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शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

रथयात्रा: बदलते संदर्भ

रथयात्रा: बदलते संदर्भ
                            प्रो. अश्विनी केशरवानी
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को छत्तीसगढ़ के अनेक नगरों और ग्राम्यांचलों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को एक रथ में बिठाकर श्रद्धा पूर्वक उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है। मुझे मेरे बचपन की बात याद आती है जब मुझे साल में दो बार-रथयात्रा और दशहरा में पहनने को नये कपड़े और खर्च करने को विशेष रूप से पैसा मिलता था..खाने को मिठाई, जामुन, पिनखजुर और न जाने क्या क्या मिलता था। चाची, बुआ, ताई, दादी, भाई, बहन सभी खुश रहते थे- रथयात्रा में सबसे भेंट जो हो जाती थी। लेकिन आज मेरी ये बातें सिर्फ सोच बनने की रह गयी है। पहले इस दिन बहु‘बेटियों को लिवा लाना आवश्यक होता था, लेकिन आज बुजुर्गो की बात मानता कौन है। आज के भौतिकतावादी युग में रथयात्रा को जानने समझने का किसी के पास समय नहीं है। मेरी बिटिया तृप्ति मुझसे पूछती है-’ पापा ये रथयात्रा क्या होता है..?’... और जब मैं उन्हें बताता हंू कि बेटा, रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथ में शोभायात्रा निकलती है। पूरे नगर में रथ परिक्रमा करती हुई जनकपुर पहुंचती है। वहां भगवान एक सप्ताह विश्राम करते हैं और विजियादशमी को पुनः रथ में बैठकर नगर की परिक्रमा करते वापस आते हैं।
    ‘...लेकिन पापा, रथ नगर की परिक्रमा क्यों करता है और रथ में सवार भगवान भाई-बहन क्यों हैं ?’ थोड़े समय के लिए मैं भी सोच में पड़ गया, मैं मन ही मन सोचने लगा ‘ आखिर जीत की खुशी में भी तो नगर की परिक्रमा की जाती है, फिर भला रथयात्रा को नगर भ्रमण कराने में क्या हर्ज है..?’ बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उनके प्रश्न तर्कपूर्ण होते हैं और उन्हें प्रत्युत्तर भी तर्कपूर्ण चाहिए। मैं उन्हें समझाता हूँ -‘..बेटा जनकपुर नगर के बाहर होता है जहां रथयात्रा पूरी होती है इसलिए रथयात्रा में रथ को नगर भ्रमण कराना अपरिहार्य होता है। रथयात्रा का मकसद लोक कल्याण भी है..और फिर भगवान जगन्नाथ ही तो अकेले देवता हैं जो लोगों के बीच जाकर उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं। हर गली-चैराहे में और अपने घर के सामने औरत, मर्द और बच्चे उनकी पूजा-अर्चना करके और रथ को खींचकर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। जगन्नाथ पुरी में तो भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी चलकर रथ तक आते हैं और जन समुदाय उन्हें स्पर्श कर प्रणाम करते हैं। पंडे और पुजारी आगे पीछे लोगों को हटाते जाते हैं, कोई पंखा झलता है, कोई भजन गाता है और भगवान की जै जैकार करता है। श्रद्धालुओ की भीड़ भगवान की एक झलक पाने, उन्हें स्पर्श करने और उनके रथ को खींचकर पुण्य लाभ प्राप्त करने के लिए उमड़ पड़ती है। उड़िया महिलाएं मुंह से एक विशेष प्रकार की आवाज निकालती है जिसे ‘‘हुलहुली’’ कहा जाता है। इस प्रकार की आवाज उड़िया महिलाएं पूजा करते समय हमेशा निकालती हैं।
‘...लेकिन पापा, भगवान को ट्रेक्टर और ट्रक में क्यों नहीं ले जाते ? हम लोग तो गणेश जी और दुर्गा माता को ट्रेक्टर में ले जाते हैं।’ विशू का प्रश्न मुझे आश्चर्यचकित कर देता है।
मैं उन्हें समझाता हूँ  बेटा, रथ की अपनी महत्ता है। सांख्य दर्शन के बनुसार शरीर के 24 तत्वों के उपर आत्मा होती है। इनमें पांच महातत्व, पांच तंत्र माताएं, दस इंद्रियां, मन, बुद्धि और चित्त तथा अहंकार होते हैं। दस इंद्रियों और मन के प्रतीक रथ है। रथ का स्वरूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय आवाज करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। भक्तजनों का पवित्र स्पर्श उन्हें प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि,चित और अहंकार से होता है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा की ओर संकेत करता है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है फिर भी वह स्वयं संचालित नहीं होता बल्कि माया उसे संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे चलाने अथवा खींचने के लिए लोकशक्ति की आवश्यकता होती है...।
  

जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी का अलग अलग रथ होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, बलभद्र जीे के रथ को तालध्वज और सुभद्रा जी के रथ केा देवलन कहा जाता है। जगन्नाथ जी का रथ 65 फीट लंबा , 65 फीट चौड़ा और 45 फीट ऊंचा होता है। इसमें 7 फीट व्यास के 17 पहिये लगे होते हैं। बलभद्र और सुभद्रा जी के रथ इससे कुछ छोटे होते हैं।... और जहां तक भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के भाई-बहन के रूप में पूजित होने का प्रश्न है तो ये वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। ब्रह्मा की पूजा केवल नारी रूप में होती है। अतः सुभद्रा ब्रह्मा जी की प्रतीक हैं। अलेक्जर कनिंघम के अनुसार ये तीनों बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं। इन्हें क्रमशः जगन्नाथ जी को भगवान बुद्ध, बलभद्र जी को धम्म और सुभद्रा जी को संघ का प्रतीेक माना गया है। उड़ीसा और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों में बौद्ध तांत्रिकों का प्रभाव रहा है जिसके अवशेष आज भी देखा जा सकता है।
‘....तो क्या रथयात्रा पूरे उड़ीसा में होता है ?’ विशू ने जिज्ञासा भरा प्रश्न किया। मैंने उन्हें बताया-’’समूचे उड़ीसा में रथयात्रा बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। जगन्नाथ पुरी में तो रथयात्रा अद्वितीय होता है। इसे देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लाखों पर्यटक यहां आते हैं। यहां के राज परिवार को प्रथम पूजा का अधिकार होता है। पूजा-अर्चना के बाद राजा रथ के सामने झाड़ु लगाते जाते हैं..आज भी यह परम्परा यहां देखने को मिलता है। यहां भगवान जगन्नाथ की सत्ता सर्वोच्च होती है।’’
जगन्नाथ पुरी की यात्रा करने वाले राजा, महाराजा, जमींदार, गौंटिया वहां से अपने साथ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों को लाते गये और अपने नगर में स्थापित कर उड़ीसा की परम्पराओं को यहां प्रचलित किये। छोटे रूप में ही सही, रथयात्रा यहां आज भी निकाली जाती है।
छत्तीसगढ़ के अन्यान्य नगरों- सारंगढ़, रायगढ़, सक्ती, चाम्पा, नरियरा, रायपुर, राजिम, बिलासपुर, रतनपुर बस्तर, जशपुर, धरमजयगढ़, और सरगुजा में भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा निकलती है। बस्तर की रथयात्रा में थोड़ी भिन्नता होती है। बस्तरिया आदिवासी इसे ‘‘गोन्चा परब’’ के रूप में मनाते हैं। यह उनका विशेष पर्व होता है। रायपुर में रथयात्रा दूधाधारी मठ से, बिलासपुर में वेंकटेश मंदिर से और अन्य स्थानों में जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा निकलती है। चाम्पा में जमींदार रूद्रशरणसिंह ने जगन्नाथ मंदिर बनवाया। इसी प्रकार सारागांव में श्री काशीप्रसाद राठौर के पूर्वज हटरी चैंक में और रगजा में श्री घासीराम चौधरी ने सन 1926 में जगन्नाथ मंदिर बनवाया था। शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी और राजिम को साक्षी गोपाल माना गया है। स्कंदपुराण में और उड़िया साहित्य में भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से पुरी ले जाने  का उल्लेख मिलता है। शिवरीनारायण में आज भगवान जगन्नाथ का नारायणी रूप विराजमान हैं। उनके चरण को स्पर्श करती ’’रोहिणी कुंड’’ स्थित है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह रोहिणी कुंड को एक धाम मानते हुए उनके दर्शन को मोक्षदायी बताया हैः-
रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर
बंदरी से नारी भई,  कंचन भयो शरीर।
जो कोई नर जाइके, दर्शन करे वही धाम
बटुकसिंह दरशन करी, पाये पद निर्वाण।।
छत्तीसगढ़ में रथयात्रा के दिन को बड़ा शुभ माना जाता है। इस दिन बेटी विदा और बहू को लिवा लाने की विशेष परम्परा है। अन्य शुभ कार्य भी इस दिन किये जाते हैं। नाते रिश्तेदारों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की भी प्रथा है। यह लोक भावना से जुड़ा हुआ पर्व है। इससे सद्भावना का विकास होता है। इसमें जात पात का भेद नहीं होता। इसीलिए कवि गाते हैं:-
मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

शिवरीनारायण की रथयात्रा

शिवरीनारायण की रथयात्रा      

  महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी`` के नाम से विख्यात शिवरीनारायण बिलासपुर से ६४ कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार से होकर १२० कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से ६० कि. मी., कोरबा जिला मुख्यालय से ११० कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होकर ११० कि. मी. की दूरी पर अवस्थित है। अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात यह नगर मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम और शबरी की साधना स्थली भी रहा है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित किये थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए
'शबरी-नारायण` नगर बसा है। भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहां गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्त तीर्थधाम`` कहा गया है। याज्ञवलक्य संहिता और रामावतार चरित्र में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदंती के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है।
 स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ''श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र`` कहा गया है। प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर ''नीलमाधव`` कहा गया। इसी नीलमाधव को १४ वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है। डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने ''कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` और ''कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला`` में लिखते हैं-''भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाला पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति ने संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने ''वज्रयान बुद्धिज्म`` की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।
इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ''रोहिणी कुंड`` विद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है-''रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर`` जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है :-
                                    रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।
                                    योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।
तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमश: आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूंकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहां के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्री गण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घूमते हुए रत्नपुर पहुंचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रत्नपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुंचे तब वहां के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहां रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहां के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में १४ महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, अध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मदद भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक ''गांधी चौरा`` का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गांधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत उपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक ''नाथ गुफा'' के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।
शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् १९२७ में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् १९२७ में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ''जोगीडीपा`` कहते हैं। रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ''जनकपुर`` भी कहा जाता है। पहले रथयात्रा में पंडित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आज केवल मठ की मूर्तियां ही रथ में निकाले जाते हैं।
रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूआत की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा। उन्होंने ही यहां रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह-जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है। इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नये दुकानों की शुरूआत और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहां श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। शिवरीनारायण को ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी`` कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है। इसी लिए प्राचीन कवि श्री बटुसिंह शिवरीनारायण माहात्म्य में गाते हैं-
                                    मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
                                    दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।
जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी को ''स्वर्गद्वार'' कहा जाता है और कोढ़ियों का उद्धार होता है। उसी प्रकार शिवरीनारायण की भी महत्ता है। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण-सिंदूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं :-
                                    क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।
                                    कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।
शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड में एक पुराना कोढ़ी खाना है और यहां एक लेप्रोसी विशेषज्ञ के रूप में डॉ. एम. एम. गौर की नियुक्ति भी हुई थी। बाद में उन्हीं के सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना की गयी थी। शिवरीनारायण से पांच कि.मी. की दूरी पर स्थित दुरपा गांव को अंग्रेज सरकार द्वारा ''लेप्रोसी गांव'' घोषित किया गया था। इस गांव में आना-जाना पूर्णत: प्रतिबंधित था। शिवरीनारायण से ७० कि.मी. पर चांपा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार बिलासपुर रायपुर रोड में बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है, जहां कोढ़ियों का इलाज होता है और अनेक प्रकार के उद्योग उनके द्वारा चलाये जाते हैं। उनके बच्चों के रहने और पढ़ने आदि का पूरा इंतजाम किया जाता है। सरकार इस संस्था को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करती है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है :-
                                    शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।
                                    याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।
ऐसे पवित्र और तीर्थ नगर शिवरीनारायण को नारायण धाम के रूप में जाना जाता है। यहां भगवान विश्णु के चतृर्भुजी मूर्तियों की अधिकता है। यहां एक प्राचीन वैष्णव मठ भी है। कदाचित इसी कारण इसे विष्णुकांक्षी तीर्थ नगर कहा जाता है। चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर अवस्थित शिवरीनारायण में प्राचीनता के अवशेष मिलते हैं। सभी युग में इस नगर का अस्तित्व था और इसे अनेक नामों से जाना जाता था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शिवरीनारायण माहात्म्य में लिखते हैं :-
                                    नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक
                                    प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूं नेक
                                    चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम
                                    बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम
                                    भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास
                                    कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।