रविवार, 5 फ़रवरी 2023

राजिम मेला के अवसर पर : धार्मिक आस्था का केंद्र राजिम

 राजिम मेला के अवसर पर

धार्मिक आस्था का केन्द्र राजिम

प्रो. अश्विनी केशरवानी

महानदी, सोढुल और पैरी नदी के संगम के पूर्व दिशा में बसा राजिम प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। दक्षिण कोशल में विख्यात् राजनीतिक तथा सांस्कृतिक धारा से सदैव सामंजस्य बनाये रखने वाला यह ऐतिहासिक नगरी रही है। यह नगर 20.58 डिग्री उत्तरी अक्षांश एवं 81.35 डिग्री पूर्वो देशांश पर स्थित है। रायपुर जिला में स्थित यह एक पौराणिक, प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं कला को अमूल्य धरोहरों को समेटे इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलानुरागियों के लिये आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। रायपुर जिला मुख्यालय से दक्षिण-पूर्वी दिशा में 50 कि.मी. की दूरी पर राजिम स्थित है। मंदिरों को इस प्राचीन नगरी की सीमा का निर्धारण दक्षिण पश्चिम में क्रमशः पैरी और महानदी से होती है। भूतेश्वर महादेव और पंचेश्वर महादेव के मंदिरों तक पैरी नदी की पृथक सत्ता प्रत्यक्ष देखने को मिलती है।

प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में पुरातात्विक उपलब्धियों की उपादेयता सर्वमान्य तथ्य है। फलतः वे स्थान जहां से पुरातात्विक सामाग्रियां प्राप्त होती है, वह इतिहास एवं संस्कृति के अध्येताओं तथा अनुसंधान कर्ताओं  के लिये सहज आकर्षण के केन्द्र हो जाते हैं। इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व राजिम को प्राप्त हैं वह स्थान किसी दूसरे स्थान को नहीं है। यह एक ऐसा स्थान है। जहां से प्राप्त सामाग्रियों का काल किसी विशेष युग से न होकर भिन्न-भिन्न कालों से है और उनका विषय राजनीतिक और सांस्कृतिक उभय प्रकृति का है और इतिहास निर्माण के साधन के रूप में उसका महत्व अपरिजात्य सा है। राजिम से लगे पितईबंध नामक ग्राम से प्राप्त मुद्रा से पहली बार ‘‘क्रमादित्य’’ नामक अज्ञात राजा को ऐतिहासिकता प्रकाश में आयी हैं साथी ही महेन्द्रादित्य के साथ उसके पारिवारिक संबंध का होना भी प्रमाणित हुआ है। महाशिव तीवरदेव का जो ताम्रपत्र राजिम से प्राप्त हुआ है। उससे उसके साम्राज्य  सीमा के निर्धारण में सहायता मिलती हैं विलासतुंग के नल वंश के इतिवृत्ति के ज्ञान का एक मात्र साधन राजीव लोचन मंदिर से प्रापत शिलालेख है। रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्लदेव प्रथम एवं रत्नदेव द्वितीय के विजय का उल्लेख उसके सामंत जगपालदेव के राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त अन्य शिलालेखों में हुआ है जिसके संबंध में अन्य अभिलेखों में कोई जानकारी नहीं मिलती। यहां के मंदिर और मूर्तियां लोगों की धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं इसके साथ ही भारतीय स्थापत्यकला एवं मूर्तिकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ अंचल के ऐश्वर्यशाली योगदान को लिपिबद्ध करते समय अपने लिये विशिष्ट स्थान की पात्रता रखने वाला उदाहरण है। सर्वेक्षण में यहां से बहुत अधिक मात्रा में मृत्भांड के अवशेष प्राप्त हुये है। इसके आधार पर यहां के सांस्कृतिक अनुक्रम का अनुमानित समय निर्धारित हो सका हैं इन मृण्मय अवशेषों के अध्ययन से ही अब यहां पल्लवित संस्कृति का प्रारंभ चाल्कोलिथिक युग में तय किया है। 

सांस्कृतिक केन्द्र:- राजिम के इतिहास की अंतः प्रकृति राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। इसके उन्नयन में राजवंशों का ऐश्वर्यशाली एवं विलासितापूर्ण जीवन किसी भी युग में एकांकी रूप से गतिमान दिखाई नहीं देता। यहां का प्राचीन सांस्कृतिक कलेवर मूलतः लोकजीवन की विविध उपलब्धियों द्वारा अभिषिक्त रहा हैं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हम राजिम के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का इस अंचल के अन्य स्थानों सिरपुर, मल्हार, आरंग, रतनपुर, खरौद और शिवरीनारायण आदि से करने पर ज्ञात होता है कि विभिन्न युगों में इन नगरों के विकास के मूल में जनता की आकांक्षाएं एवं अभिलाषाएं ही प्रमुख रूप से क्रियाशील रही है। जन आकाक्षाओं को तुष्ट करने के उद्देश्य से अथवा अपनी वैयक्तिक सांस्कृतिक उपलब्धिओं को जन जन तक पहुुंचाने की अभिलाषा से शासक वर्ग का भी प्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त होता रहा है। इस तरह राजिम को प्राचीन, सांस्कृतिक उपलब्धियों का सामान्य जन जीवन से निकट का संबंध रहा है। इसके विपरित अन्य स्थानों के उत्कर्ष में यथेष्ट सीमा तक राजनीतिक आधार ही कारणभूत रहा हैं इसकी पुष्टि के लिये हम सिरपुर को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं यह प्राचीन दक्षिण कोशल के दो प्रमुख राजवंशों-शरभपुरियों एवं सोमावंशियों की राजधानी रही है। यहां के विकास में शासकों की वैयक्तिक भावनाओं, अभिरूचियों एवं राजत्वकाल की विशिष्ट परिस्थितियों का प्रत्यक्ष प्रभाव रहा हैं यह सर्वमान्य है कि विशुद्ध राजनीतिक प्रश्रय द्वारा पोषित एवं सम्बंधित होने के कारण जो शताब्दियों तक ऐश्वर्य एवं समृद्धि की देवी का निवास स्थान रहा है, उसे अपने आश्रयदाता के पतन के साथ ही श्रीहीन होना पड़ा जो कभी अपने ऐश्वर्य एवं समृद्धि के कारण ‘‘श्रीपुर’’ नाम को सार्थक करता था, वही आज दुर्गम वन विधियों से आवृत, उदास, क्लांत, शोभाहीन एवं उपेक्षित छोटा सा ग्राम मात्र रह गया है। यही स्थिति रतनपुर, मल्हार, खरौद और शिवरीनारायण आदि को भी है।

यद्यपि राजिम अपने सुदीर्घ ऐतिहासिक जीवन में कभी उत्कर्ष का सुख  भोगा है, तो कभी अपकर्ष की पीड़ा भी झेला है। परन्तु किसी भी युग में धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावभूति पर अवलम्बित जन आस्था का सम्बल मिलने से इसके विकास की संघ प्रवाहमान धारा को पूर्णतः अवरूद्ध नहीं किया जा सका हैं युग विशेष की बदलती मान्यताओं एवं परिस्थितयों के सम्यक प्रीााव द्वारा नियंत्रित परम्परा तथा आस्था को सदैव प्रश्रय देने वाली यह ऐतिहासिक नगरी छत्तीसगढ़ के प्राचीन काल से लेकर वर्तमान युग तक ही सांस्कृतिक उपलब्धियों से इेतिहासकारों, पुरातत्वविदों एवं जिज्ञासुओं को परिचित कराने में समर्थ है। अतः यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि राजिम का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अध्ययन प्राचीन दक्षिण कोशल के सांस्कृतिक इतिहास के सम्य ज्ञान के लिये आवश्यक है।

राजिम नाम को सार्थकता :- राजिम नाम को सार्थकता के लिये जनश्रुतियों का सहारा लिया जा सकता है। जनश्रुति से पता चलता है कि राजिम नामक एक तेलिन के नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि एक समय जब राजिम तेल बेचने जा रही थी तो वह रास्ते में पड़े एक पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ी जिससे टोकरी में रखा तेल गिर गया। तेल के गिर जाने से वह अपने सास-ससुर से मिलने वाली प्रताड़ना की कल्पना मात्र से भयभीत होकर विलाप करने लगी और ईश्वर से उनसे रक्षा करने की प्रार्थना करने लगी। कुछ देर रोने के बाद अपने को संयत करके घर लौटने के लिये जब वह टोकरी को उठाने लगी तब तेल पात्र को भरा पाकर चकित हो गयी। फिर वह खुशी खुशी पास के गांव में तेल बेचने गयी वहां सुबह से शाम तक तेल बेचती रही लेकिन तेल पात्र खाली नहीं हुआ। इससे इन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रतिदिन की तुलना मे अधिक पैसा कमाने के बावजूद तेल पात्र को तेल से भरा पाकर खुशी से वह घर लौटी। लेकिन घर में उसकी बतायी बातों की किसी ने विश्वास नहीं किया बल्कि उसको पुष्टि के लिये दूसरे दिन उसी जगह से गुजर कर पास के गांवों में तेल बेचने जाते हैं लेकिन तेल पात्र में एक बूंद तेल कम नहीं हुआ जिससे उन्हे बहू की बातों का विश्वास हो गया। बाद में राजिम को एक रात स्वप्नादेश हुआ कि उस स्थान में दबे देव प्रतिमा को निकालकर प्रतिष्ठित करो। निर्दिष्ट स्थान की खुदाई करने पर एक श्यामवर्ण विष्णु भगवान की चतुर्भुजी प्रतिमा मिली। उस प्रतिमा को श्रद्धा पूर्वक घर लाकर उसकी पूजा अर्चना करने लगे। इसी समय वहां के राजा जगपालदेव को स्वप्नादेश हुआ कि लोकहित में वहां एक मंदिर का निर्माण कराकर राजिम तेलिन के घर स्थित प्रतिमा को उसमें प्रतिष्ठित करे। उन्होंने इस आदेश का श्रद्धा पूर्वक पालन करते हुए एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और राजिम तेलिन के घर जाकर उस मूर्ति को मंदिर में प्रतिष्ठित करने हेतु देने को कहा। तब राजिम उस मूर्ति को सशर्त कि भगवान के नाम के साथ उसका भी नाम जोड़ा जाये, देने को राजी हो गयी। इस प्रकार मंदिर का नाम ‘‘राजिम-लोचन’’ हुआ जो आग्र चलकर ‘‘राजीव लोचन’’ कहलाने लगा।

सामान्यता विद्वानों ने इस जनश्रुति को पूर्ण सत्य नहीं माना है लेकिन इससे इंकार भी नहीं किया है। सत्यांश की पुष्टि के लिये दो तथ्य प्रस्तुत किये जाते है:-

1 उक्त कहानी में उल्लेखित राजा जगपाल को ऐतिहासिक पुरूष माना जा सकता हैं और 

2 उनकों जगपालदेव नाम उस राजा के साथ स्थापित किया जा सकता है। जिसका शिलालेख राजीव लोचन मंदिर की पाश्र्व भित्ति में लगा हुआ है।

3. राजीव लोचन मंदिर के सामने राजेश्वर तथा दानेश्वर मंदिर के पीछे जो लेकिन मंदिर के नाम से देव गृह है वह राजिम तेलिन संबंधी जनश्रुति को प्रमाणित करता है इस मंदिर के गर्भगृह में पूजार्थ एक शिलापट्ट ऊंची वेदी पर पृष्ठभूमि से लगा हुआ हैं इसके सामने उपरी भाग पर खुली हथेली, सूर्य, चुद्र और पूर्ण कुुंभ की आकृति विद्यमान है, नीचे एक पुरूष और स्त्री की सम्मुखाभिमुख प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में स्थित है। इसके दोनों पाश्र्व में एक-एक परिचारिका की मूर्ति स्थित है। शिलापट्ट के मध्य जुते बैलयुक्त कोल्हू का शिल्पांकन है।

रायपुर जिला गजेटियर के अनुसार सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद रायबहादुर हीरालाल ने जुते बैल युक्त कोल्हू को राजिम तेलिन की वंश परम्परा से चले आने वाले व्यवसाय की पतीकात्मक अभिव्यक्ति बताया है यह शिलापट्ट सती स्तम्भ कहलाता है। इसे आधार मानकर उन्होंने यह मत व्यक्त किया है कि यदि राजिम तेलिन से संबंधित जनश्रुति के मूल में सत्यांश है तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वह अपने अपराध देव राजीव लोचन के सामने सती हुई थी परन्तु इसमें सत्यांश किस सीमा तक है तथा उसे कहां तक विश्वास किया जा सकता है यह निर्णय कर पाना कठिन है सती स्तम्भ के बारे मे विचार करने पर अज्ञान और माया के वशीभूत जीव की दशा का चित्रण कोल्हू और बैल को मानकर किया गया है और धर्माचरण से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, इस शाश्वत संदेश को अभिव्यक्त करने का उपक्रम इस पीठिका पर अंकित है, ऐसा प्रतीत होता है। परन्तु गहराई में जाने पर ही इसके गहन भावों और दार्शनिक तथ्यों को जान पाते है।

राजिम नाम के संबंध में एक दूसरी जनश्रुति भी प्रचलित है। इसका उल्लेख सर रिचर्ड जेकिंस ने एशियाटिक रिसर्चेज में किया है। उसके अनुसार राजिम श्रीराम के समकालीन राजीवनयन नाम किसी राजा की राजधानी थी। राजा राजीव नयन ने श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़कर महानदी के तट पर निवास कर रहे कंदर्मक ऋषि को सौंप दिया। घोड़े की रक्षा कर रहे शत्रुघन जब ऋषि कंदर्मक से अश्वमेद्य यज्ञ का घोड़ा को मांगा लेकिन ऋषि के मना करने पर शत्रुघन के आक्रमण कर दिया और ऋषि के क्रोधाग्नि से सेना सहित शत्रुघन मारे गये। अश्वमेघ यज्ञ की सफलता के लिये स्वयं श्रीराम को यहां आना पड़ा था। यहां श्रीराम के आने पर राजा राजीव नयन बिना युद्ध किये उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। ऋषि कंदर्मक भी श्रीराम की विनती करने पर शत्रुघन सहित सेना को जीवित कर दिये। तब श्रीराम यहां अपना अस्तित्व ‘‘राजीव लोचन’’ के रूप में छोड़ते गये। आज भी यहां श्रीराम की मूर्ति प्रतिष्ठित है।

धर्मशास्त्र में व्याख्या :- भारतीय प्रतीक विज्ञान में वृष का संबंध धर्म से स्थापित किया गया है निरूवत में ब्रह्म के यज्ञ पुरूष रूप (धर्म) की कल्पना वृषभ रूप में की गयी है। श्रीमद् भागवत में धर्म के वृत्त रूप का उल्लेख करते हुये तप, ,शौच, ,दया और सत्य को उसका चार पैर बताया गया है। स्कंद पुराण में विष्णु के वृषभ रूप में अवतार लेने का वर्णन हैं योग वशिष्ठ में ऊखल को काली की आकृति कहा गया हैं काली शिव शक्ति का नाम है। कोल्हू का अधोभाग ऊखल का ही दूसरा रूप है। शक्ति तत्व के अनुरूप शिव-शक्ति की भी स्थाणु रूप में कल्पना की गयी है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कूटस्थ लिंग को स्थाणु कहा गया है। कोल्हू का ललाट भाग स्थाणु है। इस तरह सम्पूर्ण कोल्हू लिंग और वेदी का एक स्वरूप होने से अर्द्ध नारीश्वर का प्रतीक है। यह अर्द्ध नारीश्वर रूप शिव-शक्ति सामरस का बोधक है जो सृष्टि का मूल है कोल्हू के वेदी अंग को योनी भी कह सकते हैं। शास्त्रकारों ने भी योनि को प्रकृति तथा लिंग को पुरूष माना हैं ‘‘लिंड.म पुरूष इत्युक्तोयोनिस्तु प्रकृतिः स्मृताः।’’ शिव पुराण के अंतर्गत वायु संहिता में भी शिव पवरमेशान को पुरूष और परमेश्वरी को प्रकृति कहा गया हैं सारण्य मतानुसार जड़ प्रकृति में चेतन पुरूष के संसर्ग से उत्पन्न संक्षोभ सृष्टि का कारण है। कोल्हू के अधोभाग अर्थात् वेदांे, योनि अथवा प्रकृति को उपर के ललाट अर्थात स्थाणु लिंग या पुरूष संसर्ग स्थिर रखने वाले तथा गति उत्पन्न करने वाला रज्जु काल सर्प का प्रतीक है। इस तरह कोल्हू चराचर जगत का और उसमें जूता बैल धर्म का सूचक कहा जा सकता है तथा इस रूपांकन का तात्विक भाव ‘‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा’’ को अभिव्यक्त करता है। अतः ऐसी स्थिति में कोल्हू एवं बैल को व्यवसाय का प्रतीक कहना युक्ति संगत नहीं होगा। इस प्रकार का दूसरा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिससे यह स्वीकार किया जा सके कि सती स्तम्भों पर सती नगरी के व्यवसाय आदि को प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की परम्परा रही हो। 

कलचुरी कालीन राजिम :- राजीव लोचन मंदिर के महामंडप को पाश्र्व भित्ति पर कलचुरि संवत् 896 का एक शिलालेख है जिसे रतनपुर के कलचुरी नरेशों के सामंत जगपालदेव ने उत्कीर्ण कराया था। इस अभिलेख में ंजगपालदेव के वंश का नाम ‘‘राजमाल’’ उल्लेखित है। कनिंघम ने राजमाल वंश नाम से ही ‘‘राजम-राजिम’’ नाम की उत्पत्ति मानी है। यद्यपि राजमाल से राजिम नामकरण का प्रचलन संभव प्रतीत होता है परन्तु शब्द साम्य के आधार पर इस अनुमान को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता । अधिकांश विद्वान ‘‘राजिम’’ को ‘‘राजीव’’ का विकृत रूप मानते है। इस संदर्भ में वे ‘‘राजीव लोचन’’ से भगवान विष्णु के एक विरूद का आश्य स्वीकार करते हैं इसकी प्रमाणिकता के लिये वहां की प्रसिद्ध विष्णु की प्रतिमा को प्रस्तुत किया जा सकता है।

गुप्त कालीन मूर्तिकला का केन्द्र :- राजीव लोचन मंदिर पंचायत शैली का हैं मुख्य मंदिर ऊँचे विस्तृत चबुतरे पर बनाया गया है। उसके चारों ओर चार देवलिकाएं अर्थात छोटे मंदिर बनाए गये है। मुख्य मंदिर के तीन भाग है मंडप और दक्षिण-पश्चिम छोर से सीढ़ियां बनी है जिसमें चढ़कर मंदिर में प्रवेश किया जा सकता हैं मंडप के बीचोबिच स्तम्भों की दो पंक्तियां हैं। प्रत्येक पंक्ति में छः स्तम्भ के नीचे का भाग सपाट है जबकि उपरी भाग में गंगा-यमुना, वराह, नृसिंग,सूर्य और दुर्गा की देव प्रतिमाएं अंकित हैं गर्भगृह में भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा है वे अपने चारों हाथ में शंख, चक्र.,पद्म और गदा धारण किये हुये है।

राजिम को अधिकांश मूर्तियों में त्रिभंग अंगयष्टि के रूपायन द्वारा दैहिक सौंदर्य में लयात्मकता, कोमलता तथा रसात्मकता की प्रतिष्ठा की गयी हैं यहां की कुछ मूर्तियों में विशेष प्रयोजन की अभिव्यक्ति के लिये यदि एक भंग अथवा अतिभंग मुद्रा का आश्रय लिया गया है तो ऐसे उदाहरणों में आंगिक लयात्मकता, कोमलता, सुडौलता आदि को पूर्ण मनोयोग के साथ प्रस्तुत किया गया है। यहां कि अनेक मूर्तियों दैहिक सौंदर्य की अभिव्यक्ति के लिये रूपमंडन, सुललित अंग विन्यास, अंग विच्छेप तथा भाव भंगिमा के निर्देशन में मूर्तिकारों ने आक्रामक भाव का चयन किया है। इस तरह यहां शिल्पियों ने ‘‘रूप पापं वृत्तये न’’ उक्ति को बड़ी चतुराई और उदारता के साथ प्रस्तुत किया हैं इन मूर्तियों में श्रृंगार और अध्यात्मिकता का मनोरम समन्वय है यही इनके चिरत्तर रसात्मकता का आधार है। गुप्त कालीन तथा पूर्व मध्यकालीन परम्परा में हम यहां की मूर्तियों को अधोवस्त्र धारण किये जाते हैं नारी मूर्तियों में कटि के उपर के अंग को ढकने के लिये उत्तरीय अथवा स्तनोत्तरीय के रूप में प्रयोग किये जाने वाले वस्त्र भी पाते है जिसके छोर बड़े कलात्मक ढंग से लटकते दिखाये गये हैं यहां की मूर्तियों में विविध अलंकरणों का समायोजन गुप्त परम्परा तथा पूर्व मध्यकालीन परम्परा का है। डाॅ. विष्णु सिंह ठाकुर राजिम के मंदिरों के शिल्प के संबंध में लिखते हैं - ‘‘प्राचीन कलाकृतियां जहां एक ओर भौतिक जीवन के हर्ष-विषाद के क्षणों को सुख-दुख की अनुभूतियों को शील, संयम आदि भौतिक गुणों तथा समृद्धि एवं ऐश्वर्य को प्रस्तुत करती है, वही दूसरी ओर उनके प्रति कलात्मकता में अध्यात्म का स्वर सद्यः मुखरित रहता है। यह दूसरा पक्ष ही भारतीय कला का प्राण बिन्दु रहा है।’’

‘‘राजिम माहात्म्य’’ में इसे ‘‘पद्म क्षेत्र’’ कहा गया है। इसमे आंचलिक विश्वास एवं धार्मिक का पुट है। सृष्टि के आरंभ में भागवान विष्णु के नाभि कमल की एक पंखुड़ी पृथ्वी पर गिरी पड़ी। इसी कमल दल से ढका भूभाग कालान्तर में ‘‘पद्म क्षेत्र’’ के नाम से जाना गया। कुलेश्वर महादेव (उत्पलेश्वर लिंग) को केन्द्र मानकर चम्पेश्वर, बावनेश्वर, फिंगेश्वर तथा पटेश्वर-इन पांचों शिव लिंगों की ‘‘प्रदक्षिणा’’ को पंच कोशी यात्रा कहते है। चारों दिशाओं में स्थित धाम और गुप्त तीर्थधाम शिवरीनारायण के बाद राजिम का दर्शन साक्षी गोपाल के रूप में किया जाता हैं माघ पूर्णिमा को यहां मेला लगता है जो छत्तीसगढ़ के प्रमुख मेले में से एक है।


 प्रो. अश्विनी केशरवानी

‘‘राघव‘‘, डागा कालोनी,

चाम्पा 495671 (छत्तीसगढ़)



शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

माघी मेला के अवसर पर : छत्तीसगढ़ का टेम्पल सिटी शिवरीनारायण

 माघी मेला के अवसर पर

छत्तीसगढ़ का टेम्पल सिटी शिवरीनारायण     

महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से भरपूर और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 140 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। यह नगर कलचुरि कालीन मूर्तिकला से सुसज्जित है। यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा नमूना है। इसीलिए इसे ‘‘प्रयाग‘‘ जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ‘‘श्री नारायण क्षेत्र‘‘ और ‘‘श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र‘‘ कहा गया है। प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्री तक लगता है। इस मेले में हजारों-लाखों दर्शनार्थी भगवान नारायण के दर्शन करने जमीन में ‘‘लोट मारते‘‘ आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का पट बंद रहता है। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है और शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ’’साक्षी गोपाल‘‘ विराजमान हैं। कदाचित् इसीकारण यहां के मेले को ‘‘छत्तीसगढ़ का कुंभ‘‘ कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।

गुप्तधाम:-


    चारों दिशाओं में अर्थात् उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम् पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकाधाम स्थित है लेकिन मध्य में ‘‘गुप्तधाम‘‘ के रूप में शिवरीनारायण स्थित है। इसका वर्णन रामावतार चरित्र और याज्ञवलक्य संहिता में मिलता है। यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर, द्वापरयुग में विष्णुपुरी और नारायणपुर के नाम से विख्यात् था जो आज शिवरीनारायण के नाम से चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) के तट पर कलिंग भूमि के निकट देदिप्यमान है। यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूढ़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है। यहां की महत्ता का वर्णन पंडित हीराराम त्रिपाठी द्वारा अनुवादित शबरीनारायण माहात्म्य में किया गया हैः-

शबरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान

याज्ञवलक्य व्यासादि ऋषि निज मुख करत बखान।

शबरीनारायण मंदिर:-

यहां के प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों की भव्यता और अलौकिक गाथा अपनी मूलभूत संस्कृति का शाश्वत रूप प्रकट कर रही है, जो प्राचीनता की दृष्टि से अद्वितीय है। 8-9 वीं शताब्दी की  मूर्तियों को समेटे मंदिर एक कलात्मक नमूना है, जिसमें उस काल की कारीगरी आज भी देखी जा सकती है। 172 फीट ऊंचा, 136 फीट परिधि और शिखर में 10 फीट का स्वर्णिम कलश के कारण कदाचित् इसे ‘‘बड़ा मंदिर‘‘ कहा जाता है। वास्तव में यह शबरीनारायण मंदिर है। यह ऊपर भारतीय आर्य शिखर शैली का उत्तम उदाहरण है। इसका प्रवेश द्वार सामान्य कलचुरि कालीन मंदिरों से भिन्न है। प्रवेश द्वार की शैलीगत समानता नांगवंशी मंदिरों से अधिक है। वर्तमान मंदिर जीर्णोद्धार के कारण नव कलेवर में दृष्टिगत होता है। इस मंदिर के गर्भगृह में दीवारों पर चित्र शैली में कुछ संकेत भी दृष्टिगत होता है। कारीगरों का यह सांकेतिक शब्दावली भी हो सकता है ? प्राचीन काल में यहां पर एक बहुत बड़ा जलस्रोत था और इसे बांधा गया है। जलस्रोत को बांधने के कारण मंदिर का चबूतरा 100 100 मीटर का है। जलस्रोत भगवान नारायण के चरणों में सिमट गया है। इसे ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ कहा जाता है। इस कुंड की महिमा कवि बटुकसिंह चैहान के शब्दों में-रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर। इस मंदिर के गर्भ द्वार के पाश्र्व में वैष्णव द्वारपालों शंख पुरूष और चक्र पुरूष की आदमकद प्रतिमा है। इसी आकार प्रकार की मूर्तियां खरौद के शबरी मंदिर के गर्भगृह में भी है। द्वार शाखा पर बारीक कारीगरी और शैलीगत लक्षण की भिन्नता दर्शनीय है। गर्भगृह के चांदी के दरवाजा को ‘‘केशरवानी महिला समाज‘‘ द्वारा बनवाया गया है। इसे श्री देवालाल केशरवानी ने जीवन मिस्त्री के सहयोग से कलकत्ता से सन् 1959 में बनवाया था। गर्भगृह में भगवान नारायण पीताम्बर वस्त्र धारण किये शंख, चक्र, पद्म और गदा से सुसज्जित स्थित हैं। साथ ही दरवाजे के पास परिवर्ती कालीन गरूड़ासीन लक्ष्मीनारायण की बहुत ही आकर्षक प्रतिमा है जिसे जीर्णोद्धार के समय भग्न मंदिर से लाकर रखा गया है। मंदिर के बाहर गरूण जी और मां अम्बे की प्रतिमा है। मां अम्बे की प्रतिमा के पीछे भगवान कल्की अवतार की मूर्ति है जो शिवरीनारायण के अलावा जगन्नाथ पुरी में है। श्री प्रयागप्रसाद और श्री जगन्नाथप्रसाद केशरवानी ने मंदिर में संगमरमर लगवाकर सद्कार्य किया है। मंदिर में सोने का कलश क्षेत्रीय कोष्टा समाज के द्वारा सन् 1952 में लगवाया गया है।

    श्री प्यारेलाल गुप्त ने प्राचीन छत्तीसगढ़ में लिखा है:-‘‘शिवरीनारायण का प्राचीन नाम शौरिपुर होना चाहिये। शौरि भगवान विष्णु का एक नाम है और शौरि मंडप के निर्माण कराये जाने का उल्लेख एक तत्कालीन शिलालेख में हुआ है।‘‘ इस मंदिर के निर्माण के सम्बंध में भी अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण किसी शबर राजा द्वारा कराया गया मानते हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और भोगहापारा (शिवरीनारायण) के मालगुजार पंडित मालिकराम भोगहा ने भी इस मंदिर का निर्माण किसी शबर के द्वारा कराया गया मानते हैं।

तंत्र मंत्र की साधना स्थली:-

उड़ीसा के प्रसिद्ध कवि सरलादास ने चैदहवीं शताब्दी के प्रारंभ में लिखा है:-‘‘भगवान जगन्नाथ स्वामी को शिवरीनारायण से लाकर यहां प्रतिष्ठित किया गया है।‘‘ छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरि ठाकुर ने अपने एक लेख-‘‘शिवरीनारायण जगन्नाथ जी का मूल स्थान है‘‘ में लिखा हैः-‘‘इतिहास तर्क सम्मत विश्लेषण से यह तथ्य उजागर होता है कि शिवरीनारायण से भगवान जगन्नाथ को पुरी कोई ब्राह्मण नहीं ले गया। वहां से उन्हें हटाने वाले इंद्रभूति थे। वे वज्रयान के संस्थापक थे।‘‘ डाॅ. एन. के. साहू के अनुसार- ‘‘संभल (संबलपुर) के राजा इंद्रभूति जिन्होंने दक्षिण कोसल के अंधकार युग (लगभग 8-9वीं शताब्दी) में राज्य किया था। वे बौद्ध धर्म के वज्रयान सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। इंद्रभूति पद्मवज्र (सरोरूहवज्र) के शिष्य अनंगवज्र के शिष्य थे। कविराज गोपीनाथ महापात्र इंद्रभूति को ‘‘उड्डयन सिद्ध अवधूत‘‘ कहा है। सहजयान की प्रवर्तिका लक्ष्मीकरा इन्हीं की बहन थी। इंद्रभूति के पुत्र पद्मसंभव ने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की स्थापना की थी। इंद्रभूति ने अनेक ग्रंथ लिखा है लेकिन ‘‘ज्ञानसिद्धि‘‘ उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ है जो 717 ईसवी में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने इस ग्रथ में भगवान जगन्नाथ की बार बार वंदना की है। इसके पहले जगन्नाथ जी को भगवान के रूप में मान्यता नहीं मिली थी। वे उन्हें भगवान बुद्ध के रूप में देखते थे और वे उनके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करते थे। ‘‘इवेज्र तंत्र साधना‘‘ और ‘‘शाबर मंत्र‘‘ के समन्वय से उन्होंने वज्रयान सम्प्रदाय की स्थापना की। शाबर मंत्र साधना और वज्रयान तंत्र साधना की जन्म भूमि दक्षिण कोसल ही है।‘‘ डाॅ. जे.पी. सिंहदेव के अनुसार-‘‘इंद्रभूति शबरीनारायण से भगवान जगन्नाथ को सोनपुर के पास सम्बलाई पहाड़ी में स्थित गुफा में ले गये थे। उनके सम्मुख बैठकर वे तंत्र मंत्र की साधना किया करते थे। शबरी के इष्टदेव जगन्नाथ जी को भगवान के रूप में मान्यता दिलाने का यश भी इंद्रभूति को ही है।‘‘ आसाम के ‘‘कालिका पुराण‘‘ में उल्लेख है कि तंत्रविद्या का उदय उड़ीसा में हुआ और भगवान जगन्नाथ उनके इष्टदेव थे। 

मंदिरों की नगरी:- 

शिवरीनारायण में अन्यान्य मंदिर हैं जो विभिन्न कालों में निर्मित हुए हैं। चूंकि यह नगर विभिन्न समाज के लोगों का सांस्कृतिक तीर्थ है अतः उन समाजों द्वारा यहां मंदिर निर्माण कराया गया है। यहां अधिकांश मंदिर भगवान विष्णु के अवतारों के हैं। कदाचित् इसी कारण इस नगर को वैष्णव पीठ माना गया है। इसके अलावा यहां शैव और शाक्त परम्परा के प्राचीन मंदिर भी हैं। इन मंदिरों में निम्नलिखित प्रमुख हैंः-

केशवनारायण मंदिर:-

नारायण मंदिर के पूर्व दिशा में पश्चिमाभिमुख सर्व शक्तियों से परिपूर्ण केशवनारायण की 11-12 वीं सदी का मंदिर है। ईंट और पत्थर बना ताराकृत संरचना है जिसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के चैबीस रूपों का अंकन बड़ी सफाई के साथ किया गया है। जबकि द्वार के उपर शिव की मूर्ति है। अन्य परम्परागत स्थापत्य लक्षणों के साथ गर्भगृह में दशावतार विष्णु की मानवाकार प्रतिमा है। यह मंदिर कलचुरि कालीन वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। यहां एक छोटा अंतराल है, इसके बाद गर्भगृह। मंदिर पंचरथ है और मंदिर की द्वार शाखा पर गंगा-यमुना की मूर्ति है, साथ ही दशावतारों का चित्रण हैं। 

चंद्रचूड़ महादेव:-

केशवनारायण मंदिर के वायव्य दिशा में चेदि संवत् 919 में निर्मित और छत्तीसगढ़ के ज्योर्तिलिंग के रूप में विख्यात् ‘‘चंद्रचूड़ महादेव‘‘ का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के द्वार पर एक विशाल नंदी की मूर्ति है। शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते राज पुरूष और रानी की हाथ जोड़े पद्मासन मुद्रा में प्रतिमा है। नंदी की मूर्ति के बगल में किसी सन्यासी की मूर्ति है। मंदिर के बाहरी दीवार पर एक कलचुरि कालीन चेदि संवत् 919 का एक शिलालेख है। इस शिलालेख का निर्माण कुमारपाल नामक किसी कवि ने कराया है और भोग राग आदि की व्यवस्था के लिए ‘चिचोली‘ नामक गांव दान में दिया है। पाली भाषा में लिखे इस शिलालेख में रतनपुर के राजाओं की वंशावली दी गयी है। इसमें राजा पृथ्वीदेव के भाई सहदेव, उनके पुत्र राजदेव, पौत्र गोपालदेव और प्रपौत्र अमानदेव के पुण्य कर्मो का उल्लेख किया गया है। 

राम लक्ष्मण जानकी मंदिर:- 

चंद्रचूड़ महादेव मंदिर के ठीक उत्तर दिशा में श्रीराम लक्ष्मण जानकी का एक भव्य मंदिर है जिसका निर्माण महंत अर्जुदास की प्रेरणा से पुत्र प्राप्ति के पश्चात् अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह ने कराया था। इसी प्रकार केंवट समाज द्वारा श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर का निर्माण रामघाट के पास लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास कराया गया है। इस मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के चैबीस अवतारों की सुंदर मूर्तियां दर्शनीय हैं। इस मंदिर के बगल में संवत् 1997 में निर्मित श्रीरामजानकी-गुरू नानकदेव मंदिर का मंदिर है। 

महेश्वर महादेव और शीतला माता मंदिर:-


महेश्वर महादेव 
महानदी के तट पर छत्तीससगढ़ के सुप्रसिद्ध मालगुजार श्री माखनसाव के कुलदेव महेश्वर महादेव और कुलदेवी शीतला माता का भव्य मंदिर, बरमबाबा की मूर्ति और सुन्दर घाट है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा लिखित श्रीशबरीनारायण माहात्म्य के अनुसार इस मंदिर का निर्माण संवत् 1890 में माखन साव के पिता श्री मयाराम साव और चाचा श्री मनसाराम और सरधाराम साव ने कराया है। माखन साव भी धार्मिक, सामाजिक और साधु व्यक्ति थे। ठाकुर जगमोहनसिंह ने ‘सज्जनाष्टक‘ में उनके बारे में लिखा है। उनके अनुसार माखनसाव क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बद्रीनाथ और रामेश्वरम् की यात्रा की और 80 वर्ष की सुख भोगा। उन्होंने महेश्वर महादेव और शीतला माता मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उनके पौत्र श्री आत्माराम साव ने मंदिर परिसर में संस्कृत पाठशाला का निर्माण कराया और सुन्दर घाट और बाढ़ से भूमि का कटाव रोकने के लिए मजबूत दीवार का निर्माण कराया। इस घाट में अस्थि विसर्जन के लिए एक कुंड बना है। इस घाट में अन्यान्य मूर्तियां जिसमें शिवलिंग और हनुमान जी प्रमुख है, के अलावा सती चैरा बने हुये हैं।
शीतला माता 

लक्ष्मीनारायण-अन्नपूर्णा मंदिर:-

नगर के पश्चिम में मैदानी भाग जहां मेला लगता है, से लगा हुआ लक्ष्मीनारायण मंदिर है। मंदिर के बाहर जय विजय की मूर्ति माला लिए जाप करने की मुद्रा में है। सामने गरूड़ जी हाथ जोड़े विराजमान है। गणेश जी भी हाथ में माला लिए जाप की मुद्रा में हैं। मंदिर की पूर्वी द्वार पर माता शीतला, काल भैरव विराजमान हैं। वहीं दक्षिण द्वार पर शेर बने हैं। भीतर मां अन्नपूर्णा की ममतामयी मूर्ति है जो पूरे छत्तीसगढ़ में अकेली है। उन्हीं की कृपा से समूचा छत्तीसगढ़ ‘‘धान का कटोरा‘‘ कहलाता है। नवरात्रि में यहां ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती है। जीर्णोद्धार में लक्ष्मीनारायण और अन्नपूर्णा मंदिर एक ही अहाता के भीतर आ गया जबकि दोनों मंदिर का दरवाजा आज भी अलग अलग है। लक्ष्मीनारायण मंदिर का दरवाजा पूर्वाभिमुख है जबकि अन्नपूर्णा मंदिर का दरवाजा दक्षिणाभिमुख है। मंदिर परिसर में दक्षिणमुखी हनुमान जी का मंदिर भी है।

राधा-कृष्ण मंदिर:-

मां अन्नपूर्णा मंदिर के पास मरार-पटेल समाज के द्वारा राधा-कृष्ण मंदिर और उससे लगा समाज का धर्मशाला का निर्माण कराया गया है। मंदिर के उपरी भाग में शिवलिंग स्थापित है। इसी प्रकार लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह के सामने मथुआ मरार समाज द्वारा राधा-कृष्ण का पूर्वाभिमुख मंदिर बनवाया गया है।

सिंदूरगिरि-जनकपुर:-

मेला मैदान के अंतिम छोर पर साधु-संतों के निवासार्थ एक मंदिर है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहीं आकर नौ दिन विश्राम करते हैं। इसीलिए इसे जनकपुर कहा जाता है। प्राचीन साहित्य में जिस सिंदूरगिरि का वर्णन मिलता है, वह यही है। इसे ‘‘जोगीडिपा‘‘ भी कहते हैं। क्यों कि यहां ‘‘योगियों‘‘ का वास था। महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार ने यहां पर योगियों के निवासार्थ भवन का निर्माण संवत् 1927 में कराया। स्वामी अर्जुनदास की प्रेरणा से संवत् 1928 में श्री बैजनाथ साव, चक्रधर, बोधराम और अभयराम ने यहां एक हनुमान जी का भव्य मूर्ति का निर्माण कराया। द्वार पर एक शिलालेख है जिसमें हनुमान मंदिर के निर्माण कराने का उल्लेख है। ।

काली और हनुमान मंदिर:-  शबरी सेतु के पास काली और हनुमान जी का भव्य और आकर्षक मंदिर दर्शनीय है।

शिवरीनारायण मठ:-


नारायण मंदिर के वायव्य दिशा में एक अति प्राचीन वैष्णव मठ है जिसका निर्माण स्वामी दयारामदास ने नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों से इस नगर को मुक्त कराने के बाद की थी। रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं। वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर के चेदि संवत् 933 के शिलालेख में मंदिर के दक्षिण दिशा में संतों के निवासार्थ एक मठ के निर्माण कराये जाने का उल्लेख है। इस मठ के बारे में सन 1867 में जे. डब्लू. चीजम साहब बहादुर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इस मठ की व्यवस्था के लिए माफी गांव हैहयवंशी राजाओं के समय से दी गयी है और इस पर इसके पूर्व और बाद में किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया है। संवत् 1915 में डिप्टी कमिश्नर इलियट साहब ने महंत अर्जुनदास के अनुरोध पर 12 गांव की मालगुजारी मंदिर और मठ के राग भोगादि के लिये प्रदान किया। 

जगन्नाथ एवं अन्य मंदिर:-

मठ परिसर में संवत् 1927 में महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार राजसिंह ने एक जगदीश मंदिर बनवाया जिसे उनके पुत्र चंदनसिंह ने पूरा कराया। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अलावा श्रीराम लक्षमण और जानकी जी की मनमोहक मूर्ति है। परिसर में हनुमान जी और सूर्यदेव की मूर्ति है। सूर्यदेव के मंदिर को संवत् 1944 में रायपुर के श्री छोगमल मोतीचंद्र ने बनवाया। इसीप्रकार हनुमानजी के मंदिर को लवन के श्री सुधाराम ब्राह्मण ने संवत् 1927 में स्वामी जी की प्रेरणा से पुत्र प्राप्ति के बाद बनवाया। इसके अलावा महंतों की समाधि है जिसे संवत् 1929 में बनवाया गया है। यहां हमेशा भजन कीर्तन आदि होते रहता है, भारतेन्दुयुगीन साहित्यकार पंडित हीरराराम त्रिपाठी भी गाते  हैं:-

चित्रउत्पला के निकट श्री नारायण धाम,

बसत संत सज्जन सदा शबरीनारायण ग्राम।

होत सदा हरिनाम उच्चारण, रामायण नित गान करै,

अति निर्मल गंग तरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरै।

शबरी वरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरे,           

जहां जीव चारू बखान बसै सहज भवसिंधु अपार तरे।।

शिवरीनारायण का माघी मेला -

नगर के पश्चिम में महंतपारा की अमराई में और उससे लगे मैदान में माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्री तक प्रतिवर्ष मेला लगता है। माघ पूर्णिमा की पूर्व रात्रि में यहां भजन-कीर्तन, रामलीला, गम्मत, और नाच-गाना करके दर्शनार्थियों का मनोरंजन किया जाता है और प्रातः तीन-चार बजे चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान करके भगवान शबरीनारायण के दर्शन के लिए लाइन लगायी जाती है। दर्शनार्थियों की लाइन मंदिर से साव घाट तक लगता था। भगवान शबरीनारायण की आरती के बाद मंदिर का द्वार दर्शनार्थियों के लिए खोल दिया जाता है। इस दिन भगवान शबरीनारायण का दर्शन मोक्षदायी माना गया है। ऐसी  मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ इस दिन पुरी से आकर यहां सशरीर विराजते हैं। कदाचित् इसी कारण दूर दूर से लोग यहां चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान कर भगवान शबरीनारायण का दर्शन करने आते है। बड़ी मात्रा में लोग जमीन में ‘‘लोट मारते‘‘ यहां आते हैं। मंदिर के आसपास और माखन साव घाट तक ब्राह्मणों द्वारा श्री सत्यनारायण जी की कथा-पूजा कराया जाता था। रमरमिहा लोगों के द्वारा विशेष राम नाम कीर्तन होता था। शिवरीनारायण में मेला लगने की शुरूवात कब हुई इसकी लिखित में जानकारी नहीं है लेकिन प्राचीन काल से माघी पूर्णिमा को भगवान शबरीनारायण के दर्शन करने हजारों लोग यहां आते थे...और जहां हजारों लोगों की भीढ़ हो वहां चार दुकानें अवश्य लग जाती है, कुछ मनोरंजन के साधन-सिनेमा, सर्कस, झूला, मौत का कुंआ, पुतरी घर आदि आ जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ होगा। लेकिन इसे मेला के रूप में व्यवस्थित रूप महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से हुई। मेला को वर्तमान व्यवस्थित रूप प्रदान करने में महंत लालदास जी का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी की मद्द से अमराई में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को व्यवस्थित रूप प्रदान कराया। पंडित रामचंद्र भोगहा ने भी भोगहापारा में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को महंतपारा की अमराई से भोगहापारा तक विस्तार कराया। चूंकि यहां का प्रमुख बाजार भोगहापारा में लगता था अतः भोगहा जी को बाजार के कर वसूली का अधिकार अंग्रेज सरकार द्वारा प्रदान किया गया था। आजादी के बाद मेला की व्यवस्था और कर वसूली का दायित्व जनपद पंचायत जांजगीर को सौंपा गया था। जबसे शिवरीनारायण नगर पंचायत बना है तब से मेले की व्यवस्था और कर वसूली नगर पंचायत करती है। नगर की सेवा समितियों और मठ की ओर से दर्शनार्थियों के रहने, खाने-पीने आदि की निःशुल्क व्यवस्था की जाती है। 

आजादी के पूर्व अंग्रेज सरकार द्वारा गजेटियर प्रकाशित कराया गया जिसमें मध्यप्रदेश के जिलों की सम्पूर्ण जानकारी होती थी। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ फ्यूडेटरी इस्टेट प्रकाशित कराया गया जिसमें छत्तीसगढ़ के रियासतों, जमींदारी और दर्शनीय स्थलों की जानकारी थी। आजादी के पश्चात सन 1961 की जनगरणा हुई और मध्यप्रदेश के मेला और मड़ई की जानकारी एकत्रित करके इम्पीरियल गजेटियर के रूप में प्रकाशित किया गया था। इसमें छत्तीसगढ़ के छः जिलों क्रमशः रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़, सरगुजा, बस्तर के मेला, मड़ई, पर्व और त्योहारों की जानकारी प्रकाशित की गयी है। इसके अनुसार छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण, राजिम और पीथमपुर का मेला 100 वर्ष से अधिक वर्षो से लगने तथा यहां के मेला में एक लाख दर्शनार्थियों के शामिल होने का उल्लेख है।

यहां के मेला में वैवाहिक खरीददारी अधिक होती थी। बर्तन, रजाई-गद्दा, पेटी, सिल-लोढ़ा, झारा, डुवा, कपड़ा आदि की अच्छी खरीददारी की जाती थी। यहां के मेले में किसिम किसिम के घोड़े, गाय और बैल के साथ ही कृषि से सम्बंधित सामान मिलता था। मेला में अकलतरा और शिवरीनारायण के साव स्टोर का मनिहारी दुकान, दुर्ग, धमधा, बलौदाबाजार, चांपा, बहम्नीडीह और रायपुर का बर्तन दुकान, बिलासपुर का रजाई-गद्दे की दुकान, कलकत्ता का पेटी दुकान, चुड़ी-टिकली की दुकानें, सोने-चांदी के जेवरों की दुकानें, नैला के रमाशंकर गुप्ता का होटल और उसके बगल में गुपचुप दुकान, अकलतरा और सक्ती का सिनेमा घर, किसिम किसिम के झूला, मौत का कुंआ, नाटक मंडली, जादू, तथा उड़ीसा का मिट्टी की मूर्तियों की प्रदर्शिनी-पुतरी घर बहुत प्रसिद्ध था। यहां उड़िया संस्कृति को पोषित करने वाला सुस्वादिष्ट उखरा बहुतायत में आज भी बिकने आता है। कदाचित इसीलिए यहां के मेले का अत्याधिक महत्व होता था।

शिवरीनारायण और आस पास के गांवों में मेला के अवसर पर मेहमानों की अपार भीढ़ होती है। इस अवसर पर विशेष रूप से बहू-बेटियों को लिवा लाने की प्रथा है। शाम होते ही घर की महिलाएं झुंड के झुंड खरीददारी के निकल पड़ती हैं। खरीददारी के साथ साथ वे होटलों और चाट दुकानों में अवश्य जाती हैं और सिनेमा देखना नहीं भूलतीं। मेला में वैवाहिक खरीददारी अवश्य होती है। शासन दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए पुलिस थाना, विभिन्न शासकीय प्रदर्शिनी, पीने के पानी की व्यवस्था आदि करती है। लोग चित्रोत्पलागंगा में स्नान कर, भगवान शबरीनारायण का दर्शन करने, श्री सत्यनारायण की कथा-पूजा करवाने और मंदिर में ध्वजा चढ़ाने से लेकर विभिन्न मनोरंजन का लुत्फ उठाने और खरीददारी कर प्रफुल्लित मन से घर वापस लौटते हैं। यानी एक पंथ दो काज... तीर्थ यात्रा के साथ साथ मनोरंजन और खरीददारी। लोग मेले की तैयारी एक माह पूर्व से करते हैं। यहां के मेला के बारे में पंडित शुकलाल पांडेय ‘छत्तीसगढ़ गौरव‘ में लिखते हैं:-

पावन मेले यथा चंद्र किरणें, सज्जन उर।

अति पवित्र त्यों क्षेत्र यहां राजिम, शौरिपुर।

शोभित हैं प्रत्यक्ष यहां भगवन्नारायण।

दर्शन कर कामना पूर्ण करते दर्शकगण।

मरे यहां पातकी मनुज भी हो जाते धुव मुक्त हैं।

मुनिगण कहते, युग क्षेत्र ये अतिशय महिमायुक्त हैं।।




प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)



रविवार, 22 जनवरी 2023

संस्कृतनिष्ठ कवि चिरंजीवदास

21 जनवरी को जयंती के अवसर पर 

संस्कृतनिष्ठ कवि चिरंजीवदास

प्रो. अश्विनी केशरवानी

सभ्यता के विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। गिरि-कंदराओं से निकलकर धरती के गर्भ को पवित्र करती ये नदियां क्षेत्रों और प्रदेशों को सिंचित ही नहीं करती बल्कि दो या दो से अधिक प्रदेशों की सभ्यता और वहां की सांस्कृतिक परम्पराओं को जोड़ने का कार्य करती है। रायगढ़, छत्तीससगढ़ प्रांत का एक प्रमुख सीमावर्ती जिला मुख्यालय है। इस जिले की सीमाएं बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश से जुड़ती है। अतः स्वाभाविक रूप से यहां उन प्रदेशों को प्रभाव परिलक्षित होता है। यहां की सभ्यता, रहन सहन, और सांस्कृतिक परम्पराओं का सामीप्य उड़ीसा से अधिक है। पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत छत्तीससगढ़ का पूर्वी भाग उड़िया भाषी सम्बलपुर से जुड़ा था। यहां मिश्रित परम्पराएं देखने को मिलती हैं।

केलो नदी के तट पर बसा रायगढ़ पूर्व में छत्तीसगढ़ का एक ‘‘फ्यूडेटरी स्टे्टस‘‘ था। यहां के राजा कला पारखी, संगीत प्रेमी और साहित्यिक प्रतिभा के धनी थे। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यहां का गणेश मेला एक उत्सव हुआ करता था...और इस उत्सव में हर प्रकार के कलाकार, नर्तक, नाटक मंडली और साहित्यकार आपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके यथोचित पुरस्कार और सम्मान पाता था। इस प्रकार रायगढ़ सांस्कृतिक और साहित्यिक तीर्थ के रूप में ख्याति प्राप्त किया। संगीत और नृत्य के साथ साथ साहित्य के क्षेत्र में यहां अनेक मूर्धन्य साहित्यकार पुरस्कृत हुए। यहां के राजा चक्रधरसिंह स्वयं एक उच्च कोटि के साहित्यकार और कला पारखी थे। उनकी सभा में साहित्यकारों की भी उतनी ही कद्र होती थी जितनी अन्य कलाकारों की होती थी। उनके राज्य के अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी साहित्यिक अभिरूचि के थे। ऐसे साहित्यकारों की लंबी श्रृंखला है। उन्हीं में से एक श्री चिरंजीवदास भी थे।

श्री चिरंजीवदास रायगढ़ के सीमावर्ती ग्राम कांदागढ़ में श्री बासुदेव दास के पुत्ररत्न के रूप में पौष शुक्ल त्रयोदशी संवत् 1977, तद्नुसार 21 जनवरी 1920 ई. को हुआ। उनका बचपन गांव की वादियों में गुजरा। उनकी शिक्षा दीक्षा रायगढ़ में ही हुई। उड़िया उनकी मातृभाषा थी। अतः स्वाभाविक रूप से उड़िया साहित्य में उनकी रूचि थी। इसके अलावा अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा में भी उनकी अच्छी पकड़ थी। यहां की प्राकृतिक सुषमा, केलो नदी का झर झर करता प्रवाह, पहाड़ियों और वनों की हरियाली उनके कवि मन को जागृत किया और वे काव्य रचना करने लगे। उन्होंने हिन्दी और उड़िया दोनों भाषा में काव्य रचना की है।

10 मार्च सन् 1994 को भारतेन्दु साहित्य समिति बिलासपुर के खरौद ग्रामीण शिविर में मेरा उनका साहित्यिक परिचय हुआ। तब मैं श्री चिरंजीवदास की सादगीपूर्ण व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुआ था। श्री स्वराज्य करूण के अनुसार ‘‘आडंबर और आत्म प्रचार के अंधे युग में पहुँच  के जरिये अपनी पहचान बनाने वालों की भीड़ समाज के लगभग सभी क्षेत्र में हावी है। लेकिन श्री चिरंजीवदास का व्यक्तित्व और कृतित्व इस तरह की भीड़ से एकदम अलग है। अनेक वर्षो से सरस्वती की मौन साधना में लीन श्री चिरंजीवदास अपनी पहचान के संकट से बिल्कुल निश्चिंत नजर आते हैं। दरअसल उनकी तमाम चिंताएं तो विश्व की उस प्राचीनतम भाषा के साथ जुड़ गई है जो सभी भारतीय भाषाओं की जननी होकर भी अपने ही देश में अल्प मत में है।‘‘ डाॅ. प्रभात त्रिपाठी के अनुसार-‘‘संस्कृत साहित्य के रस मर्मज्ञ चिरंजीवदास का सृजनशील व्यक्तित्व अनेकायामी है।‘‘ अगर प्रसिद्ध कवि और आलोचक श्री अशोक बाजपेयी का शब्द उधार लेकर कहें तो श्री चिरंजीवदास समकालीनता से मुक्त हैं। उनकी कविता मुख्य रूप से संस्कारधर्मी ललित कल्पना से ही निर्मित है। छायावादोत्तर युग की काव्य भाषा में पौराणिक कल्पनाओं के सजग प्रयोग के साथ उन्होंने इस यंग की असीम सभ्यता को भी गहराई से मूर्त करने की कोशिश की है। उनकी अपनी कविता प्रेम और प्रगति के सबल आधारों पर टिकी है। उसमें परंपरागत प्रबंधात्मकता और प्रासंगिक आधुनिकता के अतिरिक्त निजी अनुभूति का खरापन भी सक्रिय है।‘‘

पूर्वी मध्यप्रदेश में रायगढ़ शहर के वाशिदें चिरंजीवदास उसी संस्कृत भाषा के एकांत साधक और हिन्दी अनुवादक हैं, जो सभी भाषाओं की जननी है। उनके द्वारा किये गये अनुवाद का यदि सम्पूर्ण प्रकाशन हो तो प्राचीनतम संस्कृत भाषा और हिन्दी जगत के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क सेतु बन सकता है। सन 1960 में महाकवि कालिदास के मेघदूत ने उन्हें अनुवाद करने की प्रेरणा दी। हिन्दी और उड़िया भाषा में कविताएं तो वे सन् 1936 से लिखते आ रहे हैं। लेकिन पिछले 34 वर्षो में उन्होंने मेघदूत के अलावा कालिदास के ऋतुसंहार, कुमारसंभव और रघुवंश जैसे सुप्रसिद्ध महाकाव्यों के साथ साथ जयदेव, भर्तृहरि, अमरूक और बिल्हण जैसे महाकवियों की संस्कृत रचनाओं का सुन्दर, सरल और सरस पद्यानुवाद भी किया है। उमर खैय्याम की रूबाईयों के फिट्जलैंड द्वारा किये गये अंग्रेजी रूपांतरण का दास जी ने सन् 1981 में उड़िया पद्यानुवाद किया है। प्रकाशन की जल्दबाजी उन्हें कभी नहीं रही। शायद इसीकारण उनके द्वारा 1964 में किया गया ऋतुसंहार का हिन्दी पद्यानुवाद अभी प्रकाशित हुआ है। सिर्फ ऋतुसंहार ही क्यों, सन् 1962 में जयदेव कृत गीतगोविंद, सन् 1972 में महाकवि अमरूक उचित शतक और सन् 1978 में महाकवि बिल्हण कृत वीर पंचाशिका के हिन्दी पद्यानुवाद अभी अभी प्रकाशित हुआ है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि ऐसे उत्कृष्ट रचनाओं को प्रकाशित करने वाले प्रकाशक हमारे यहां नहीं हैं। इन पुस्तकों को श्री दास ने स्वयं प्रकाशित कराया है। इसी प्रकार सन् 1979 में उन्होंने महाकवि हाल की प्राकृत रचना गाथा सप्तशती का हिन्दी पद्यानुवाद किया है। इसके पूर्व कालिदास के मेघदूत का सन् 1960 में, कुमारसंभव का 1970 में और रघुवंश का 1974 में पद्यानुवाद वे कर चुके थे। उनकी अधिकांश पुस्तकें अभी तक अप्रकाशित हैं। आधी शताब्दी से भी अधिक से सतत जारी अपनी इस साहित्यिक यात्रा में श्री चिरंजीवदास एक सफल आध्यात्मिक साहित्यकार और अनुवादक के रूप में रेखांकित होते हैं। अपनी साहित्यिक यात्रा के प्रारंभिक दिनों का स्मरण करते हुये वे बताते हैं-‘‘जब मैं 15-16 वर्ष का था, तभी से मेरे मन में काव्य के प्रति मेरी अभिरूचि जागृत हो चुकी थी। मैं हिन्दी में कविताएं लिखता था। सन् 1960 में महाकवि कालिदास का मेघदूत को पढ़कर लगा कि संस्कृत के इतने सुंदर काव्य का यदि हिन्दी में सरस पद्यानुवाद होता तो कितना अच्छा होता ? और तभी मैंने उसका पद्यानुवाद करने का निश्चय कर लिया।‘‘ श्री दास ने मुझे बताया कि अनुवाद कर्म में मुझे हिन्दी और उड़िया भाषा ने हमेशा प्रेरित किया। क्योंकि ये दोनों भाषा संस्कृत के बहुत नजदीक हैं। संस्कृत के कवियों में महाकवि कालिदास की रचनाओं ने चिरंजीवदास को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। वे कहते हैं कि कालिदास के काव्य का आयाम बहुत विस्तुत है, विशेषकर रघुवंश में उनकी सम्पूर्ण विचारधारा भारतीय संस्कृति के प्रति उनका अदम्य प्रेम, आर्य परंपरा के प्रति अत्यंत आदर और लगाव स्पष्ट है।

उनकी आरंभिक रचनाओं में छायावादी काव्य संस्कारों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी कविताओं में शिल्प के पुरानेपन के बावजूद कुछ ऐसे अछूते विषय भी हैं जिन पर कविता लिखने की कोशिश ही उनके अंतर्निहित नैतिक साहस को प्रदर्शित करता है। ऋग्वेद के यम और यमी पर लिखित उनकी सुदीर्घ कविता इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त कथात्मक आधार पर लिखी गयी ‘‘रति का शाप‘‘ और उड़ीसा की लोकगाथा पर आधारित ‘‘केदार गौरी‘‘ जैसे प्रबंध कविताओं में भी हम स्त्री-पुरूष के अनुराग की ओर उनके गहन संपर्क की रंगारंग अभिव्यक्ति देखते हैं। मुक्त छंद में लिखी गई उनकी अनेक कविताएं इसके प्रमाण हैं। आज से 50 वर्ष पूर्व उनकी कविताओं में प्रगतिशील दृष्टि मौजूद थी। आदिवासी लड़की पर लिखी ‘‘मुंडा बाला‘‘ कविता उनके सौंदर्य बोध और उनकी करूणा को मूर्त करने वाली कविता है। मैं  डाॅ. प्रभात त्रिपाठी के इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ  कि ‘‘आधुनिक हिन्दी कविता के संदर्भ में उनकी कविता को पढ़ना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है कि उनकी कविताओं में विस्तृत कर दी गयी शब्दावली के पुनर्वास का सार्थक प्रयास है। संस्कृत के वर्णवृथी के अतिरिक्त उड़िया एवं बंगला के लयात्मक संस्कारों को धारण करने वाली उनकी कविता हमारी जातीय स्मृतियों की जीवंतता को उजागर करती है। केवल शाब्दिक चमत्कार के स्तर से गहरे उतरकर वे इस शब्दावली में अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा एक नई अर्थपूर्ण बनाते हैं। अपने व्यक्त रूप में उनकी कविता का आकार पुरातनपंथी सा लग सकता है किंतु यह अनेक आवाजों से बनी कविता है। एक गंभीर हृदय के लिए यह कविता आ अजस्र अवकाश है। काल और कालातीत इतिहास और पुराण लोक और लोकोत्तर को एक दूसरे से मिलाने की कोशिश करती   श्री चिरंजीवदास की कविताएं इन्ही काव्य परंपरा की सार्थक और गंभीर रचना है।‘‘ उन्होंने संस्कृत भाषा में लिखित पुस्तकों का हिन्दी पद्यों में अनुवाद किया है। इसीलिए उनके काव्यों में संस्कृत शब्दों का पुट मिलता है। 31 जनवरी सन् 1979 को लेखाधिकारी (राजस्व) के पद से सेवानिवृत्त होकर केलो नदी के तट पर स्थित अपने निवास में साहित्यिक साधना में लीन रहे। अब तक उन्होंनेे दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें लिखी और अनुवाद किया है। उनकी प्रकाशित कृतियों में रघुवंश, ऋतुसंहार, गीतगोविंद, अमरूक शतक, चैर पंचाशिका और संचारिणी प्रमुख है। उनकी अप्रकाशित कृतियों में कुमारसंभव, मेघदूत, रास पंचाध्यायी, श्रीकृष्ण कर्णमृत, किशोर चंदानंदचंपू, भर्तृहरि, शतकत्रय रसमंजरी और आर्य सप्रशनी प्रमुख है। उन्होंने फिट्जलैंड की अंग्रेजी रचना का उड़िया में ‘‘उमर खैय्याम‘‘ शीर्षक से पद्यानुवाद किया है। उनकी रचनाओं में उत्कृष्ट रचनाकार कालिदास की रचनाओं का अनुवाद  प्रमुख है। उन्होंने कालिदास को परिभाषित करते हुए लिखा हैः- ‘‘कीर्तिरक्षारसंबद्धा स्थिराभवति भूतले‘‘ अर्थात् कालिदास निश्चय ही अक्षरकीर्ति है। अंत में 26 नवंबर 1998 को वे चिर निद्र में लीन हो गये। तब मुझे उनकी ‘‘मुरली बजरी‘‘ कविता की ये पंक्तियां याद आती है:-

इन प्राणों की प्यास जता दे,

इन सांसों का अर्थ बता दे,

स्वर में मेरे स्पंदन सुलगा,

आहों का प्रज्वलित पता दे।


प्रस्तुति,


प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी, 

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)




गुरुवार, 12 जनवरी 2023

मकर संक्रांति : देवगणों के जागने का पर्व

देवगणों के जागने का पर्व मकर संक्रांति

प्रो. अश्विनी केशरवानी

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ‘संक्रांति‘ कहलाता है। सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण और कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन कहलाता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होने लगता है तब दिन बड़े और रात छोटी होने लगती है। उत्तरायण से दक्षिणायन के समय में ठीक इसके विपरीत होता है। वैदिक काल में उत्तरायण को ‘देवयान‘ तथा दक्षिणायन को ‘पितृयान‘ कहा जाता था। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिये गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवतागण पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वार्गादि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसीलिए यह आलोक का पर्व माना गया है।


धर्मशास्त्र के अनुसार इस दिन स्नान, दान, जप, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना अधिक मिलता है। इसीलिए लोग गंगादि नदियों में तिल लगाकर सामूहिक रूप से स्नान करके तिल, गुड़, मूंगफली, चांवल आदि का दान करते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को शाल और कंबल दान करने का विशेष महत्व होता है। विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति, अपने स्वास्थ्यवर्द्धन और सर्व कल्याण के लिए तिल के छः प्रकार के प्रयोग पुण्यदायक व फलदायक होते हैं-तिल जल स्नान, तिल दान, तिल भोजन, तिल जल अर्पण, तिल आहुति और तिल उबटन मर्दन। कदाचित् यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में इस दिन तिल उबटन के रूप में लगाकर नदियों में स्नान करते हैं, तिल का दान करते हैं, तिलगुजिया, तिल से बने गजक, रेवड़ी और खिचड़ी खाने-खिलाने का रिवाज है। 

विभिन्न राज्यों में संक्रांति:-

इलाहाबाद में माघ मास में गंगा-यमुना के रेत में पंडाल बनाकर कल्पवास करते हैं और नित्य गंगा स्नान करके दान आदि करके किला में स्थित अक्षयवट की पूजा करते हैं। प्रलय काल में भी नष्ट न होने वाले अक्षयवट की अत्यंत महिमा होती है। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जलाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्नि पूजा करते हुए तिल, गुड़, चांवल और भूने हुए मक्का की आहूति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचैली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक, रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मनाते हैं। नई बहू और नवजात बच्चों के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारंपरिक मक्के की रोटी और सरसों की साग का भी लुत्फ उठाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन ताल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं:- ‘तिल गूढ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला‘ अर्थात् तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं। बंगाल में भी इस दिन स्नान करके तिल दान करने की विशेष प्रथा है। असम में बिहु और आंध्र प्रदेश में भोगी नाम से मकर संक्रांति मनाया जाता है। तामिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। पोंगल सामान्यतः तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

पतंग उढ़ाने की विशिष्ट परंपरा:-

मकर संक्रांति को पतंग उड़ाने की विशेष परंपरा है। देशभर में पतंग उड़ाकर मनोरंजन करने का रिवाज है। पतंग उड़ाने की परंपरा का उल्लेख श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी किया है। बाल कांड में उल्लेख है- ‘राम इक दिन चंग उड़ाई, इंद्रलोक में पहुंची गई।‘ त्रेतायुग में ऐसे कई प्रसंग हैं जब श्रीराम ने अपने भाईयों और हनुमान के साथ पतंग उड़ाई थी। एक बार तो श्रीराम की पतंग इंद्रलोक में पहुंच गई जिसे देखकर देवराज इंद्र की बहू और जयंत की पत्नी उस पतंग को पकड़ ली। वह सोचने लगी-‘जासु चंग अस सुन्दरताई। सो पुरूष जग में अधिकाई।।‘

मांगलिक कार्यो की शुरूवात:-

पौष मास में देवगण सो जाते हैं और इस मास में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते। लेकिन माघ मास में मकर संक्रांति के दिन से देवगण जाग जाते हैं और ऐसा माना जाता है कि इस दिन से मांगलिक कार्य-उपनयन संस्कार, नामकरण, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश और विवाह आदि सम्पन्न होने लगते हैं।

सारे तिरथ बार बार लेकिन गंगा सागर एक बार:-

गंगा सागर में कपिल मुनि मंदिर 
मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा सागर में भी बड़ा मेला लगता है। इस दिन गंगा सागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीढ़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन-मकर संक्रांति को यहां लोगों की अपार भीढ़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-‘सारे तीरथ बार बार लेकिन गंगा सागर एक बार।‘ गंगा सागर कैसे पहंचे:- कोलकाता से 135 कि. मी. की दूरी पर सागर द्वीप है। यहां प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर 09 से 15 जनवरी को मेला लगता है। इस मेले में देश-विदेश से लाखों तीर्थ यात्री यहां आते हैं। तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए परिवहन, खाद्य और आवश्यक व्यवस्थाएं पश्चिम बंगाल सरकार सरकारी कर्मचारियों के अलावा स्वयं सेवी संस्थाओं के सहयोग से करती है। कोलकाता से बस के द्वारा सागर द्वीप तक जाने के दो रास्ते हैं:- 1. कोलकाता से काकद्वीप या हारउड प्वाइंट लाट नं. 8 से लंच द्वारा नदी पार कचुबेरिया होकर। कोलकाता से हारउड प्वाइंट 96 कि. मी. की दूरी पर है। यहां से लंच के द्वारा लगभग 100 कि. मी. की दूरी पार कर कचुबेरिया पहंचकर वहां से बस के द्वारा 30 कि. मी. पर गंगासागर स्थित है। बस स्टैंड से मात्र एक-डेढ़ कि. मी. की दूरी पर मेला स्थल है। 2. कोलकाता से नामखाना होकर लंच द्वारा नदी पार चेमागुड़ी होकर। कोलकाता से 114 कि. मी. की दूरी पर नामाखाना स्थित है। नामखाना जेटीघाट से लंच के द्वारा डेढ़-दो घंटे की यात्रा करके नदी पार चेमागुड़ी पहुंचेंगे। यहां से 06 कि. मी. की पैदल अथवा बस की यात्रा करके गंगासागर पहंचा जा सकता है। बस स्टैंड से मात्र एक-डेढ़ कि. मी. की दूरी पर मेला स्थल है।

उपर्युक्त दोनों स्थानों (काकद्वीप और नामखाना) पर सियालदह स्टेशन से ट्रेन द्वारा डायमण्ड हार्बर जाकर वहां से बस के द्वारा पहंुचा जा सकता है। कोलकाता के प्रिंसेपघाट, धर्मतल्ला और हावड़ा से सरकारी एवं गैर सरकारी बसें छूटती है। बड़ा बाजार के सत्यनारायण पार्क से भी गैर सरकारी बसें हर आधे घंटे में छूटती हैं। कोलकाता से हारउड प्वाइंट लाट नं. 8 तक सरकारी बसों की नियमित सेवाएं हैं और मेला के अवसर पर विशेष बस सेवा होती है। जबकि गैर सरकारी बसें मेला के अवसर पर विशेष रूप से चलायी जाती हैं। इसीप्रकार नामखाना जाने वाली बसें भी काकद्वीप से होकर जाती हैं और अब दीघा से भी नामखाना तक बसें चलती हैं। 

गंगासागर मेले में आने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर केवल मेला क्षेत्र में ही नहीं बल्कि कोलकाता महानगर से लेकर विभिन्न स्थानों पर सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा व्यापक स्तर पर व्यवस्था की जाती है। पूरे मेले का दायित्व जिला प्रशासन दक्षिण 24 परगना का है। पश्चिमी बंगाल सरकार के गृह विभाग के अंतर्गत इस मेले की व्यवस्था हेतु एक स्थायी मेला समिति बनाई जाती है। इस समिति के पदेन सचिव दक्षिण 24 परगना के जिला शासक होते हैं। इस समिति में पी.एच.ई. के चीफ इंजीनियर, पी.डब्लू.डी. के चीफ इंजीनियर, पश्चिमी बंगाल के स्वास्थ्य निदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, डी.सी.पोर्ट, पश्चिमी बंगाल के ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी, कमाण्डेंट मोबाइल सिविल इमरजेंसी फोर्स, भारत सेवा श्रम संघ और जिला सभापति सदस्य होते हैं।

मेले में क्या करें और क्या न करें:-

0 गंगासागर जाने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या कम से कम होनी चाहिए अन्यथा साथियों के बिछुड़ने की संभावना होती है।

0 तीर्थयात्रा के समय सामान उतना रखें जितना उठा सकें। किसी अपरचित व्यक्ति के उपर विश्वास न करें। सामानों के लिए अगर कुली की आवश्यकता पड़े तो कुली का बैच नंबर अवश्य नोट कर लेवें। बिना बैच वाले किसी कुली के उपर विश्वास न करें।

0 मेले में अथवा यात्रा के दौरान किसी प्रकार की असुविधा होने पर पुलिस, स्वयं सेवकों और सूचना केंद्र से सहायता अवश्य लेवें।

0 यात्रा के समय बस, टेªन अथवा लंच में चढ़ते और उतरते समय विशेष सावधानी रखें, धक्का मुक्की से बचें।

0 खानपान में विशेष सावधानी रखें, बासी, अस्वस्थकर न ही खायें और न ही पीयें। कचरा को कचरा रखने के डिब्बे में ही डालें, गंदगी न फैलायें।

0 साफ सुथरे स्थान में ही रूकें, जहां तहां मल-मूत्र त्याग न करें। 

0 खाने-पीने और रहने के लिए स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा निःशुल्क व्यवस्था की जाती है। 

0 स्नान करते समय समान व कपड़ों की देखभाल स्वयं करें, किसी अनजान व्यक्ति के भरोसे न छोड़ें। 

0 किसी भी प्रकार की असुविधा से बचने के लिए स्वयं सेवी संस्थाओं से संपर्क करें और उनकी सलाह मानें।

बंगाल के सुदूर दक्षिणी छोर पर विश्वविख्यात् सुंदर वन के महत्वपूर्ण भाग के रूप में सागर द्वीप स्थित है। यह द्वीप 30 कि. मी. लंबा और 12 कि. मी. चैड़ा है। यह अत्यंत प्राचीन द्वीप है। इस द्वीप में प्राचीन कपिल मुनि का मंदिर है। नदी के तट पर एक चबुतरे के उपर स्थित मंदिर में सिंदुर राग रंजित कपिल मुनि की मूर्ति स्थित है। उनके बाये हाथ में गंगा का प्रतीक कमण्डल है और दाये हाथ में मोक्ष के लिए कैवल्य का प्रतीक जपमाला है। मस्तक पर पंचनाग है जो शेषनाग के प्रतीक हैं। महामुनि कपिल के दायीं ओर भगीरथ को गोद में लिए पतित पावनी चतुर्भुजी गंगा विराजमान है और बायी ओर राजा सगर की प्रतिमा है। इसके अलावा वीर बजरंगबली, बन देवी के रूप में विशालक्षी देवी और इंद्र यज्ञ के घोड़े के साथ स्थित हैं।

संक्रांति श्राद्ध-तर्पण:-

राजा भगीरथ ने अपने पितरों का गंगाजल, अक्षत और तिल से श्राद्ध-तर्पण किया था जिससे उनके पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति मिली थी। तब से मकर संक्रांति स्नान, मकर संक्रांति श्राद्ध-तर्पण और दान आदि की परंपरा प्रचलित है।

मकर संक्रांति का महत्व:- 

शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, स्नान, दान, श्राद्ध और तर्पण आदि धार्मिक क्रिया का विशेष महत्व होता है। इस दिन ऐसा करने से सौ गुना पुण्य मिलता है। इस दिन शुद्ध घी और कंबल दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा भी गया हैः-

माघे मासि महादेव यो दान घृत कंबलम्।

सभुक्तवा सकलान मो गान अंते मोक्ष च विदंति।।

मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान और दान को अत्यंत शुभकारी और पुण्यदायी माना गया है। इस दिन प्रयागराज और गंगा सागर में स्नान करने को महास्नान कहा गया है। सामान्यतया सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करता है, किंतु कर्क और मकर राशि में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है। यह प्रक्रिया छः छः माह के अंतराल में होता है। भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित होता है। मकर संक्रांति के पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है। इसीलिए यहां रातें बड़ी और दिन छोटा होता है। किंतु मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उक्रारी गोलार्द्ध की ओर आने लगता है जिससे यहां रातें छोटी और दिन बड़ा होने लगता है। इस दिन से गर्मी बढ़ने लगती है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा और रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। इसलिए मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को ‘अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर‘ होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से जीवों की चेतन एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। इसी मान्यता के कारणलोगों के द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की आराधना, उपासना और पूजा आदि करके कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है।

सामान्यतया भारतीय पंचांग की समस्त तिथियां चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती है, किंतु मकर संक्रांति को सूर्य की गति से निर्धारित की जाती है। इसी कारण यह पर्व हमेशा 14 जनवरी को ही पड़ता है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से मिलने उनके घर जाते हैं। चंूकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपने देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था। इसी दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम होते समुद्र में जा मिली थी। इसीलिए गंगा सागर में गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले लोगों को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीवन में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है। इस दिन रज, तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ लेने का प्रयत्न करना चाहिए। यह दिन साधना के लिए अनुकूल होता है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यदेव पुत्र शनिदेव और पत्नी छाया के शाप से कोढ़ी हो गये थे लेकिन दूसरे पुत्र यमराज के प्रयत्न से उन्हें कोढ़ से मुक्ति मिली और वरदान भी मिला कि जो कोई सूर्य के चेहरे की पूजा करेगा उसे कोढ़ से मुक्ति मिल जायेगा। बाद में सूर्यदेव के कोप से शनि और पत्नी छाया का वैभव समाप्त हो गया। कालान्तर में शनिदेव और पत्नी छाया के तिल से समर्यदेव की पूजा करने पर उन्हें पुनः वैभव प्राप्त हुआ। तब सूर्यदेव ने वरदान दिया कि मकर संक्रांति को जो कोई उनकी तिल से पूजा करेगा उसे दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से मुक्ति मिल जायेगा, कष्ट और विपत्ति का नाश हो जावेगा। कदाचित् इसीकारण इस दिन तिल का उपयोग विविध रूपों में किया जाता है।


प्रो. अश्विनी केशरवानी

डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.)


रविवार, 18 दिसंबर 2022

गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

 18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर 

गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

 प्रो अश्विनी केशरवानी 


छत्तीसगढ़ पुरातन काल से धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बिंदु रहा है। एक ओर जहां छत्तीसगढ़ प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक और भौतिक संपदाओं को अपने गर्भ में समेटकर अग्रणी है, वहीं दूसरी ओर संत-महात्माओं की या तो जन्म स्थली है, तपस्थली या फिर कर्मस्थली। ये किताबी ज्ञान के बुद्धि विलासी न होकर तत्व दर्शन के माध्यम से निरक्षरों के मन मस्तिष्क में छाने में ज्यादा सफल हुये हैं। गुरू घासीदास इसी श्रृंखला के एक प्रकाशमान संत थे। वे यश के लोभी नहीं थे। इसीलिये उन्होंने अपने नाम और यश के लिये कोई चिन्ह, रचना या कृतित्व नहीं छोड़ी। उनके शिष्यों ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप आज उनके बारे में लिखित जानकारी पूरी तरह नहीं मिलती। सतनाम का संदेश ही उनकी अनुपम कृति है, जो आज भी प्रासंगिक है।। डाॅ. हीरालाल शुक्ल प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने गुरू घासीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व को समग्र रूप में समेटने का स्तुत्य प्रयास किया है। गुरू घासीदास पर उन्होंने तीन ग्रंथ क्रमशः हिन्दी में गुरू घासीदास संघर्ष समन्वय और सिद्धांत, अंग्रेजी में छत्तीसगढ़ रिडिस्कवर्ड तथा संस्कृत में गुरू घासीदास चरित्रम् लिखा है। ये पुस्तकें ही एक मात्र लिखित साक्ष्य हैं। इस सद्कार्य के लिये उन्हें साधुवाद दिया जाना चाहिये।

रायपुर जिला गजेटियर के अनुसार गुरू घासीदास का जन्म 18 दिसंबर सन् 1756 को एक श्रमजीवी परिवार में बलौदाबाजार तहसील के अंतर्गत महानदी के किनारे बसे गिरौदपुरी ग्राम में हुआ। यह गांव छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी शिवरीनारायण से मात्र 11 कि.मी. दूर है। इनके पिता का नाम मंहगू और माता का नाम अमरौतिन बाई था। 

अमरौतिन के लाल भयो, बाढ़ो सुख अपार,

सत्य पुरूष अवतार लिन्हा, मंहगू घर आय किन्हा।

उनके जन्म को सोहर गीत में अमरौतिन के पूर्व जन्म का पुण्य बताया गया है। देखिये सोहर गीत की एक बानगी:-

हो ललना धन्य

अमरौतिन तोर भाग्य

दान पुण्य होवत हे अपार

सोहर पद गावत हे

आनंद मंगल मनावत हे

सोहर पद गावत हे...।

घासीदास का विवाह सिरपुर के अंजोरी की पुत्री सफुरा बाई से हुआ था। उनके चार पुत्र क्रमशः अमरदास, बालकदास, आगरदास, अड़गड़िया दास और एक पुत्री सुभद्रा थी। अपने पांचों भाईयों में घासीदास मंझले थे। इनके बचपन का नाम घसिया था। वे संत प्रकृति के थे। उनके साथ अनेक अलौकिक घटनाएं जुड़ी हुई है जिसमें आसमान में बिना सहारे कपड़े सुखाना, हल को बिना पकड़े जोतना, एक टोकरी धान को पूरे खेत में बोने के बाद भी टोकरी का धान से भरा होना, पानी में पैदल चलना और मंत्र शक्ति से आग जलाना आदि प्रमुख है।

प्रारंभ से ही घासीदास का मन घरेलू तथा अन्य सांसारिक कार्यो में नहीं लगता था। फिर भी उन्हें अपने पिता के श्रम में भागीदार बनना ही पड़ता था। एक बार इस क्षेत्र में भीषण आकाल पड़ा जिससे उन्हें अपने परिवार के आजीविका के लिये दर दर भटकना पड़ा। अंत में वे परिवार सहित उड़ीसा के कटक शहर पहुंचे। यहां वे मजदूरी करने में अपना मन लगा पाते, इसके पूर्व ही उनकी मुलाकात बाबा जगजीवनदास से हुई। बाबा जगजीवनदास उस समय उड़ीसा के सुप्रसिद्ध संत माने जाते थे। घासीदास ने उनसे सतनाम की शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने उनके मन को जगाया और उन्हें बताया कि उनका जन्म सांसारिक कार्यो के लिये बल्कि लोगों को सद्मार्ग दिखाने के लिये हुआ है। कटक से लौटकर घासीदास सोनाखान के बीहड़ वन प्रांतर में जोंक नदी के किनारे तप करने लगे। यहां उन्हें सत्य की अनुभूति हुई और उन्हें सिद्धि मिली। इसके पश्चात् वे भंडारपुरी में आश्रम बनाकर सांसारिक भोग विलास का परित्याग कर जन कल्याण में अपना जीवन समर्पित कर दिया।

18वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में छत्तीसगढ़ के लोगों के सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिये यदि किसी महापुरूष का योगदान रहा है तो सतनाम के अग्रदूत, समता के संदेश वाहक और क्रांतिकारी सद्गुरू घासीदास का है। समकालीन विचार कमजोर और पिछड़े वर्ग के जीवन दर्शन को जितना गुरू घासीदास ने प्रभावित किया है, उतना किसी अन्य ने नहीं किया है। उन्होंने केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश के अन्य भागों में लोगों को जो सतनाम का संदेश दिया है वह युगों युगों तक चिरस्मरणीय रहेगा। इसके अतिरिक्त उन्होंने समता, बंधुत्व, नारी उद्धार और आर्थिक विषमता को दूर करने के लिये एक समग्र क्रांति का आव्हान किया। वे एक समदर्शी संत के रूप में छत्तीसगढ़ में सामाजिक चेतना लाने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका आध्यात्मिक और दार्शनिक व्यक्तित्व के बारे में कहा जाता है कि वे हिमालय की भांति उच्च और महान थे। पंथी गीत में भी गाया जाता है:-

श्वेत वरण अंग सो है, सिर कंचन के समान विशाला।

श्वेत साफा, श्वेत अंगरखा, हिय बिच तुलसी के माला।

एहि रूप के नित ध्यान धरौ, मिटे दुख दारूण तत्काला।

श्वांस त्रास जम के फांस मिटावत हे मंहगू के लाला।।

छत्तीसगढ़ में गुरू घासीदास का आविर्भाव उस समय हुआ जब इस क्षेत्र का धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पूरी तरह दूषित हो गयी थी। एक ओर जहां राजनीतिक एकता का अभाव था, सर्वत्र अशांति थी, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विघटन और कटुता भरा वातावरण था। मराठा शासन के कारण चारों ओर भय, आतंक असुरक्षा और अशांति थी। शासन के नाम पर मराठा आततायियों तथा उनके स्थानीय उच्च वर्गीय अनुयायियों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। धार्मिक, आध्यात्मिक तथा सात्विकता की भावना का पूरी तरह आभाव था। सम्पूर्ण क्षेत्र में विषमता, दमन, अराजकता और मिथ्याभिमान विद्यमान था। ऐसी परिस्थितियों में निश्चित रूप से किसी युग पुरूष की आवश्यकता थी जो इस व्यवस्था में सुधार ला सके। ऐसे समय में गुरू घासीदास का जन्म एक वरदान था। उन्होंने अपने अंतर्मन के विश्वास और सतनाम के दिव्य संदेश से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के दिग्भ्रमित लोगों को सही रास्ता दिखाया। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत निम्नलिखित है:-

सत्य ही ईश्वर है और उसका सत्याचारण ही सच्चा जीवन है।

सत्य का अन्वेषण और प्राप्ति गृहस्थ आश्रम में सत्य के मार्ग में चलकर भी किया जा सकता है।

ईश्वर निर्गुण, निराकार और निर्विकार है। वह सतनाम है। वह शुद्ध, सात्विक, निश्छल, निष्कपट, सर्व शक्तिमान और सर्व व्याप्त है।

सत्य के रास्ते में चलकर और शुद्ध मन से भक्ति करके ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।

धर्म का सार अहिंसा, प्रेम, परोपकार, एकता, समानता और सभी धर्मो के प्रति सद्भाव रखना है।

अहिंसा एक जीवन दर्शन है, दया एक मानव धर्म है। संयम, त्याग और परोपकार सतनाम धर्म है।

गुरू घासीदास ने सतनाम का जो दार्शनिक सिद्धांत दिया वह निरंतर अनुभूति के तत्व दर्शन पर आधारित है। वह उनकी आजीवन तपस्या, चिंतन, मनन और साधना का प्रतिफल है। यह उनके अलौकिक ज्ञान तथा दिव्य अनुभूति पर आधारित है। उन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ को एकरूपता प्रदान की बल्कि एक संस्कृति और एक जीवन दर्शन दिया। उनका उपदेश सम्पूर्ण मानवता के लिये कल्याणकारी है। जो निम्नानुसार है:-

        1. दया, अहिंसा के रूप में ईश्वर तक पहुंचने का साधन है।

       2. मांस तथा नशीली वस्तुओं का सेवन पाप है। यह हमें ईश्वर तक नहीं पहुंचने देता और दिग्भ्रमित कर देता है।

3. सभी धर्मो के प्रति समभाव तथा सहिष्णुता रखना चाहिये। सभी धर्मो का लक्ष्य एक ही है।

4. जाति भेद, ऊंच नीच और छुआछूत का भेदभाव ईश्वर तक पहुंचने में व्यवधान उत्पन्न करता है।

        5. मानवता की पूजा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। दलितों और पीड़ितों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है और मानवता की आराधना ही सच्चा कर्मयोग है।

..अपने विचारों को गुरू घासीदास ने सात सूत्रों में बांधा है जो सतनाम पंथ के प्रमुख सिद्धांत है:-

सतनाम पर विश्वास रखो

मूर्ति पूजा मत करो

जाति भेद के प्रपंच में मत पड़ो

मांसाहार मत करो

शराब मत पीयो

परस्त्री को मां-बहन समझो।

निःसंदेह गुरू घासीदास के सतनाम के द्वारा भारतीय समाज को एक व्यावहारिक दर्शन का ज्ञान कराकर भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाया है। इस पंथ के लोगों द्वारा अक्सर गाया जाता है.

सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री आॅफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है -‘18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सतनाम पंथ कहलाया-सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला..। इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में दूर तक विस्तृत रूप में फैले हैं। इस पंथ को दो भागों में बांटा गया है- एक गृहस्थ और दूसरा भिक्षुक। इस पंथ के पहले लोग अपना जाति लिखना शुरू कर दिये जबकि दूसरे लोग जाति लिखना छोड़ दिये। सेंट्रल प्राविन्स में उन दिनों सतनामी समाज एक सम्प्रदाय के रूप में आया। ये सतनामी उस समय के उच्च धार्मिक विचारों के लोगों की अनुमति के बगैर ईश्वर की पूजा अर्चना कर सकने में असमर्थ थे। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास ही थे जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान उनके सतनाम में प्रकट होते हैं। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छत्तीसगढ़ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 19वीं सदी में इस आंदोलन ने अंधविश्वासी हिन्दू जाति विशेषकर  प्रिस्टली क्लास के लोगों को भयभीत किया और समस्त लोगों के बीच आपसी सद्भावना हेतु बाध्य कर दिया।’’

छत्तीसगढ़ की सुंदर समन्वित संस्कृति पर गुरू घासीदास द्वारा स्थापित सतनाम के बारे में सुप्रसिद्ध साहित्य चिंतक डाॅ. विमलकुमार पाठक ने लिखा है कि यहां के हरिजन संत गुरू घासीदास द्वारा प्रवर्तित सत्यज्ञान अथवा सतनाम के अनुयायी होकर सतनामी सम्बोधित होते हैं। वे सात्विक विचार से युक्त होते हुये द्विज सदृश्य यज्ञोपवित से सुशोभित हुये हैं। गुरू घासीदास की जन्म भूमि और तपोभूमि गिरौदपुरी तथा कर्मभूमि भंडारपुरी था जहां वे अपना संदेश दिये। आज वे स्थान सतनामी समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक तीर्थ स्थल हैं।

इतने बड़े ज्योति पुरूष एवं समदर्शी संत की इतने दिनों तक उपेक्षा सचमुच मानवता की उपेक्षा थी। उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने सन् 1983 में बिलासपुर में गुरू घासीदास विश्वविद्यालय की स्थापना की। तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार का यह प्रयास सचमुच प्रशंसनीय है। 25 नवंबर सन् 1985 को गुरू घासीदास विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति श्री शरतचंद्र बेहार ने कहा था-‘‘छत्तीसगढ़ विभिन्न संस्कृतियों का संगम होने के कारण बौद्धिक उदारता और सहनशीलता इस क्षेत्र की विशेषता रही है। इसलिये देश के अन्य हिस्सों से ऐसे लोग जो तत्कालीन मुख्य विचारधारा और व्यवस्था से असहमत थे, यहां आकर अपने विचारों के लिये समर्थन और आश्रय खोज रहे हैं इसी कारण यहां कबीर पंथी की बड़ी संख्या है। मतभेद का घोषनाद करने वालों की परम्परा में 19 वीं शताब्दी की शुरूवात में गुरू घासीदास ने समाज की कठोर जाति प्रथा तथा उससे जुड़ी सामाजिक, आर्थिक शोषण की प्रक्रियाओं से विद्रोह किया। मूर्ति पूजा का विरोध कर निराकार ईश्वर पर विश्वास करने तथा सामाजिक औपचारिकताओं के खिलाफ आवाज उठाने के कारण स्व. श्रीकांत वर्मा ने उनके दर्शन को ‘‘अवतारों से विद्रोह’’ निरूपित किया है। समाज को संगठित कर उनमें आत्म सम्मान की भावना बढ़ाने तथा एक क्षमता मूलक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था की स्थापना के लिये ठोस कदम उठाने वाले ऐसे कर्मयोगी की उपलब्धियों का आकलन करने पर ‘‘दलितों का मसीहा’’ की सशक्त एवं सुस्पष्ट क्षवि मेरे मन में अंकित होता है। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में गुरू घासीदास ने अन्यों की उपेक्षा को देखा समझा और उसका विरोध किया। उसने जिस तरह से हरिजनों और समाज के पिछड़े वर्गा को संगठित कर उसका नेतृत्व किया वह 20वीं शताब्दी के अंत में भी बहुत कम लोग कर सकते हैं।’’

बहरहाल, सद्गुरू घासीदास अन्याय तथा सामाजिक बुराईयों के विरूद्ध संघर्ष करने तथा पिछड़े लोगों के जीवन में सम्मान की भावना पैदा करने की दृष्टि से क्रांतिकारी उपदेश देने के लिये हमेशा याद किये जायेंगे। यदि हम उनके सिद्धांतों का अंश मात्र भी पालन करें तो अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समास्याओं का निराकरण स्वमेव हो जायेगा। इन अर्थो में गुरू घासीदास आज भी प्रासंगिक हैं



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शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान

 30 नवंबर को पुण्यतिथि के अवसर पर

पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान


प्रो. अश्विनी केशरवानी

पंडित मालिकराम भोगहा 
छत्तीसगढ़ प्रदेश अनेक अर्थो में अपनी विशेषता रखता है। यहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेषों का बाहुल्य है जो अपनी प्राचीनता और वैभव सम्पन्नता की गाथाओं को मौन रहकर बताता है लेकिन इसके प्रेरणास्रोत और विद्वतजन गुमनामी के अंधेरे में खो गये। उन दिनों आत्मकथा लिखने की पिपासा नहीं होने से कुछ लिख छोड़ने की परम्परा नहीं रही। दूसरी ओर उनकी कृतियां और पांडुलिपियां पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में चूहे और दीमक का भोजन या तो बन गये हैं या बनते जा रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस ओर देशोद्धार के सम्पोषकों ने ध्यान नहीं दिया। उनकी उपेक्षा नीति के कारण अंचल के अनेक मेघावी कवि, लेखक और कला मर्मज्ञ गुमनामी के अंधेरे में खो गये। इसी अज्ञात परम्परा के महान कवि-लेखकों में पंडित मालिकराम भोगहा भी थे जिन्हें प्रदेश के प्रथम नाटककार होने का गौरव प्राप्त होना चाहिए था, मगर आज उन्हें जानने वाले गिने चुने लोग ही हैं। छत्तीसगढ़ ऐसे अनेक स्वनामधन्य कवि-लेखकों से सुसम्पन्न था। देखिये पंडित शुकलाल पांडेय की एक बानगी:-

रेवाराम गुपाल अउ माखन, कवि प्रहलाद दुबे, नारायन।

बड़े बड़े कवि रहिन हे लाखन, गुनवंता, बलवंता अउ धनवंता के अय ठौर।।

राजा रहिन प्रतापी भारी, पालिन सुत सम परजा सारी।

जतके रहिन बड़े अधिकारी, अपन जस के सुरूज के बल मा जग ला करिन अंजोर।।

पंडित मालिकराम भोगहा इनमें से एक थे। छत्तीसगढ़ गौरव में पंडित शुकलाल पांडेय लिखते हैं:-

नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।

बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।

हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।

विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद ब्रज गिरधर।

विश्वनाथ, बिसाहू, उमर, नृप लक्ष्मण छत्तीस कोट कवि।

हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि।। 

महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी शिवरीनारायण नवगठित जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि.मी.,बिलासपुर से 64 कि.मी.,रायपुर से 140 कि.मी. बलौदाबाजार होकर और रायगढ़ से 110 कि.मी. सारंगढ़ होकर स्थित है। यहां वैष्णव परम्परा के मठ और मंदिर स्थित है। कलिंग भूमि के निकट होने के कारण वहां की सांस्कृतिक परम्पराओं से पूरी तरह प्रभावित यह नगर भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान माना गया है। उड़िया कवि सरलादास ने 14 वीं शताब्दी में लिखा था कि भगवान जगन्नाथ को शबरीनारायण से पुरी ले जाया गया है। यहां भगवान नारायण गुप्त रूप से विराजमान हैं और प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को सशरीर विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। कदाचित् इसी कारण इसे ‘‘गुप्तधाम‘‘ माना गया है। यहां भगवान नारायण के अलावा केशव नारायण, लक्ष्मीनारायण, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, राम लक्ष्मण जानकी, राधाकृष्ण, अन्नपूर्णा, चंद्रचूढ़ और महेश्वर महादेव, बजरंगबली, काली, शीतला और महिषासुरमर्दिनी आदि देवी-देवता विराजमान हैं। प्राचीन साहित्य में यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम होने का उल्लेख मिलता है। यहीं श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर खाकर उन्हें मोक्ष प्रदान किये थे। यहीं भगवान श्रीराम ने आर्य समाज का सूत्रपात किया था। शबरी से भेंट को चिरस्थायी बनाने के लिए ‘‘शबरी-नारायण’’ नगर बसा है। यहां की महत्ता कवि गाते नहीं अघाते। देखिए कवि की एक बानगी:-

रत्नपुरी में बसे रामजी सारंगपाणी

हैहयवंशी नराधियों की थी राजधानी।

प्रियतमपुर है शंकर प्रियतम का अति प्रियतम,

है खरौद में बसे लक्ष्मणेश्वर सुर सत्तम 

शिवरीनारायण में प्रकट शैरि-राम युत हैं लसे

जो इन सबका दर्शन करे वह सब दुख में नहिं फंसे।

भोगहा द्वार 
प्राचीन काल में यहां के मंदिरों में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। उनके गुरू ‘‘कनफड़ा बाबा और नगफड़ा बाबा‘‘ कहलाते थे और जिसकी मूर्ति यहां आज भी देखी जा सकती है। नवीं शताब्दी के आरंभ में रामानुज वैष्णव सम्प्रदाय के स्वामी दयाराम दास तीर्थाटन करते रतनपुर आये। उनकी विद्वता और चमत्कार से हैहयवंशी राजा प्रसन्न होकर उन्हें अपना गुरू बना लिए। उनके निवेदन पर स्वामी जी शबरीनारायण में वैष्णव मठ स्थापित करना स्वीकार कर लिए। जब वे शबरीनारायण पहुंचे तब उनका सामना तांत्रिकों से हुआ। उनसे शास्त्रार्थ करके उन्हंे यहां से जाने को बाध्य किये। इस प्रकार यहां वे वैष्णव मठ स्थापित किये और वे इस मठ के प्रथम महंत हुए। आज मठ के 14 महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक ईश्वर भक्त और चमत्कारी थे। वर्तमान में राजेश्री रामसुन्दरदास जी यहां के महंत हैं। यहां के मंदिरों की पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी ‘‘भोगहा‘‘ उपनाम से अभिसिक्त हुए। यहां की महिमा श्री मालिकराम भोगहा के मुख से सुनिए:-

आठों गण सुर मुनि सदा आश्रय करत सधीर

जानि नारायण क्षेत्र शुभ चित्रोत्पल नदि तीर

देश कलिंगहि आइके धर्मरूप  थिर पाई

दरसन परसन बास अरू सुमिरन तें दुख जाई।

सन् 1861 में जब बिलासपुर जिला पृथक अस्तित्व में आया तब उसमें तीन तहसील क्रमशः बिलासपुर, शिवरीनारायण और मुंगेली बनाये गये। सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह सन् 1882 में तहसीलदार होकर शिवरीनारायण आये। उनका यहां आना इस क्षेत्र के साहित्यकारों के लिए एक सुखद घटना थी। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इसे अपनी रचनाओं में समेटने का भरपूर प्रयास किया। बनारस में ‘‘भारतेन्दु मंडल‘‘ की तर्ज पर उन्होंने यहां ‘‘जगन्मोहन मंडल‘‘ की स्थापना कर यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें लेखन की एक नई दिशा प्रदान की। उनकी रचनाओं में कई स्थानों पर ‘जगन्मोहन मंडल‘ का उल्लेख है। यहां के आनरेरी मजिस्ट्रेट पं. यदुनाथ भोगहा के अनुरोध पर उनके चिरंजीव मालिकराम भोगहा को उन्होंने अपने शागीर्दी में साहित्य लेखन करना सिखाया। पं. मालिकराम जी ने उन्हें अपना गुरू माना है। वे लिखते हैं:-

प्रेमी परम रसिक गुणखान।

नरपति विजयसुराघवगढ़ के, कवि पंडित सुखदान।।

ठाकुर जगमोहन सिंह 

जय जन वंदित श्री जगमोहन, तासम अब नहिं आन।

जग प्रसिद्ध अति शुद्ध मनोहर, रचे ग्रंथ विविधान।।

सोई उपदेश्यो काव्य कोष अरू, नाटक को निरमान।

ताकि परम शिष्य ‘‘मालिक‘‘ को, को न करे सनमान।।

तब इस अंचल के अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार यहां आकर साहित्य साधना किया करते थे। उनमें पं. अनंतराम पांडेय(रायगढ़), पं. पुरुषोत्तम प्रसाद पांडेय (बालपुर), पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय (परसापाली),       श्री वेदनाथ शर्मा (बलौदा), पं. हीराराम त्रिपाठी (कसडोल), पं. मालिकराम भोगहा, श्री गोविंद साव, (सभी शिवरीनारायण), श्री बटुकसिंह चैहान (कुथुर-पामगढ़), जन्मांध कवि नरसिंहदास वैष्णव (तुलसी), शुकलाल पांडेय और पं. लोचनप्रसाद पांडेय भी यहां सु जुड़े रहे। तब यह नगर धार्मिक, सांस्कृतिक तीर्थ के साथ साहित्यिक तीर्थ भी कहलाने लगा। कौन हैं ये मालिकराम भोगहा ? छत्तीसगढ़ में उनका साहित्यिक अवदान क्या था ? 

शिवरीनारायण मंदिर के पुजारी और भोगहापारा के मालगुजार पंडित यदुनाथ भोगहा का उल्लेख एक सज्जन व्यक्ति के रूप में ठाकुर जगमोहनसिंह ने सन् 1884 में प्रकाशित अपने सज्जनाष्टक में किया है:-

  बन्दो आदि अनन्त शयन करि शबरनारायण रामा।

  बैठे अधिक मनोहर मंदिर कोटि काम छबिधामा।।

जिनको राग भोग करि निसुदिन सुख पावत दिन रैनू।

  भोगहा श्री यदुनाथ जू सेवक राम राम रत चैनू।।

है यदुनाथ नाथ यह सांचों यदुपति कला पसारी।

  चतुर सुजन सज्जन सत संगत सेवत जनक दुलारी।।

दिन दिन दीन लीन मुइ रहतो कृषि कर्म परवीना।

  रहत परोस जोस तजि मेरे हैं द्विज निपट कुलीना।।

भोगहा जी बड़े सुहृदय, भक्त वत्सल और प्रजा वत्सल थे। सन् 1885 में यहां बड़ा पूरा (बाढ़) आया था जिसमें जन धन की बड़ी हानि हुई थी। इस समय भोगहा जी ने बड़ी मद्द की थी। शिवरीनारायण तहसील के तहसीलदार और कवि ठाकुर जगमोहनसिंह ने तब ‘‘प्रलय‘‘ नाम की एक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक के ‘समर्पण‘ में वे भोगहा जी के बारे में लिखते हैं:-‘‘भोगहा जी आप वहां के प्रधान पुरूष हो। आपकी सहायता और प्रजा पर स्नेह, जिसके वश आपने टिकरीपारा की प्रजा का प्राणोद्धार ऐसे समय में जब चारों ओर त्राहि त्राहि मची थी, किया था-इसमें सविस्तार वर्णित है। यह कुछ केवल कविता ही नहीं वरन् सब ठीक ठाक लिखा है।‘‘ देखिये उनका पद्य:-

  पुरवासी व्याकुल भए तजी प्राण की आस

          त्राहि त्राहि चहुँ मचि रह्यो छिन छिन जल की त्रास

  छिन छिन जल की त्रास आस नहिं प्रानन केरी

  काल कवल जल हाल देखि बिसरी सुधि हेरी

  तजि तजि निज निज गेह देहलै मठहिं निरासी

          धाए भोगहा और कोऊ आरत पुरवासी।। 52 ।।

  कोऊ मंदिर तकि रहे कोऊ मेरे गेह

  कोऊ भोगहा यदुनाथ के शरन गए लै देह

  शरन गए लै देह मरन तिन छिन में टार्यौ

          भंडारो सो खोलि अन्न दैदिन उबार्यौ

  रोवत कोऊ चिल्लात आउ हनि छाती सोऊ

  कोऊ निज धन घर बार नास लखि बिलपति कोऊ।। 53 ।।

  श्री यदुनाथ भोगहा को मालगुजार, माफीदार और पुजारी बताया गया है। बाढ़ के समय उन्होंने बड़ी मद्द की थी। टिकरीपारा (तब एक उनकी मालगुजारी गांव) में स्वयं जाकर वहां के लोगों की सहायता की थी। ठाकुर साहब ने लिखा है:-‘‘ऐसेे जल के समय में जब पृथ्वी एकार्णव हो रही थी, सिवाय वृक्षों की फुनगियों के और कुछ दिखाई नहीं देता था और जिस समय सब मल्लाहों का टिकरीपारा तक नौका ले जाने में साहस टूट गया था, आपका वहां स्वयं इन लोगों को उत्साह देकर लिवा जाना कुछ सहज काम नहीं था। यों तो जो चाहे तर्क वितर्क करें पर जिसने उस काल के हाल को देखा था वही जान सकता है।‘‘ एक दोहा में इसका उन्होंने वर्णन किया है:-

  पै भुगहा हिय प्रजा दुख खटक्यौं ताछिन आय।

  अटक्यों सो नहिं रंचहू टिकरी पारा जाय।। 63 ।।

  बूड़त सो बिन आस गुनि लै केवट दस बीस।

  गयो पार भुज बल प्रबल प्रजन उबार्यौ ईश।। 64 ।।

  इस सद्कार्य से प्रभावित होकर ठाकुर जगमोहनसिंह ने इनकी प्रशंसा अंग्रेज सरकार से की थी और उन्हें पुरस्कार भी देने की सिफारिश की थी मगर अंग्रेज सरकार ने ध्यान नहीं दिया था। उन्होंने लिखा है:- ‘‘आपका इस समय हमारी सरकार ने कुछ भी सत्कार न किया-यद्यपि मैंने यथावत् आपकी प्रशंसा अपने अधिकार के सम्बंध में श्रीयुत् डिप्टी कमिश्नर बिलासपुर को लिखी थी तथा सोच का स्थान है कि उस पर भी अद्यापि ध्यान न हुआ-‘नगार खाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ?‘ आदि आपकी सहायता, प्रजागण पर स्नेह और उनका उपकार जगत ने स्वीकार किया और उनकी भी प्रीति आप पर निष्कपटता के साथ है तो इससे बढ़ के और पारितोषिक नहीं। क्यों कि ‘धनांनि जीवितन्न्जैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत तन्निमिŸो वरं त्यागि विनाशे नियते सति‘ और भी ‘विभाति कायः करूणा पराणाम्परोपकारैर्नतु चन्दनेन‘ ऐसा प्राचीन लोग कह आये हैं।‘ इस प्रकार उनकी प्रशंसा कर ठाकुर साहब ने उनके सुखी रहने की कामना की है:-

  सुखी रहैं ये सब पुरवासी खलगन सुजन सुभाए।

  श्री यदुनाथ जियै दिन कोटिन यह मन सदा कहाए।। 109 ।।

पंडित मालिकराम भोगहा का जन्म बिलासपुर जिलेे (वर्तमान जांजगीर-चांपा जिला) के शिवरीनारायण में संवत् 1927 में हुआ। वे सरयूपारी ब्राह्मण थे। उनके पिता पं. यदुनाथ भोगहा यहां के नारायण मंदिर के प्रमुख पुजारी, मालगुजार और आनरेरी मजिस्ट्रेट थे। जब मालिकराम बहुत छोटे थे तभी उनकी माता का देहावसान हो गया। मातृहीन पुत्र को पिता से माता और पिता दोनों का प्यार और दुलार मिला। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा दीक्षा तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह के संरक्षण में हुई। संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू के अलावा उन्होंने संगीत, गायकी की शिक्षा ग्रहण की। आगे चलकर मराठी और उड़िया भाषा सीखी। उन्होंने कम समय में ही अलौकिक योग्यता हासिल कर ली। मालिकराम जी धीरे धीरे काव्य साधना करने लगे। पहले उनकी कविता अवस्थानुरूप श्रृंगार रस में हुआ करती थी। बाद में उनकी कविताएं अलंकारिक थी। उनकी कविताएं सरस और प्रसाद गुण युक्त थी। उनकी कुछ कविताओं को ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तकों में सम्मिलित किया है। देखिए उनकी एक कविता: -

लखौं है री मैंने रयन भयै सोवै सुख करी।

छकी लीनी बीनी मधुर गीत गावै सुर भरी।

मिटावै तू मेरे सकल दुख चाहे छनिक में।

न लावै ज्यों बेरी अधर रस सोचे तनिक में।।

मालिकराम जी अपना उपनाम ‘‘द्विजराज‘‘ लिखा करते थे। उनकी अलंकारी भाषा होने के कारण लोग उन्हें ‘‘अलंकारी‘‘ भी कहा करते थे। शिवरीनारायण के मंदिर के पुजारी होने के कारण ‘‘भोगहा‘‘ उपनाम मिला। उनके वंशज आज भी यहां मंदिर के पुजारी हैं।

मालिकराम जी, ठाकुर जगमोहनसिंह के प्रिय शिष्य थे। उसने भोगहा जी को अपने साथ मध्य प्रांत, मध्य भारत, संयुक्त प्रांत और पंजाब के प्रसिद्ध स्थानों की यात्रा करायी जिससे उन्हें यात्रा अनुभव के साथ विद्यालाभ भी हुआ। बाल्यकाल से ही मालिकराम जी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वे हमेशा धार्मिक ग्रंथों का पठन और मनन किया करते थे। किशोरावस्था में उन्होंने वेद, उपनिषद और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। ब्रह्यचर्य रहकर चतुर्मास का पालन करना, पयमान को जीवन का आधार समझना, नित्य एक हजार गायत्री मंत्र का जाप करना, योग धर्म में पथिक होकर भी सांसारिक कर्तव्यों से जूझना और अपनी सुशि़क्षा तथा सच्चरित्र के द्वारा लोगों में धर्मानुराग उत्पन्न कर परमार्थ में रत रहना वे परम श्रेष्ठ समझते थे। इन्हीं गुणों के कारण मालिकराम जी आदर्श गृहस्थ के पावन पद के अधिकारी हुये। वे अक्सर कहा करते थे-‘‘ ब्रह्यचर्य व्रत और गायत्री मंत्र में ऐसी शक्ति है जिससे मनुष्य देवतुल्य बन सकता है।‘‘ वे स्त्री शिक्षा और पत्नीव्रत पर लोागें को उपदेश दिया करते थे। उनके इस उनदेश का लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता था। बैसाख पूर्णिमा संवत् 1964 को उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इससे उन्हें बहुत धक्का लगा। वे अक्सर कहा करते थे-‘‘ मेरी आध्यात्मिक उन्नति का एक कारण मेरी पत्नी है। उनके सतीत्व और मनोदमन को देखकर मैं मुग्ध हो जाता हंू। उनका वियोग असहनीय होता है:-

मेरे जीवन की महास्थली में तू थी स्निग्ध सलिल स्रोत।

इस भवसागर के तरने में तेरा मन था मुझको पोत।।

कहीं पत्नीव्रत में विघ्न उपस्थित न हो और चित्त की एकाग्रता जो दृढ़ अध्यावसाय से प्राप्त हुई है, कहीं विचलित न हो जाये, कुछ तो इस आशंका से और कुछ अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया। समय आने पर उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई लेकिन जन्मते ही वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। नवजात पुत्र की मृत्यु से वे बहुत व्यथीत हुये। वे अस्वस्थ रहने लगे और सूखकर कांटा हो गये। उपचार से उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं हुआ और अंततः वे 38 वर्ष की अल्पायु में 30 नवंबर सन् 1909 को स्वर्गवासी हुए। यह जानते हुये भी कि शरीर नश्वर है, न अतीव वेदना से भर उठा। उन्हीं के शब्दों में:-

जो जन जन्म लियो है जग में सो न सदा इत रैहैं।

जग बजार से क्रय विक्रय कर अंत कूच कर जैहैं।

तद्यपि जे सज्जन विद्वज्जन असमय ही उठ जावै।

तिनके हेतु जगत रोवत है गुनि गुनि गुण पछतावै।

पंडित लोचनप्रसाद पांडेय उन्हें शोकांजलि देते हुए लिखते हैं:-

हे प्राणियों की प्रकृति जग में मरण यह सब जानते।

यह देह है भंगुर इसे भी लोग हैं सब मानते।

पर मृत्यु प्रियजन की जलाती हा ! न किसके प्राण है ?

किसका न होता प्रिय विरह से भ्रष्ट सारा ज्ञान है ?

भवताप तापित प्राण को चिरशांति का जो स्रोत है।

भवसिंधु तरने हेतु जिसका हृदय पावन पोत है।

चिर विरह ऐसे मित्र का हो सह्य किसको लोक में ?

छाती नहीं फटेगी किसकी हाय ! उसके शोक में ?

शोकाश्रुप्लावित नेत्र होते हैं रूक जाता गला।

कर कांपता है फिर लिखें हम इस दशा में क्या भला ?

इस समय तो रोदन बिना हमसे नहीं जाता रहा।

हा हन्त मालिकराम ! धार्मिक भक्त ! हा द्विजराज ! हा !

पं. मालिकराम जी एक उत्कृष्ट कवि और नाटककार थे। उन्होंने रामराज्यवियोग, सती सुलोचना और प्रबोध चंद्रोदय (तीनों नाटक), स्वप्न सम्पत्ति (नवन्यास), मालती, सुर सुन्दरी (दोनों काव्य), पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य आदि ग्रंथों की रचना की। उनका एक मात्र प्रकाशित पुस्तक रामराज्यवियोग है, शेष सभी अप्रकाशित है। यह नाटक प्रदेश का प्रथम हिन्दी नाटक है। इसे यहां मंचित भी किया जा चुका है। इस नाटक को भोगहा जी ने ठाकुर जगमोहनसिंह को समर्पित किया है। वे लिखते हैं:-‘‘ इस व्यवहार की न कोई लिखमत, न कोई साक्षी और न वे ऋणदाता ही रहे, केवल सत्य धर्म ही हमारे उस सम्बंध का एक माध्यम था और अब भी वही है। उसी की उत्तेजना से मैं आपको इसे समर्पण करने की ढिठाई करता हूँ। क्योंकि पिता की सम्पत्ति का अधिकारी पुत्र होता है, विशेष यह कि पिता, गुरू आदि उपमाओं से अलंकृत महाराज के स्थान पर मैं आपको ही जानता हूँ। जिस तरह मैंने अपना सत्य धर्म स्थिर रख, प्राचीन ऋण से उद्धार का मार्ग देखा, उसी तरह यदि आप भी ऋणदाता के धर्म को अवलम्ब कर इसे स्वीकार करेंगे तो मैं अपना अहोभाग्य समझूंगा..।‘‘

भोगहा जी के बारे में पं. लोचनप्रसाद पांडेय लिखते हैं:-‘‘ पूज्य मालिकराम मेरे अग्रज पं. पुरुषोत्तम प्रसाद पांडेय के बड़े स्नेही मित्र थे। उनमें बड़ी घनिष्ठता थी। मालिकराम जी हमारे प्रदेश के एक सुप्रसिद्ध और दर्शनीय पुरूष थे। उनकी सच्चरित्रता और धार्मिकता की प्रशंसा हम क्या अंग्रेज अधिकारी और पादरी तक किया करते थे। कई पादरी उनकी आध्यात्मिक उन्नति से मुग्ध होकर उनका मान करते थे। मालिकराम जी का हृदय बालकों के समान कोमल और पवित्र था। वे बालकों के साथ बातचीत करके खुश होते थे। ग्रामीण किसानों और उन आदमियों से जिन्हें हम असभ्य कहकर घिनाते थे, उनसे बड़े प्रेम और आदर के साथ मिला करते थे। वे ग्रामीण भाषा में गीत गाकर और हावभाव के साथ बोला करते थे जिससे हजारों नर नारियां मोहित उठ उठते थे। उनकी साहित्य सेवा और मातृ भाषानुराग आदर्श था। स्वदेश भक्ति तो उनके नश नश में भरी हुई थी। उनकी विद्वता और काव्य शक्ति की प्रशंसा अनेक विद्वानों ने की है। ऐसे आदर्श और गुणवान पुरूष का अल्प अवस्था में उठ जाना हमारे देश का दुर्भाग्य है। उनकी मृत्यु से छत्तीसगढ़ का एक सपूत हमसे छिन गया।‘‘ अस्तु:-

जिसका पवित्र चरित्र औरों के लिये आदर्श है।

वह वीर मर कर भी न क्या जीवित सहस्रों वर्ष है।।



प्रस्तुति,

     प्रो. अश्विनी केशरवानी


राघव, डागा कालोनी,

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)