। सामान्यतया सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करता है, किंतु कर्क और मकर राशि में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है। यह प्रक्रिया छः छः माह के अंतराल में होता है। भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित होता है। मकर संक्रांति के पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है। इसीलिए यहां रातें बड़ी और दिन छोटा होता है। किंतु मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उक्रारी गोलार्द्ध की ओर आने लगता है जिससे यहां रातें छोटी और दिन बड़ा होने लगता है। इस दिन से गर्मी बढ़ने लगती है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा और रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। इसलिए मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को ‘अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर‘ होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से जीवों की चेतन एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। इसी मान्यता के कारणलोगों के द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की आराधना, उपासना और पूजा आदि करके कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है।

सामान्यतया भारतीय पंचांग की समस्त तिथियां चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती है, किंतु मकर संक्रांति को सूर्य की गति से निर्धारित की जाती है। इसी कारणयह पर्व हमेशा 14 जनवरी को ही पड़ता है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से मिलने उनके घर जाते हैं। चंूकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपने देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था। इसी दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम होते समुद्र में जा मिली थी। इसीलिए गंगा सागर में गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले लोगों को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीवन में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है। इस दिन रज, तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ लेने का प्रयत्न करना चाहिए। यह दिन साधना के लिए अनुकूल होता है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यदेव पुत्र शनिदेव और पत्नी छाया के शाप से कोढ़ी हो गये थे लेकिन दूसरे पुत्र यमराज के प्रयत्न से उन्हें कोढ़ से मुक्ति मिली और वरदान भी मिला कि जो कोई सूर्य के चेहरे की पूजा करेगा उसे कोढ़ से मुक्ति मिल जायेगा। बाद में सूर्यदेव के कोप से शनि और पत्नी छाया का वैभव समाप्त हो गया। कालान्तर में शनिदेव और पत्नी छाया के तिल से समर्यदेव की पूजा करने पर उन्हें पुनः वैभव प्राप्त हुआ। तब सूर्यदेव ने वरदान दिया कि मकर संक्रांति को जो कोई उनकी तिल से पूजा करेगा उसे दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से मुक्ति मिल जायेगा, कष्ट और विपत्ति का नाश हो जावेगा। कदाचित् इसीकारण इस दिन तिल का उपयोग विविध रूपों में किया जाता है।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

छत्तीसगढ़ के गौरव पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय

   छत्तीसगढ़ के गौरव पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय 

 छत्तीसगढ़ जैसे वनांचल के किसी ग्रामीण कवि को साहित्य का सर्वोच्च सम्मान “साहित्य वाचस्पति” दिया जाये तो उसकी ख्याति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बात तब की है जब इस सम्मान के हकदार गिने चुने लोग थे। छत्तीसगढ़ की भूमि को गौरवान्वित करने वाले महापुरूष बालपुर के प्रतिष्ठित पाण्डेय कुल के जगमगाते नक्षत्र पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय थे। उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा सन् 1948 में मेरठ अधिवेशन में साहित्य वाचस्पति से सम्मानित किया गया था। वे इस सम्मान से विभूषित होने वाले छत्तीसगढ़ के पहले व्यक्ति थे। इस सम्मान को पाले वाले व्यक्तियों को पाण्डेय जी ने इस प्रकार रेखांकित किया है :-
          गर्व गुजरात को है जिनकी सुयोग्यता का,
          मुंशीजी कन्हैयालाल भारत के प्यारे हैं
          विश्वभारती है गुरूदेव का प्रसिद्ध जहॉ
          उस बंगभूमि के सुनीति जी दुलारे हैं
          ब्रज माधुरी के सुधा सिंधु के सुधाकर में
          विदित वियोगी हरि कवि उजियारे हैं
          मंडित “साहित्य वाचस्पति” पदवी से हुए
          लोचन प्रसाद भला कौन सुनवारे हैं।
     बाद में इस अलंकरण से छत्तीसगढ़ के अनेक साहित्यकार विभूषित किये गये। कहना अनुचित नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ में अन्यान्य उच्च कोटि के साहित्यकार हुए। पंडित शुकलाल पाण्डेय की एक कविता देखिये:-
          यही हुए भवभूति नाम संस्कृत के कविवर
          उत्तर राम चरित्र ग्रंथ है जिसका सुन्दर
          वोपदेव से यही हुए हेैं वैयाकरणी
          है जिसका व्याकरण देवभाषा निधितरणी
          नागर्जुन जैसे दार्शनिक और सुकवि ईशान से
          कोशल विदर्भ के मध्य में हुए उदित शशिभान से ।
     छत्तीसगढ़ की माटी को हम प्रणाम करते हैं जिन्होंने ऐसे महान् सपूतों को जन्म दिया है। छत्तीसगढ़ वंदना की एक बानगी स्वयं पाण्डेय जी के मुख से सुनिए:-
          जयति जय जय छत्तीसगढ़ देस
          जनम भूमि, सुखर सुख खान ।
          जयति जय महानदी परसिद्ध
          सोना-हीरा के जहॉ खदान ॥
          जहॉ के मोरध्वज महाराज
          दान दे राखिन जुग जुग नाम ।
          कृष्ण जी जहॉ विप्र के रूप
          धरे देखिन श्री मनिपुर धाम ॥
          जहॉ है राजिवलोचन तिरिथ
          अउ, सबरीनारायण के क्षेत्र ।
          अमरकंटक के दरसन जहॉ
          पवित्तर होथे मन अउ नेत्र ॥
          जहॉ हे ऋषभतीर्थ द्विजभूमि
          महाभारत के दिन ले ख्यात् ।
          आज ले जग जाहिर ऐ अमिट
          जहॉ के गाउ दान के बात ॥
     मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि यह मेरी भी जन्म स्थली है। मुझे यह विधा विरासत में मिली है। क्योंकि प्राचीन काल में महानदी का तटवर्ती क्षेत्र बालपुर, राजिम और शिवरीनारायण सांस्कृतिक और साहित्यिक तीर्थ थे। उस काल के केंद्र बिंदु थे- शिवरीनारायण के तहसीलदार और सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह जिन्होंने छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को केवल समेटा ही नहीं बल्कि उन्हें एक दिशा भी दी है। उस काल की रचनाधर्मिता पर पाण्डेय जी के अनुज पंडित मुकुटधर पाण्डेय के विचार दृष्टव्य है- “मुझे स्मरण होता है कि भाई साहब ने जब लिखना शुरू किया तब छत्तीसगढ़ में हिन्दी लिखने वालों की संख्या उंगली में गिनने लायक थीं। जिनमें रायगढ़ के पं. अनंतराम पाण्डेय, परसापाली के पं. मेदिनीप्रसाद पाण्डेय, शिवरीनारायण के ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. मालिक राम भोगहा, हीराराम त्रिपाठी, धमतरी के कृष्णा नयनार, कवि बिसाहूराम आदि प्रमुख थे। छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखने वाले काव्योपाध्याय हीरालाल दिवंगत हो चुके थे। राजिम के पं. सुंदरलाल शर्मा की छत्तीसगढ़ी दानलीला नहीं लिखी गई थी। माधवराव सप्रे का पेंड्र्ा से निकलने वाला 'छत्तीसगढ़ मित्र' नामक मासिक पत्र बंद हो चुका था और वे नागपुर से 'हिन्द केसरी' नामक साप्ताहिक पत्र निकालने लगे थे। भाई साहब सप्रेजी को गुरूवत मानते थे। मालिक राम भोगहा से हमारे ज्येष्ठ भ््रा्राता पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पाण्डेय की मित्रता थी और वे नाव की सवारी से बालपुर आया करते थे। वे ठा. जगमोहन सिंह के शिष्य थे। उनकी भाषा अनुप्रासालंकारी होती थी। भाई साहब उन्हें अग्रज तुल्य मानते थे। प्रारंभ में भाई साहब की लेख्न शेैली उनसे प्रभावित थी, उनका गद्य भी अनुप्रास से अलंकृत रहता था।”
     “मैं कवि कैसा हुआ” शीर्षक से लिखे लेख के प्रारंभ में लोचन प्रसाद जी लिखते हैं :-”एक दिन शाम को मैं काम से आकर आराम से अपने धाम में बैठकर मन रूपी घोड़े की लगाम को थाम उसे दौड़ाता फिरता तथा मौज से हौज में गोता लगाता था कि मेरी कल्पना की दृष्टि में एकाएक कवि की छवि चमक उठी।“ यही उनकी लेखनी के प्रेरणास्रोत थे। हालांकि उन्होंने लेखन की शुरूवात काव्य से किया मगर बाद में वे इतिहास और पुरातत्व में भी लिखने लगे।
     उनकी पहली रचना सन् 1904 में बालकृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में प्रकाशित हुई। फिर उनकी रचनाएं सन् 1920 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रही। इस बीच उनके करीब 48 पुस्तकें विभिन्न प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित हुईं उनकी प्रथम काव्य संग्रह “प्रवासी” सन् 1907 में राजपूत एंग्लो इंडियन प्रेस आगरा से प्रकाशित हुई। यह पाण्डेय कुल से प्रकाशित होने वाला पहला काव्य संग्रह था। इसके पूर्व 1906 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास “दो मित्र” लक्ष्मीनारायण प्रेस मुरादाबाद से प्रकाशित हो चुका था। इसी प्रकार खड़ी बोली में लिखी गई लघु कविताओं का संग्रह “नीति कविता” 1909 में मड़वाड़ी प्रेस नागपुर से प्रकाशित हुआ। नागरी प्रचारणी सभा बनारस ने इसे “उत्तम प्रकाशित उपयोगी पुस्तक” निरूपित किया। सन् 1910 में पांडेय जी ने ब्रज और खड़ी बोली के नये पुराने कवियों की रचनाओं का संकलन-संपादन करके “कविता कुसुम माला” शीर्षक से प्रकाशित कराया। इससे उन्हें साहित्यिक प्रतिष्ठा मिली और उनकी गणना द्विवेदी युग के शीर्षस्थ रचनाकारों में होने लगी। तब वे 24-25 वर्ष के नवयुवक थे। फिर उनकी भक्ति उपहार, भक्ति पुष्पांजलि और बाल विनोद जैसी शिक्षाप्रद रचनाएँ छपीं। फिर उनके रचनाकाल का उत्कर्ष आया। सन् 1914 में माधव मंजरी, मेवाड गाथा, चरित माला और 1915 में पुष्पांजलि, पद्य पुष्पांजलि जैसी महत्वपूर्ण कृतियॉ प्रकाशित हुई।

     20 वीं सदी के प्रारंभिक वर्षो में जब श्रीधर पाठक ने गोल्ड स्मिथ के “डेजर्टेेड विलेज” का “उजाड़ गॉव” के नाम से अनुवाद किया था। उसी तर्ज में पाण्डेय जी ने भी “ट्रेव्हलर” की शैली में “प्रवासी” लिखा है। जो अनुवाद नहीं बल्कि मौलिक रचना है। इस संग्रह में छत्तीसगढ़ के ग्राम्य जीवन की झांकी देखने को मिलता है। “कविता कुसुम माला” में ब्रज भाषा में पाण्डेय जी की कविताएं संग्रहित हैं।
     हिन्दी नाटक के विकास में पाण्डेय जी का अभूतपूर्व योगदान है। उन्होंने प्रेम प्रशंसा या गृहस्थ दशा दर्पण, साहित्य सेवा, छात्र दुर्दशा, ग्राम विवाह, विधान और उन्नति कहॉ से होगी, आदि नाटकों की रचना की है। उन्होंने सन् 1905 में “कलिकाल” नामक नाटक लिखकर छत्तीसगढ़ी भाषा में नाटय लेखन की शुरूवात की। आचार्य रामेश्वर शुक्ल अंचल ने पाण्डे जी की गणना हिन्दी के मूर्धन्य निबंधकारों में की है। लेकिन आचार्य नंददुलारे बाजपेयी ने पाण्डेय जी को स्वच्छदंतावादी काव्य की पुरोधा मानते हुए लिखा है - “लोचन प्रसाद पाण्डेय के काव्य में संस्कृत छंद और भाषा का अधिक स्पष्ट निदर्शन है। उनके काव्य में पौराणिकता की छाप भी है। इसमें संदेह नहीं कि उनकी कविता पर उड़िया और बांगला भाषा का स्पष्ट प्रभाव है। उनकी सारी रचनाएँ उपदेशोन्मुखी है”
     महावीर प्रसाद द्विवेदी ने “कविता कलाप” में पं. लोचन प्रसाद जी की रचनाओं को स्थान दिया है और      श्री नाथूराम शंकर शर्मा, लोचन प्रसाद पाण्डेय, रामचरित उपाध्याय, मैथिलीशरण गुप्त और कामता प्रसाद गुरू को “कवि श्रेष्ठ” घोषित किया है।
     पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय को हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, बंग्ला, पाली, संस्कृत आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था। इन भाषाओं में उन्होंने रचनाएं की है। उनकी साहित्यिक प्रतिभा से प्रभावित होकर बामुण्डा; उड़िसा के नरेश द्वारा उन्हें “काव्य विनोद” की उपाधि सन् 1912 में प्रदान किया गया। प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन गोंदिया में उन्हें “रजत मंजूषा” की उपाधि और मान पत्र प्रदान किया गया। पं. शुकलाल पाण्डेय “छत्तीसगढ़ गौरव” में उनके बारे में लिखते हैं -
          यही पुरातत्वज्ञ-सुकवि तम मोचन लोचन
          राघवेन्द्र से बसे यहीं इतिहास विलोचन ।
     ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं. लोचन प्रसाद पांण्डेय जी का जन्म जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत महानदी के तटवर्ती ग्राम बालपुर के सुपरिचित पाण्डेय कुल में पौष शुक्ल दशमी विक्रम संवत 1943 तदनुसाद 4 जनवरी सन् 1887 को पं. चिंतामणी पांडेय के चतुर्थ पुत्र रत्न के रूप में हुआ। वे आठ भाई सर्व श्री पुरूषोत्तम प्रसाद, पदमलोचन, चन्द्रशेखर, लोचन प्रसाद, विद्याधर, वंशीधर, मुरलीधर और मुकुटधर तथा चार बहन चंदन कुमारी, यज्ञ कुमारी, सूर्य कुमारी, और आनंद कुमारी थीं। उनकी माता देवहुति ममता की प्रतिमूर्ति थी। पितामह पंडित शालिगराम पांडेय धार्मिक अभिरूचि और साहित्य प्रेमी थे। उनके निजी संग्रह में अनेक धर्मिक और साहित्यिक पुस्तकें थी। आगे चलकर साहित्यिक पौत्रों ने प्रपितामही श्रीमती पार्वती देवी की स्मृति में “पार्वती पुस्तकालय” का रूप दिया। ऐसे धार्मिक और साहित्यिक वातावरण में वे पले-बढ़े। प्रारंभिक शिक्षा बालपुर के निजी पाठशाला में हुई। सन् 1902 में मिडिल स्कूल संबलपुर से पास किये और सन् 1905 में कलकत्ता वि0 वि0 से इंटर की परीक्षा पास करके बनारस गये जहॉ अनेक साहित्य मनीषियों से संपर्क हुआ। अपने जीवन काल में अनेक जगहों का भ्रमण किया। साहित्यिक गोष्ठियों, सम्मेलनों, कांग्रेस अधिवेशन, इतिहास-पुरातत्व खोजी अभियान में सदा तत्पर रहें। उनके खोज के कारण अनेक गढ, शिलालेख, ताम्रपत्र, गुफा प्रकाश में आ सके। सन् 1923 में उन्होंने “छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली” बनायी जो बाद में “महाकौशल इतिहास परिषद” कहलाया। उनका साहित्य इतिहास और पुरातत्व में समान अधिकार था। 8 नवम्बर सन् 1959 को वे स्वर्गारोहण किये। उन्हें हमारा शत् शत् नमन..
“कमला” के संपादक पं. जीवानन्द शर्मा के शब्दों में -
लोचन पथ में आय, भयो सुलोचन प्राण धम
अब लोचन अकुलाय, लखिबों लोचन लाल को।
प्रोफ़ेसर अश्विनी केशरवानी 
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पंडित लोचनप्रसाद पांडेय की रचनाएं :

1. कलिकाल (छत्तीसगढ़ी नाटक, 1905)
2. प्रवासी (काव्य संग्रह, 1906)
3. दो मित्र (उपन्यास, 1906)
4. बालिका विनोद (1909)
5. नीति कविता, 1909
6. हिन्दू विवाह और उसके प्रचलित दूषण, 1909
7. कविता कुसुममाला, 1909
8. कविता कुसुम (उड़िया काव्य संग्रह, 1909)
9. रोगी रोगन (उड़िया काव्य संग्रह, 1909)
10. भुतहा मंडल, 1910
11. महानदी (उड़िया काव्य संग्रह, 1910)
12. दिल बहलाने की दवा, 1910
13. शोकोच्छवास, 1910
14. लेटर्स टू माई ब्रदर्स, 1911
15. रघुवंश सार (अनुवाद, 1911)
16. भक्ति उपहार (उड़िया रचना, 1911)
17. सम्राट स्वागत, 1911
18. राधानाथ राय : द नेशनल पोएट ऑफ ओरिसा, 1911
19. द वे टू बी हैप्पी एंड गे, 1912
20. भक्ति पुप्पांजलि, 1912
21. त्यागवीर भ्राता लक्ष्मण, 1912
22. हमारे पूज्यपाद पिता, 1913
23. बाल विनोद, 1913
24. साहित्य सेवा, 1914
25. प्रेम प्रशंसा (नाटक, 1914)
26. माधव मंजरी (नाटक, 1914)
27. आनंद की टोकरी (नाटक, 1914)
28. मेवाड़गाथा (नाटक, 1914)
29. चरित माला (जीवनी, 1914)
30. पद्य पुष्पांजलि, 1915
31. माहो कीड़ा (कृषि, 1915)
32. छात्र दुर्दशा (नाटक, 1915)
33. क्षयरोगी सेवा, 1915
34. उन्नति कहां से होगी (नाटक, 1915)
35. ग्राम्य विवाह विधान (नाटक, 1915)
36. पुष्पांजलि (संस्कृत, 1915)
37. भर्तृहरि नीति शतक (पद्यानुवाद, 1916)
38. छत्तीसगढ़ भूषण काव्योपाध्याय हीरालाल (जीवनी, 1917)
39. रायबहादुर हीरालाल, 1920
40. महाकोशल हिस्टारिकल सोसायटी पेपर्स भाग 1 एवं 2
41. जीवन ज्योति, 1920
42. महाकोसल प्रशस्ति रत्नमाला, 1956
43- कौसल कौमुदी, पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि. रायपुर से प्रकाशित
44- समय की शिला पर, गुरू घासीदास वि.वि. बिलासपुर द्वारा प्रकाशित
अप्रकाशित रचनाएं :-
45- मनोरंजन
46- युद्ध संगीत
47- स्वदेशी पुकार
48- सोहराब वध (उड़िया)
49- कविता कुसुम (छत्तीसगढ़ी)
50- कालिदास कृत मेघदूत का अनुवाद
51- आटोबायोग्राफी (अंग्रेजी)
52- फोकटेल्स ऑफ बेंगाल (अंग्रेजी)
53- केदार गौरी, राधानाथ राय के उड़िया काव्य का पद्यानुवाद

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

छत्तीसगढ़ में राम को समर्पित रमरमिहा


छत्तीसगढ़ में राम को समर्पित रमरमिहा

                    महानदी, छत्‍तीसगढ़ की एक पवित्र और पुण्यदायिनी नदी है। इसे चित्रोत्पला गंगा भी कहा जाता है और इसका उल्लेख रामायण और महाभारत कालीन ग्रंथों में मिलता है। गंगा के समान पवित्र इस नदी के तट पर अनेक नगर और मंदिर स्थित हैं। महानदी की पवित्रता के कारण ये नगर सांस्कृतिक तीर्थ कहलाने लगे। इन नगरों में ऋषि-मुनियों प्राचीन काल में अपना आश्रम बनाकर तप किया करते थे। कदाचित् इसी कारण इन्हें सांस्कृतिक तीर्थ कहा जाने लगा। सिहावा, राजिम, सिरपुर, खरौद, शिवरीनारायण, तुरतुरिया, चंद्रपुर और संबलपुर आदि नगर महानदी के तट पर बसे हैं। इस नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में रामायण और महाभारत कालीन अवशेष आज भी मिलते हैं। रायपुर जिले के बलौदाबाजार के निकट जंगलों के बीच तुरतुरिया ग्राम स्थित है। रामायण काल में यहां बाल्मिकी आश्रम था, जहां माता सीता ने वनदेवी के रूप में रहकर लव और कुश को जन्म दिया था। मल्हार के पास ग्राम कोसला को माता कौशल्या का मायका और श्रीराम का ननिहाल माना जाता है। सक्ती और सरगुजा की पहाड़ियों में रामायण कालीन अवशेष मिलते हैं। शिवरीनारायण का वास्तविक रूप शबरीनारायण है जो शबरी के जूठे बेर खाने और उसके उद्धार करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने दंडकारण्य जाते इस भेंट को चिरस्थायी करने के लिये बनाये थे। श्रीराम का नारायणी रूप यहां प्राचीन काल से गुप्त रूप से विराजमान है। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्तधाम'' कहा गया है। रामनाम को समर्पित, अपने पूरे शरीर में रामनाम अंकित कराकर केवल राम को भजने वाले रामनामी महानदी के तटवर्ती ग्रामों में बसते हैं। इन्हें रमरमिहा, रामनमिहा और रामनामी कहा जाता है। खरौद को रामायण कालीन खर और दूषण की नगरी माना जाता है। खरौद के दक्षिण द्वार पर शबरी का अति प्राचीन मंदिर है। इसे सौराइन दाई का मंदिर भी कहा जाता है।
                    महानदी का यह तटवर्ती क्षेत्र धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिहावा, सिरपुर, राजिम, मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण, चंद्रपुर और संबलपुर जहां धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, वहां प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिलने से प्राचीनता की जानकारी मिलती है। राजनीतिक दृष्टि से तब इसे ''ट्रांस महानदी क्षेत्र'' कहा जाता था। महानदी की सहायक नदी जोंक के तट पर गुरू घासीदास का धाम गिरौदपुरी स्थित है। यहीं सतनाम पंथ का जन्म हुआ । इसी प्रकार सरसींवा के पास महानदी का तटवर्ती ग्राम ``उड़काकन'' रामनामी पंथ का एक पवित्र तीर्थधाम है। रामनामी और सतनामी के लिये शिवरीनारायण का वही महत्व है जो दूसरों के लिये प्रयाग और काशी का है। माघी पूर्णिमा से लगने वाले मेला के समय इस पंथ के लोग भी शिवरीनारायण में अपना तंबू लगाकर भजन आदि करते हैं। पूरे शरीर में रामनाम का अंकन लोगों के लिये आकर्षण होता है। मैं भी इन्हें बचपन से देखते आ रहा हंू। मेरे लिये यह उत्सुकता का विषय था। सांवले शरीर में रामनाम को गोदना, सिर पर मोर मुकुट लगाये हाथ में मंजिरा लिये रात दिन रामनाम का भजन करते हैं। उनके शरीर का ऐसा कोई भाग नहीं बचा होता है जहां रामनाम अंकित न हो...यहां तक कि वे जो कपड़े पहनते हैं और जिस तम्बू के नीचे रहते हैं, उसमें भी रामनाम अंकित होता है। छत्‍तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में आज भी प्रात: राम राम कहने का रिवाज है। इससे उनकी दिनचर्या शुभ होती है।
                    महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रमरमिहा लोग निवास करते है। छत्तीसगढ़ के पांच सीमावर्ती जिलों रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, महासमुंद और रायगढ़ के सारंगढ़, घरघोड़ा, जांजगीर, चांपा, मालखरौदा, चंद्रपुर, पामगढ़, कसडोल, बलौदाबाजार और बिलाईगढ़ क्षेत्र के लगभग ३०० गांवों में पांच लाख रमरमिहा निवास करते हैं। रामनामी पंथ अनुसूचित जाति की एक शाखा है जो संत कवि रैदास को अपने पंथ का मूल पुरूष मानते हैं। इन्हें रमरमिहा अथवा रामनमिहा कहा जाता है। रामनाम में सदा तन्मय रहने वाले ये लोग अहिंसक और शाकाहारी होते हैं। मदिरा से वे बहुत दूर होते हैं।
                    छत्‍तीसगढ़ में रामनामी पंथ की उत्पत्ति के सम्बंध में कहा जाता है कि ये लोग हरियाणा के नारनौल से यहां आये थे। उस काल में तत्कालीन शासकों के दमनात्मक रवैये से त्रस्त होकर ये लोग छत्‍तीसगढ़ के शांत माहौल में आ बसे थे। आज उनकी २० वीं पीढ़ी के वंशज अपनी परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहरों के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। पारस्परिक सद्भाव और अद्भूत संगठन क्षमता वाले इस कौम को तोड़ने के लिये तत्कालीन शासकों ने एक चाल चली जिसमें वे सफल हो गये। पूर्व में रामनामी पंथ के लोग भी सतनाम के उपासक थे। उनमें आपसी सद्भाव और भाईचारा था। इससे उनमें अच्छा संगठन था। उनकी इस संगठन शक्ति को क्षीण करने और आपस में फूट डालने के लिये एक नवजात शिशु के माथे पर ''रामनाम'' गुदवा दिया और प्रचारित कर दिया कि यह शिशु राम की इच्छा से इस भूलोक में आया है। अत: राम की इच्छा के अनुरूप रामनाम का अनुसरण करें। इस प्रकार एक शक्तिशाली संगठन दो हिस्सों में बंट गया। आगे चलकर इन दोनों समुदाय के दो भाग और हुये। अलग रहने के बावजूद इनमें सांस्कृतिक साम्यता पायी जाती है।
सांस्कृतिक परंपरा के द्योतक राम नाम :-
                    श्रीराम को अनेक रूपों में पजा जाता है। शायद ही कोई ऐसा होगा जो श्रीराम के सगुण रूप को नकारता हो? लेकिन महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में बसे रमरमिहा लोग श्रीराम के सगुण रूप को नकार कर उसके निर्गुण रूप के उपासक हैं। हिन्दुस्तान में शायद ही कोई दूसरा पंथ होगा जो रामनाम में इतना रमा जाये कि पूरे शरीर में रामनाम गुदवा ले। लेकिन रमरमिहा लोग पूरे शरीर में राम नाम गुदवाते हैं, यहां तक पहनने-ओढ़ने के कपड़े और तम्बू के कपड़ों में भी राम नाम लिखा होता है। श्रीराम चरित मानस में भी कहा गया है:- ``जय राम रूप अनूप निर्गुण प्रेरक सही `` अर्थात् हे राम! आपकी जय हो। आपके रूप अनुपम है। आप निर्गुण हैं और सत्य ही गुणों के प्रेरक हैं। आगे कहा गया है:-
                                यद्यपि प्रभु के नाम अनेका, श्रुति कह अधिक एक से एका।
                                राम सकल नामन्ह ते अधिका, होउ नाथ अघ खग गल बघिका।।
                    यद्यपि प्रभु के अनेक नाम है और वेद कहते हैं कि वे नाम एक से एक बढ़कर है। तो भी हे नाथ ! रामनाम सबसे बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के लिये वह बधित के समान हो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि निराकार राम की उपासना करने का अधिकार उन्हें न्यायालय से मिला है।
                    जांजगीर-चांपा जिले के मालखरौदा विकासखंड के अंतर्गत ग्राम चारपारा के श्री परसराम भारद्वाज को रामनामी पंथ का प्रवर्तक माना जाता है। सन् १९०४ में उन्होंने निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम को मानकर एक जन आंदोलन की शुरूवात की थी। उन्होंने सबसे पहले अपने माथे पर रामनाम अंकित कराया था। इसके पूर्व निचली जाति के माने जाने के कारण वे रामायण का पाठ और रामनाम का उच्चारण नहीं करते थे। उनका मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध था। अक्सर उनको जातिगत आधार पर अपमान सहना पड़ता था। इसी बीच विदेशी ताकतों ने इस क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और उन्हें ईसाई धर्म मानने के लिये विवश किया। इसके लिये उन्हें हर प्रकार की मद्द दी जाने लगी। इसी समय श्री परसराम भारद्वाज ने रामनामी पंथ के अंतर्गत निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम की पूजा अर्चना करने की बात कही, जिसे सबने सहर्ष स्वीकार किया और तब से सब निराकार श्रीराम को अपने घर में पूजने लगे। भविष्य में उच्च जातियों द्वारा पुन: बाधा न डाल सके इसके लिये उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार के जिला सत्र न्यायालय से कानूनी अधिकार प्राप्त कर लिया। सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में लिखा है:-''ये लोग जिस राम के नाम को भजते हैं वे राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम नहीं हैं बल्कि निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम हैं।'' ब्राह्मणों के प्रति इनके मन में जबरदस्त विरोध की भावना है। संभव है उनकी यह भावना उनके द्वारा जातिगत आधार पर दी गयी प्रतारणा का प्रतिफल हो ? यही कारण है कि रामनामी पंथ की सामाजिक संरचना में जन्म से लेकर मृत्यु तक और विवाह से लेकर संतानोपत्ति तक के सारे संस्कार ऐसे बनाये गये हैं जिसमें ब्राह्मणों की आवश्यकता ही न पड़े।       बिलासपुर जिला गजेटियर के अनुसार उनके धार्मिक कार्यो को पंथ के संत सम्पन्न कराते हैं। अगर अति आवश्यक हुआ तो वे ब्राह्मणों को भी आमंत्रित करते हैं।
रेड इंडियन :-
                    रामरमिहा के गुरू और गोसाई लोग रंगीन मोर पंखों वाले बांस के मुकुट धारण करने वाले होते हैं। इस पर भी रामनाम की काली पट्टी लगी रहती है। पत्रकार श्री सतीश जायसवाल इनकी तुलना रेड इंडियन से करते हैं। अपने एक लेख में वे लिखते हैं :- ''इन मुकुटों के कारण ये लोग रंग बिरंगे पंखों की शीश सज्जा करने वाले रेड इंडियनों की तरह नजर आते हैं। वैसे तो भारत में अंडमान द्वीप समूह तथा कुछ आफ्रीकी देशों के जन जातीय कबीलों में वृक्षों की छाल और मिट्टी के नैसर्गिक रंगों से अपने शरीर को चित्रित करने और रंगने की परंपरा है। लेकिन वहां यह सब सजावटी सा होता है। धार्मिक विधि विधान के तौर पर अपने पूरे शरीर में ईश्वर का नाम अंकित करने वाला संभवत: यह दुनिया का एक मात्र समुदाय है। यह समुदाय कोई छोटा मोटा जन जातीय कबीला नहीं बल्कि पांच लाख से भी उपर विशाल जनसंख्या वाले धर्मावलंबियों का एक संगठित पंथ है। जिससे जनतांत्रिक व्यवस्था का सबसे सशक्त अस्त्र अर्थात् मतदान का अधिकार मिला हुआ है।''
आदिवासी परंपरा गोदना :-
                    सौंदर्य वृद्धि के लिये आदिवासी संस्कृति में अंग लेखन और चित्रांकन की परंपरा गोदना अनेक आस्थाओं से जुड़ा है। गोदना आदिवासी महिलाओं का श्रृंगार ही नहीं बल्कि ऐसा परिधान है जो आजीवन तन से जुड़ा रहता है। मान्यता तो यह भी है कि मृत्योपरान्त तो तन के सारे गहने और कपड़े उतारे जा सकते हैं, लेकिन संग तो गोदना ही जाता है। गोदना को लोग ''चिन्हारी'' के रूप में गुदवाते हैं। ऐसे मंे गोदना अगर रामनाम का हो तो सोने में सुहागा ही होगा। अगर किसी रामरमिहा को ध्यान से देखें तो आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है क्योंकि हाथ, पैर यहां तक कि आंखों की पलकों में रामनाम खुदा रहता है। बचपन में रामनाम माथे पर गोदा जाता है। गोदना गोदते समय भजन कीर्तन होता है जिससे मन रामनाम में लीन हो जाये और पीड़ा का आभास तक न हो ? उम्र के हिसाब से शरीर के दूसरे भाग में गोदने का काम किया जाता है। पहले स्याही से रामनाम लिखा जाता है फिर सुई चुभोई जाती है। गोदना गोदने में दो सुई काम में लाई जाती है और काले रंग को अधिक गहरा तथा पक्का बनाने के लिये उस पर उपर से मिट्टी के तेल से निकला धुंआ लगा लेते हैं। गोदना गोदते समय गीत भी गाये जाते हैं :- धूम कुसंगति कालिख होई। लिखिय पुराण मंजु मति होई।।
गोदना गोदने के बाद उसके उपर हल्दी का लेप लगाया जाता हैं गोदना पकने की बात बहुत कम ही सुनने को मिलती है। छत्तीसगढ़ में गोदना गोदने का काम देवारिन महिलाएं करती हैं। गोदना गोदते समय वे अक्सर गाती हैं:
                    ऐ मोर भूरी दीदी-
                    घुरूर घुरूर जाता बाजे माली भर पिसा
                    एक चिरूवा भर दउड़त है किसान।
                    एक चानी भांटा सोर घइला पानी
                    तोर धांगरा दारू पी के पड़ गै उतानी।
पंचायत : एक सर्वमान्य संस्था :-
                    सामाजिक व्यवस्था में जहां चार घर हुये नहीं कि उनमें किसी न किसी बात को लेकर टकराहट अवश्य होती है। रमरमिहा लोग झगड़ों का निपटारा कोर्ट-कचहरी के बजाय अपनी पंचायत में करना ज्यादा पसंद करते हैं। इस पंथ की अपनी पंचायत होती है, जो सर्वमान्य संस्था होती है। रमरमिहा लोगों की सामाजिक पंचायत का गठन पंथ के निर्माण के समय से ही हुआ है। सन् १९६० के पहले तक गुरू प्रथा से पंचों का नामांकन होता था। लेकिन समयानुसार सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन अवश्यसंभावी है। अत: नामांकन प्रथा के बजाय चुनाव प्रक्रिया अपनाया जाने लगा। इस प्रकार सन् १९६० में पहली निर्वाचित पंचायत बनी और उसके बाद से हर वर्ष पंचायत का चुनाव होता है। इस पंचायत में १०० पंच होते हैं। आठ गांव के पीछे एक प्रतिनिधि होता है। ये सब महासभा के प्रतिनिधि कहलाते हैं। इसी महासभा में पदाधिकारियों का निर्वाचन होता है। पंचायत का कार्यक्षेत्र सामाजिक, पारिवारिक झगड़ों का निपटारा करना, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन को मजबूत बनाना और सामूहिक विवाह को सम्पन्न कराना है। लंबे समय तक श्री बोधराम रामनामी पंथ के महामंत्री हैं।
सामूहिक आयोजन : पंथ मेला :-
                    रामनामी पंथ के दो प्रमुख आयोजन होते हैं- एक, रामनवमीं में संत समागम और दूसरा, पौष एकादशी से त्रयोदशी तक चलने वाला तीन दिवसीय मेला। मेला में सामाजिक वाद विवादों, पारिवारिक झगड़ों आदि का फैसला होता है। इसके अलावा महासभा का आयोजन और सामूहिक विवाह भी होते हें। अगला मेला किस स्थान में लगेगा, इसका निर्णय भी यहीं पर हो जाता है। रामनामी मेला महानदी के तटवर्ती ग्रामों में एक बार महानदी के उत्तर में तो दूसरी बार महानदी के दक्षिण में लगता है।
                    रामनामी मेला का आयोजन महानदी के तटवर्ती ग्रामों में लगने के बारे में एक लोककथा प्रचलित है। उसके अनुसार आज से ८५-८५ वर्ष पहले सवारियों से भरी एक नाव महानदी को पार करते समय मझधार में फंस गयी। नाविकों न नाव को किनारे लगाने की बहुत कोशिश की मगर सफलता नहीं मिलीं उस समय ईश्वर ही कोई चमत्कार कर सकता था। नाव में सवार सभी यात्रियों ने मिन्नतें मानने लगे लेकिन इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। संयोग से उस नाव में रामनामी पंथ के प्रवर्तक श्री परसराम भारद्वाज और उनके अनुयायी भी सवार थे। सबने उनसे भी मिन्नतें मानने का अनुरोध किया। तब उन्होंने भी मिन्नतें मानी :- ''यदि मझधार में फंसी नाव सकुशल किनारे लग जायेगी तो रामनामी समाज द्वारा महानदी के दोनों किनारों पर रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन करेगी।'' आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उनके इस प्रकार मिन्नत मानते ही नाव सकुशल किनारे लग गयी। तब से प्रतिवर्ष महानदी के तटवर्ती ग्रामों में रामनाम का भजन-कीर्तन का आयोजन होने लगा जो आगे चलकर रामनामी सम्मेलन और मेला का रूप ले लिया।
                    तीन दिवसीय मेला के पहले दिन मेला स्थल में निर्मित जय स्तम्भ के उपर कलश चढ़ाया जाता है। दूसरे दिन रामायण पाठ, रामनाम के भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। मेला के अंतिम दिन सामूहिक विवाह और सामूहिक भोजन-भंडारा का आयोजन होता है। मेला स्थल के आस पास जुआ, मांस-मदिरा और वेश्या गमन जैसी कुप्रथा पूर्णत: प्रतिबंधित होता है। रामलीला मेला का प्रमुख आकर्षण होता है। मेला स्थल के मध्य में १३ फीट ऊंचे जय स्तम्भ का निर्माण किया जाता है और चबुतरे में भी रामनाम अंकित होता है। इस चबुतरे पर रामचरित मानस की प्रति रख दी जाती है। फिर रामनाम कीर्तन होता है जिसमें वाद्य यंत्रों के बजाय घुंघरू मंडित लकड़ी के चौके से ध्वनि और ताल निकाला जाता है तथा मयूर पंख से सुसज्जित तंबूरे से वातावरण राममय हो जाता है। विवाह के समय वर-वधू की जय स्तम्भ और रामायण को साक्षी मानकर सात फेरा लेवाया जाता है। फेरा के पूर्व महासभा के समक्ष वर और वधू पक्ष को विधिवत घोषणा पत्र भरना पड़ता है और संस्था का निर्धारित शुल्क ११-११ रूपये देना पड़ता है। दहेज मांगना और तलाक लेना पूर्णत: वर्जित है। हालांकि विधवा महिला के माथे पर रामनाम देखकर कोई व्यक्ति उनसे पुनर्विवाह कर सकता है।

बुधवार, 29 जून 2011

भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद साव

भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद साव
भारतेन्दु युगीन साहित्यकार गोविंद सावप्रो. अश्विनी केशरवानी छत्तीसगढ़ में भारतेन्दु युगीन कवि, आलोचक और उपन्यासकार ठाकुर जगमोहनसिंह का साहित्यिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने सन~ 1880 से 1882 तक धमतरी में और सन~ 1882 से 1887 तक शिवरीनारायण में तहसीलदार और मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया है। यही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को जगन्मोहन मंडल बनाकर एक सूत्र में पिरोया और उन्हें लेखन की सही दिशा भी दी। जगन्मोहन मंडल कांशी के भारतेन्दु मंडल की तर्ज में बनी एक साहित्यिक संस्था थी। इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के साहित्यकार शिवरीनारायण में आकर साहित्य साधना करने लगे। उस काल के अन्यान्य साहित्यकारों के शिवरीनारायण में आकर साहित्य साधना करने का उल्लेख तत्कालीन साहित्य में हुआ है। इनमें रायगढ़ के पं. अनंतराम पांडेय, रायगढ़-परसापाली के पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय, बलौदा के पं. वेदनाथ श्‍वर्मा, बालपुर के मालगुजार पं. पुरूसोत्तम प्रसाद पांडेय, बिलासपुर के जगन्नाथ प्रसाद भानु, धमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल, बिलाईगढ़ के पं. पृथ्वीपाल तिवारी और उनके अनुज पं. गणेश तिवारी और शिवरीनारायण के पं. मालिकराम भोगहा, पं. हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, पं. विश्‍वेस्‍वर वर्मा, पं. ऋषि श्‍वर्मा और दीनानाथ पांडेय आदि प्रमुख थे। शिवरीनारायण में जन्में, पले बढ़े और बाद में सरसींवा निवासी कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय ने छत्तीसगढ़ गौरव में ऐसे अनेक साहित्यकारों का नामोल्लेख किया है :-
                               नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।
                               बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।
                               हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।
                               विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद, बज गिरधर।
                               विश्वनाथ, बिसाहू, उमर नृप लक्षमण छत्‍तीस कोट कवि।
                               हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि।।

इस प्रकार उस काल में शिवरीनारायण सांस्कृतिक के साथ ही साहित्यिक तीर्थ भी बन गया था। द्विवेदी युग के अनेक साहित्यकारों- पं. लोचनप्रसाद पांडेय, पं. शुकलाल पांडेय, नरसिंहदास वैष्‍णव, सरयूप्रसाद तिवारी मधुकर, ज्वालाप्रसाद, रामदयाल तिवारी, प्यारेलाल गुप्त, छेदीलाल बैरिस्टर, पं. रविशंकर शुक्ल, सुंदरलाल आदि ने शिवरीनारायण की सांस्कृतिक-साहित्यिक भूमि को प्रणाम किया है। मेरा जन्म इस पवित्र नगरी में ऐसे परिवार में हुआ है जो लक्ष्मी और सरस्वती पुत्र थे। पं. शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ गौरव में मेरे पूर्वज गोविंदसाव को भारतेन्दु युगीन कवि के रूप में उल्लेख किया है-
                                रामदयाल समान यहीं हैं अनुपम वाग्मी।
                               हरीसिंह से राज नियम के ज्ञाता नामी।
                               गोविंद साव समान यहीं हैं लक्ष्मी स्वामी।
                               हैं गणेश से यहीं प्रचुर प्रतिभा अनुगामी।
                               श्री धरणीधर पंडित सदृश्‍य यहीं बसे विद्वान हैं।
                               हे महाभाग छत्तीसगढ़ ! बढ़ा रहे तब मान हैं।।

हालांकि गोविंद साव की कोई रचना आज उपलब्ध नहीं है लेकिन शिवरीनारायण के साहित्यिक परिवेश में उन्होंने कोई न कोई रचना अवश्‍य लिखी होगी। मुझे साहित्यिक अभिरूचि उनकी विरासत में मिला है। मैं भगवान शबरीनारायण, हमारे कुलदेव महेश्‍वरनाथ महादेव और कुलदेवी माता शीतला का आशीर्वाद तथा चित्रोत्पलागंगा के संस्कार को प्रमुख मानता हूं। उन्हीं के आशीर्वाद से आज प्रदेश के साहित्य जगत में मैं अपनी पहचान बना सकने में समर्थ हो सका हूं। शिवरीनारायण का साहित्यिक परिवेश ठाकुर जगमोहनसिंह की ही देन थी। उन्होंने यहां दर्जन भर पुस्तकें लिखी और प्रकाशित करायी। शबरीनारायण जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल के लोग, उनका रहन-सहन और व्यवहार उन्हें सज्जनाष्टक आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय लिखने को बाध्य किया। भारत जीवन प्रेस बनारस से सन~ 1884 में सज्जनाष्टक प्रकाशित हुआ। वे यहां के मालगुजार और पुजारी पंडित यदुनाथ भोगहा से अत्याधिक प्रभावित थे। भोगहा जी के पुत्र मालिकराम भोगहा ने तो ठाकुर जगमोहनसिंह को केवल अपना साहित्यिक गुरू ही नहीं बनाया बल्कि उन्हें अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। उनके संरक्षण में भोगहा जी ने हिन्दी, अंगेजी, बंगला, उड़िया और उर्दू और मराठी साहित्य का अध्ययन किया, अनेक स्थानों की यात्राएं की और प्रबोध चंद्रोदय, रामराज्यवियोग और सती सुलोचना जैसे उत्कृष्ट नाटकों की रचना की जिसका सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया। इसके मंचन के लिए उन्होंने यहां एक नाटक मंडली भी बनायी थी। माखन वंश के श्री बलभद्र साव के सुपुत्र और श्री सूरजदीन साव के अनुज श्री विद्याधर साव के नेतृत्व में यहां एक ष्‍केशरवानी नवयुवक नाटक मंडली बना था जिसके माध्यम से न केवल माखन वंश के नवयुवकों बल्कि नगर के नवोदित कलाकारों मंच मिला और अनेक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया गया। ठाकुर जगमोहनसिंह ने सज्जनाष्‍टक में माखन साव के बारे में लिखा है :-
                               माखन साहु राहु दारिद कहं अहै महाजन भारी।
                               दीन्हो घर माखन अरू रोटी बहुविधि तिनहो मुरारी।।
                               लच्छपती मुइ शरन जनन को टारत सकल कलेशा।
                               द्रव्यहीन कहं है कुबेर सम रहत न दुख को लेशा।
                               दुओधाम प्रथमहि करि निज पग कांवर आप चढ़ाई।
                               चार बीस शरदहु के बीते रीते गोलक नैना।
                               लखि अंसार संसार पार कहं मुंदे दृग तजि नैना।।

छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित मालगुजारों में माखनसाव की गिनती होती थी। इस उद्धरण से स्पष्‍ट है कि वे एक महाजन थे जिनके घर में लक्ष्मी जी और कुबेर जी का वास था। वे न केवल धीर-गंभीर और प्रजाप्रिय थे बल्कि धार्मिक और भक्तवत्सल भी थे। उन्होंने महानदी के तट पर अपने कुलदेव महेश्‍वरनाथ महादेव का एक भव्य मंदिर का संवत~ 1890 में निर्माण कराया था। इस मंदिर के बारे में ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपने खंडकाव्य प्रलय में लिखा है :-
                               बाढ़त सरित बारि छिन-छिन में।
                               चढ़ि सोपान घाट वट दिन मे।
                               शिवमंदिर जो घाटहिं सौहै।
                               माखन साहु रचित मन मोहै।।84।।
                               चटशाला जल भीतर आयो।
                               गैल चक्रधर गेह बहायो।
                               पुनि सो माखन साहु निकेता।।
                               पावन करि सो पान समेता।।87।।

उनकी धार्मिकता और भक्ति को डां. भालचंद राव तैलंग ने "छत्तीसगढ़ी, हल्बी, भतरी बोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन" के अर्थतत्व पृ. 200 मे उल्लेख किया है। विशेष घटना के कारण "खिच्रकेदार" को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है- रतनपुर का मंदिर जहां पहले माखन साव ने एक साधु को खिचड़ी परोसी थी और जहां पकी हुई खिचड़ी से भरी पत्तल को फोड़कर शिवजी प्रकट हुए थे। इस उद्धरण को रामलाल वर्मा द्वारा लिखित रायरतनपुर महात्म्य पृ 22 से लिया गया है। ऐसे पवित्र आत्मा माखन साव के अनुज श्री गोविंद साव के जगन्नाथपुरी की यात्रा और मनौती के रूप में जन्में उनके एकलौते पुत्र जगन्नाथ साव की धर्मप्रियता पर भी किसी को संदेह नहीं है। कदाचित~ यही कारण है कि आज भी गोविंदसाव के वंशजों का मुंडन संस्कार जगन्नाथपुरी में किये जाने का विधान है। मेरे पिता जी, मेरा और मेरे बच्चों का मुंडन संस्कार भी पुरी में हुआ था। जगन्नाथ साव के एक मात्र पुत्र पचकौड़ साव हुए। माखन वंश में उनकी विद्वता की साख थी और इस वंश के लंबरदार आत्माराम भी उनकी दबंगता से प्रभावित थे। उन्हें साजापाली और दौराभाटा में खेती-किसानी का दायित्व सौंपा गया था जिसे उन्होंने अपने चचेरे भाई महादेव साव के सहयोग से बखूबी निभाया। शिवरीनारायण में महादेव-पचकौड़ साव के नाम से व्यापार होता था और जब गांवों में व्यापार की शुरूवात हुई तब 05 वर्ष बाद शिवरीनारायण का खाता बंद कर साजापाली-दौराभाठा में महादेव-पचकौड़ साव के नाम से खाता शुरू किया गया जो मालगुजारी उन्मूलन तक चलता रहा। गलत बातों का वे दबंगता से विरोध करते थे साथ ही मांगने पर उचित सलाह भी देते थे। आजादी के कुछ महिने बाद 17.10.1947 को उन्होंने स्वर्गारोहण किया। पचकौड़ साव के एक मात्र पुत्र राघव साव का जन्म चैत्र शुक्ल 2, संवत~ 1972 को रात्रि 10 बजकर 33 मिनट को हुआ। उनका राशि नाम दुर्गाप्रसाद रखा गया था। परिवार की धार्मिकता का संस्कार उन्हें मिला और इसी परिवेश में परवरिश होने के कारण धार्मिकता उनके जीवन का एक अंग हो गया। उन्होंने अपने जीवन में लगभग दो घंटे पूजा अवश्‍य किया करते थे। चारों धाम-बद्रीनाथ, द्वारिकाधाम, रामेश्‍वरम~ और जगन्नाथपुरी की पूरी यात्रा उन्होंने की थी। गया श्राद्ध, प्रयाग और काशी श्राद्ध करने के साथ गंगासागर और बाबाधाम की यात्रा भी उन्होंने की। जीवन भर वे सात्विक रहे- सादा जीवन और उच्च विचार को उन्होंने अपनाया।...और इलाहाबाद के महाकुंभ में एक माह का कल्पवास करने के बाद अपने भरे पूरे परिवार को शुक्रवार, दिनांक 24.11.1989 को दोपहर एक बजे 74 वर्ष जीवन का सुख भोगकर स्वर्गारोहण किया। उन्होंने मुझे रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाकर धार्मिक वृत्ति से न केवल जोड़ा बल्कि मुझे रचनात्मक लेखन की प्रेरणा दी। मुझे इस दिशा में प्रेरित करने वाले माखन वंश के अंतिम लंबरदार श्री सूरजदीन साव भी थे। सर्व प्रथम विश्‍व हिंदु परिषद द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में गीता के प्रसंगों पर निबंध लिखकर पुरस्कृत होकर लेखन की मैंने शुरूवात की। इस निबंध के लेखन में मुझे मेरे दादा श्री राधवप्रसाद के साथ ही श्री सूरजदीन साव का पूर्ण सहयोग मिला। वृद्ध प्रपितामह के साहित्यिक विरासत और महानदी का संस्कार पाकर मेरी लेखनी अविचल चलने लगी।ऐसा पहली बार हुआ और गोविंदसाव के वंश में एक-एक पुत्र की परंपरा टूटी और राघवप्रसाद के चार पुत्र क्रमश: देवालाल, सेवकलाल, होलीदास और हेमलाल हुए। होलीदास तो बचपन में ही काल कवलित हो गए लेकिन शेष तीनों पुत्रों ने अपने वंश को बढ़ाने में सफल हुए। देवालाल के एक मात्र पुत्र अश्विनी कुमार और पुत्री मीना बाई हुई। सेवकलाल के दो पुत्र संजय कुमार और नरेन्द्र कुमार तथा चार पुत्री मंजुलता, अंजुलता, स्नेहलता और मधुलता हुई। हेमलाल के दो पुत्र अतीत और अमित कुमार और एक मात्र पुत्री अल्पना हुई। इस प्रकार राघवप्रसाद के तीन पुत्र और पांच पौत्र हुए और उनकी वंश परंपरा बढ़ी। राघवप्रसाद के ज्येष्‍ठ पुत्र के रूप में देवालाल का 05. 07. 1934 को जन्म हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा शिवरीनारायण में और हाई स्कूल की शिक्षा सारंगढ़ और बिलासपुर में हुई। उच्च शिक्षा न कर पाने का उन्हें अफसोस अवश्‍य हुआ था लेकिन मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने घर-परिवार की जिम्मेदारी उठा लिए थे। अपने भाई-बहनों की शिक्षा दीक्षा से लेकर उनके विवाह और नौकरी लगाने तक तथा उनके बच्चों के भी विवाह आदि में पूरा सहयोग देकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। देवालाल धीर, गंभीर और सुलझे हुए व्यक्ति थे। कदाचित~ उनके इसी व्यक्तित्व के कारण वे न केवल माखन वंश के बल्कि समाज और शिवरीनारायण, बेलादूला और साजापाली में अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने न जाने कितने परिवार को टूटने से बचाया और टूटे परिवार को जोड़ा है। वे अपनी पीढ़ी के एक मात्र व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी पैत्रिक वृत्ति महाजनी को अपनाया। उन्होंने शिवरीनारायण के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। आज की पीढ़ी उनके योगदान को शायद न समझ सके। लेकिन यह सत्य है कि शिवरीनारायण में गाम पंचायत के सफलतम सरपंच जहां माखन वंश के श्री तिजाउप्रसाद थे वहीं उनकी इस सफलता के पीछे यहां के उदितनारायण सुलतानिया, देवालाल केशरवानी, गोवर्धन शर्मा, सेवकराम श्रीवास और मोहम्मद अहमद खां का विशेष योगदान था। उनके कार्यकाल में ही यहां शिक्षा का विस्तार हुआ, अनेक स्कूल भवन बने, बिजली और सड़कें बनी, सब्जी बाजार लगने की शुरूवात हुई और जनपद पंचायत जांजगीर से साप्ताहिक मवेशी बाजार और छत्तीसगढ़ के महाकुंभ कहाने वाले मेले की व्यवस्था गाम पंचायत की मिली। इस नगर में चिकित्सा सुविधा के लिए देवालाल ने मंत्रियों और अधिकारियों से मिलकर अपने बहनोई श्री बलदाउ प्रसाद केशरवानी को प्रेरित कर जहां 'प्रयाग प्रसाद केशरवानी शासकीय चिकित्सालय' की स्थापना करायी और डाक्टरों के रहने-खाने की सुविधा उपलब्ध करायी। इस चिकित्सालय में विद्युत व्यवस्था उन्होंने अपने दादा श्री पचकौड़ साव की स्मृति में कराया था। शासकीय प्राथमिक कन्या शाला को मात्र अपने मित्र श्री गणेश प्रसाद नारनोलिया से शर्त लगाकर खुलवाया था जो आज शासकीय मिडिल कन्या स्कूल के रूप में संचालित है। मध्यप्रदेश शासन के मंत्रियों सर्वश्री डा. रामाचरण राय, श्री वेदराम, श्री बिसाहूदास महंत, श्री चित्रकांत जायसवाल, श्री बी. आर. यादव, भंवरसिंह पोर्ते, डा. कन्हैयालाल शर्मा, श्री रेशमलाल जांगड़े, श्रीधर मिश्रा, मुख्य मंत्री श्री श्‍यामाचरण शुक्ल, और केंदिय मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल से उनकी गहरी पहचान थी। आये दिन उनका कार्यक्रम शिवरीनारायण में कराकर नगर को विकास के मार्ग में ले जाना उनका ध्येय था। खरौद को नगर पालिका बनाये जाने पर नगरवासियों के अनुरोध पर उन्होंने मंत्रियों से अपनी पहचान का लाभ उठाकर शिवरीनारायण को भी नगरपालिका दर्जा तीन बनवाने में सफलता हासिल की। महानदी के रेत में महाराष्‍ट्र के किसानों को तरबूज बोने के लिए उन्होंने बुलवाया जिससे पंचायत की आमदनी बढ़ी। पूरे छत्तीसगढ़ में एकलौता शिवरीनारायण नगर था जहां बिजली के खम्भों में मरकरी बल्ब लगे थे। यही नहीं बल्कि उन्होंने शबरीनारायण मंदिर के गर्भगृह में 'केशरवानी महिला समाज' द्वारा संकल्पित चांदी के पत्तर से बना दरवाजा को सन 1960 में जीवन मिस्त्री के सहयोग से कलकत्ता से बनवाया था। अपने कुलदेव महेश्‍वरनाथ मंदिर में भोगराग की व्यवस्था करायी। सारंगढ़ और शिवरीनारायण में केशरवानी धर्मशाला के निर्माण में अर्थसंचय में उनका अमूल्य सहयोग था। अपने भाईयों, बहनों को उन्होंने न केवल सत्पथ पर चलने की प्रेरणा दी बल्कि समाज के लिए भी एक मिशाल स्थापित की। अपने परिवार के श्री सूरजदीन साव, श्री विद्याधर साव, श्री तिजाउ प्रसाद, श्री साधराम साव, श्री रामचंदसाव, श्री ईतवारी साव, श्री गिरीचंद साव, श्री मुरीतराम साव, श्री जगदीश प्रसाद, श्री गौटियाराम के प्रिय पात्र रहे वहीं श्री पराउराम, श्री गोरेलाल, श्री शोभाराम के गहरे मित्र रहे। जीवन भर सत्पथ रहकर नि:स्वार्थ सेवा भाव से कार्य करते हुए जीवन के अंतिम समय में उन्होंने भगवत्भजन में अपना मन लगाया... और 67 वर्ष की अवस्था में भौतिक सुख सुविधा का परित्याग कर 16. 04. 2001 को पंच तत्व में विलीन हो गये।राघव साव के द्वितीय पुत्र सेवकलाल ने जहां बैंकिंग सेवा में अपना जीवन सफर तय किया वहीं तृतीय पुत्र हेमलाल ने व्यापार को अपनाया जिसे उन्होंने पुत्र अतीत कुमार के सहयोग से संचालित कर रहे हैं। सेवकलाल के दोनों पुत्र संजय और नरेन्द कुमार टेंट हाउस के व्यापार में संलग्न हैं। देवालाल के पुत्र अश्विनी कुमार शासकीय महाविद्यालय चांपा में प्राध्यापक हैं। उन्होंने अपनी अभिरूचि के अनुसार छत्तीसगढ़ के इतिहास, पुरातत्व और परंपराओं के उपर लिखकर प्रादेशिक और राष्‍ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित किया और अपने वंश को गौरवान्वित किया है। धर्मयुग, अणुवत और नवनीत हिन्दी डाइजेस्ट जैसे राष्‍ट्रीय पत्रिका में बाल मनोविज्ञान विषय पर और कादम्बिनी, दैनिक हिन्दुस्तान में स्वतंत्र स्तम्भ लेखन किया। देश और प्रदेश के सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है। वे जांजगीर-चांपा जिले और प्रदेश के गिने चुने राष्‍ट्रीय लेखकों में से एक हैं। अपने क्षेत्र के उपर लिखकर अपने जन्म को सार्थक बनाने का प्रयास उन्होंने किया है। शिवरीनारायण, पीथमपुर के उपर शोध गंथ लिखकर वहां के माहात्म्य को प्रकाशित कर सद~कार्य किया है। छत्तीसगढ़ के बिखरे और खंडहर होते मंदिरों और लुप्त हो रही परंपराओं पर कलम चलाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु कालीन गुमनाम साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का उनका सराहनीय प्रयास है। उनके इस रचनात्मक और सार्थक लेखन के लिए विभिन्न संगठनों से सम्मानित होकर अपने वंश को गौरवान्वित करने वाले अकेले हैं। आज वे छत्तीसगढ़ राज्य केशरवानी वैश्‍य सभा के अध्यक्ष रहे और सम्प्रति प्रदेश सभा के संरक्षक हैं। प्रदेश के अनेक नगर सभाओं के द्वारा उन्हें 'समाज के गौरव' के रूप में सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। उनकी धर्मपत्नी कल्याणी देवी भी एक स्वतंत्र लेखिका हैं और लायनेस क्लब चांपा और नगर केशरवानी महिला सभा की अध्यक्ष, प्रदेश केशरवानी महिला सभा की कोषाध्यक्ष और अखिल भारतीय केशरवानी वैश्‍य महिला महासभा की राष्‍ट्रीय  अध्यक्ष हैं। उनके दो पुत्र प्रांजल कुमार कम्प्यूटर साफ~टवेयर इंजीनियर के रूप में टाटा कंसलटेन्सी सर्विसेस मुम्बई में पदस्थ है वहीं अंजल कुमार नेट प्वाइंट के संचालक है। हेमलाल के दो पुत्रों में अतीत कुमार जहां अपने पिता जी के साथ व्यापार में संलग्न हैं वहीं अमित कुमार मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके अपने पिता के साथ उनके व्यवसाय में संलग्न है। सेवकलाल के पुत्र संजय कुमार के दो पुत्री सृष्टि और साक्षी और एक पुत्र सृजन कुमार है वहीं नरेन्द कुमार के दो पुत्र पियुष और प्रीतुल है। दोनों भाई टेंट व्यवसाय कर रहे हैं।